वाणी ऐसी बोलिये, जमकर झगड़ा होय!

पुष्परंजन : इतना तीखा, धारदार, मिसाइल से भी मारक व्यंग्य न तो शैल चतुर्वेदी लिख-बोल सकते थे, न श्रीलाल शुक्ल। इस कला के नाम पर जो लोग कमा-खा रहे हैं, ...

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इतना तीखा, धारदार, मिसाइल से भी मारक व्यंग्य न तो शैल चतुर्वेदी लिख-बोल सकते थे, न श्रीलाल शुक्ल। इस कला के नाम पर जो लोग कमा-खा रहे हैं, वो भी हैरान कि मुझसे बड़ा व्यंग्यकार कहां से आ गया, जिसके जहर बुझे शब्दों से विरोधी वहीं के वहीं ढेर हो जाते हैं, देश तिलमिला उठता है, और समर्थक सांसद, मंत्री तालियां पीटते हुए ता-ता थैय्या करने लगते हैं। संसद में आरोह-अवरोह, तीन ताल, झपताल में ऐसा कटाक्ष न तो पहले किसी प्रधानमंत्री ने प्रस्तुत किया था, न आगे कोई कर पायेगा। अब तक संसद में अध्यक्ष को संबोधित करते हुए अपना पक्ष रखने की परंपरा थी। ‘ज़ुबानी सर्जिकल स्ट्राइक’ ने सत्तर साल से चली आ रही संसदीय परंपरा को भेद दिया। मोदी जी भूल गये कि यह संसद है। उसे भी चुनाव का मैदान समझ बैठे, और ‘भाइयों और बहनों’ से सदन को संबोधित करने लगे।
सोशल मीडिया ‘सुटबूट की सरकार’ बनाम ‘रेनकोट की सरकार’ को लेकर बुरी तरह गुत्थम-गुत्था है। गाली पर ठोको ताली का माहौल है। ‘रेन कोट’ पर आपत्ति की तो खैर नहीं। उनकी कुत्ता फजीहत के लिए दर्जनों पोस्ट एक साथ हमलावर होते दिखते हैं। मनमोहन सिंह ने 24 नवंबर 2016 को राज्यसभा में ऐसा क्या कहा था? राज्यसभा टीवी द्वारा प्रसारण के बाद, यू ट्यूब पर डॉ. मनमोहन सिंह का वक्तव्य एक बार फिर मैंने सुना। उनके कुछ कड़वे शब्द यों थे-‘प्रधानमंत्री द्वारा नोटबंदी की प्रक्रिया में मॉन्यूमेंटल मिसमैनेजमेंट ( भारी कुप्रबंध) हुआ, जिससे आम लोग प्रभावित हुए हैं। गरीबों के लिए 50 दिन की यातना बर्बादी का सबब बना है। इस वजह से 60 से 65 लोग जीवन से हाथ धो बैठे। शायद ज़्यादा भी। इससे क्या होगा? लोगों का बैंकिंग और करेंसी व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाएगा। क्या दुनिया के किसी देश में ऐसा हुआ कि लोगों को उनके ही पैसे बैंकों से निकालने से रोका गया हो? सर, जिस तरह से नोटबंदी हुई है, उससे हमारे देश में कृषि विकास को नुकसान पहुंचेगा, छोटे उद्योगों को क्षति पहुंचेगी, अर्थव्यवस्था में ‘इंफार्मल सेक्टर’ के जो तमाम लोग हैं, तबाह हो जाएंगे। मेरी खुद की धारणा है कि देश का जीडीपी इससे दो प्रतिशत गिरेगा। यह ठीक नहीं है कि हर दिन बैंक नये नियम और शर्तों को लागू कर रहे हैं, इससे प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्रालय, रिजर्व बैंक की छवि धूमिल होती है। इन सारे तरीकों को देखकर मुझे लगता है कि जिस तरह से नोटबंदी लागू की गई है, वह मॉन्यूमेंटल मैनेजमेंट फेल्यिोर ( प्रबंधन की जबरदस्त विफलता) का प्रतीक है। दरअसल, यह मामला संगठित लूट, और वैध रूप से डाका डालने जैसा है।’
मनमोहन सिंह जैसा शांत-शालीन नेता सरकार को लुटेरा कहे, उससे उनके समर्थकों में जबरदस्त जोश दिखा। राज्यसभा में ठोको ताली के बीच विपक्ष में से किसी ने नहीं कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री को कुछ शब्दों से परहेज करना चाहिए था। सडक़ और सोशल मीडिया पर भी उनके शब्दों के हवाले से सरकार की म•ाम्मत हुई। मगर, उद्योग, और अकादमिक जगत के लोगों को मनमोहन सिंह का आखिरी शब्द ‘आर्गेनाइज्ड लूट, लीगलाइज़्ड प्लंडर’ असहज कर गया। संसद में जो लोग शालीनता के दायरे में समालोचना की उम्मीद करते थे, उन्हें भी लगा कि मनमोहन सिंह देश की सही तस्वीर रखते-रखते सरकार के कुप्रबंधन के खिलाफ कुछ ज़्यादा कड़वा कह गये।
कीचड़ पर पत्थर मारने का नतीजा  छिहत्तर दिन बाद उसी राज्यसभा में देखने को मिला। नरेंद्र मोदी कीचड़ से कमल खिलाने वाली परंपरा के प्रधानमंत्री वाजपेयी नहीं हैं, बल्कि कीचड़ पर पत्थर फेंकनेवालों के दामन पर उससे डबल कीचड़ उछालने का माद्दा रखने वाले नेता हैं। संसद में उनकी देहभाषा से दिख रहा था- वाणी ऐसी बोलिये, जमकर झगड़ा होय/उससे फिर मत बोलिये, जो आपसे तगड़ा होय! वे लगभग ललकार रहे थे-‘आप एक उदाहरण दो, मैं दस दूंगा।’ मनमोहन सिंह क्या, अमत्र्य सेन समेत दुनिया के तमाम अर्थशास्त्री नोटबंदी को गलत साबित करके दिखायें!
प्रधानमंत्री में कमाल की  जिद , अहंकार, असंवेदनशीलता, और क्रूरता है, जिसकी वजह से 125 लोगों की मौत पर अफसोस के एक शब्द तक दोनों सदनों में नहीं निकले। लोकसभा में मल्लिकार्जुन खडग़े, भगवंत मान ने भी कल्पना नहीं की थी कि प्रधानमंत्री निजी हमला कर उन्हें बुरी तरह लपेट देंगे। ताज्जुब तब भी हुआ था, जब कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडग़े जुबान पर नियंत्रण नहीं रख सके, और पिछले सत्र में कुत्ते के हवाले से सत्ता पक्ष पर तंज किया था। प्रश्न यह है कि अपने प्रतिद्वंद्वी का मान-मर्दन करने के वास्ते राष्ट्रीय नेता कुत्ते का उदाहरण क्यों प्रस्तुत करने लगे हैं?
पिछले कुछ वर्षों से पिल्ला छाप बयानों में तेजी आई है। नये में इसकी परंपरा नितिन गडक़री से डाली है, जिन्होंने 2010 में चंडीगढ़ की सभा में कहा था, ‘लालू यादव, मुलायम सिंह शेर की तरह दहाड़ते थे, लेकिन कुत्ते बनकर सोनिया जी और कांग्रेस के तलवे चाटने लगे हैं।’ पिल्ला पुराण में प्रधानमंत्री मोदी भी पारंगत हैं। 2014 में गुजरात दंगों के हवाले से पूछे प्रश्न पर उन्होंने कहा था, जब कोई पिल्ला भी पहिए के नीचे आ जाए, तो मुझे दुख होता है।’ मोदी के इस बयान का मुसलमान नेताओं ने बुरा माना था। सरकार बनने के बाद विदेश राज्य मंत्री जनरल बीके सिंह कुत्ते के हवाले से कुत्सित आलोचना करने लगे। उन्होंने फरीदाबाद के सोनपेड़ में दलितों के बच्चों के जिंदा जलाये जाने पर बयान दिया था कि यदि कोई कुत्ते को भी पत्थर मार दे तो सरकार को जिम्मेदार ठहराने का क्या मतलब है? सरकार का एक मंत्री ऐसा असंवेदनशील बयान दे, इससे कुछ समय के लिए राजनीति में सन्नाटा पसर गया था।
नोटबंदी के दौरान पिल्ला सबसे अधिक राजनीतिक प्रहार का माध्यम बना है। 6 फरवरी 2017 को भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कोलकाता में नोटबंदी के विरूद्ध विपक्षी एकता के बारे में कहा कि यह सौ-पचास कुत्तों का समूह है, जो नरेंद्र मोदी जैसे शेर से क्या लड़ेगा! कैलाश विजयवर्गीय इससे पहले श्वान का अर्थालंकार पार्टी के नेताओं पर ही आजमा चुके हैं। 9 नवंबर 2015 को उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेता, और फिल्म स्टार शत्रुघ्न सिन्हा की तुलना कुत्ते से कर दी थी। ‘जब गाड़ी चलती है, उसके नीचे कुत्ता चलता है, तो कुत्ता समझता है कि गाड़ी मेरे दम पर चल रही है।’ बिहारी बाबू ने भी पलटवार करते हुए विजयवर्गीय को कहा था, ‘हाथी चले बाजार, कुत्ता भूंके हजार!’
यह दीगर है कि भाजपा के दर्जनों नेता कुत्ते पालने का शौक रखते हैं। स्वयं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पामेरियन पाल रखा था। सुषमा स्वराज जर्मन शेफर्ड कुत्ता पालती रही हैं, मगर पी. चिदंबरम ने 2007 के बजट में पालतू पशुओं का आहार सस्ता किया तो सुषमा स्वराज और आडवानी जी ने नारा लगा दिया, ‘कांग्रेस का हाथ, कुत्ता-बिल्ली के साथ।’ उनके इस ‘अप्रोच’ का मेनका गांधी ने बुरा माना था। मगर, कुत्तों को निकृष्ट, और उनके प्रति घृणा का भाव रखने वाली पार्टी के साथ मेनका गांधी चल रही हैं, यह भी आश्चर्यजनक है।
भारतीय राजनीति की शब्दावली सडक़ छाप क्यों होती जा रही है, यह इस समय चिंता और देशव्यापी बहस का विषय है। टी.एस. इलियट ने अपने समय में एक शब्द ‘डिसएसोसिएशन ऑफ सेंसिबिलिटी ( भावबोध की विच्छिन्नता ) का इस्तेमाल किया था, जो अंग्रेजी साहित्य में लंबे समय तक बहस का विषय रहा था। भारतीय राजनीति में भावबोध समाप्त होने के कगार पर है। यह वही संसद है, जहां शरद यादव जैसे वरिष्ठ नेता दक्षिण भारतीय नारी का नख-शिख वर्णन करते हैं। बलात्कार को लेकर मुलायम सिंह की टिप्पणियां भी अफसोसनाक नहीं हुईं।
ऐसा माहौल कुछ दशक पहले नहीं था। इंदिरा गांधी ने आपातकाल में मोरारजी देसाई और अटल बिहारी वाजपेयी को भी जेल में डाला था। प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या कभी मोरारजी देसाई ने इंदिरा जी के लिए कड़वे शब्दों का प्रयोग किया था? वाजपेयी जी विदेश मंत्री बने तो किसी चाटुकार अफसर ने उनके कक्ष से पंडित नेहरू की तस्वीर हटा दी। लेकिन हुआ उलटा। जनता पार्टी के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का पहला आदेश था कि नेहरू जी का फोटो उनके कक्ष में लगाया जाए।
23 मार्च, 2011 की बात है। संसद में उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर ‘नोट के बदले वोट’, ‘टू जी स्पैक्ट्रम’, ‘कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला’ को लेकर नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज आक्रामक थीं, और आखिर में एक शेर पढ़ा था-‘तू इधर-उधर की ना बात कर, ये बता कि काफिला क्यों लूटा। मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है!’ जवाब में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का शेर था-‘माना कि तेरे दीद के $काबिल नहीं हूं मैं, तू मेरा शौक देख, मेरा
 इंतजार देख!’ मनमोहन सिंह द्वारा शेर पूरा होते ही लोकसभा लाजवाब हो चुका था। तालियों की गडग़ड़ाहट से सदन की सारी तल्खी गायब थी। क्या मनमोहन सिंह को आज के प्रदूषित माहौल परिवर्तित कर दिया? इसी भारतीय संसद में राम मनोहर लोहिया जैसे नेता हुआ करते थे, जिन्होंने इंदिरा गांधी को ‘गूंगी गुडिय़ा’ कह दिया था। वह उस समय का कठोरतम शब्द था। वक्त देखते-देखते बदल गया, अब संसद में चोर, डाकू, लुटेरा, बलात्कारी, भ्रष्टाचारी, कुत्ता-बिलार व्यक्तिगत प्रहार के पर्यायवाची बन गये हैं।
इस देश में लोग ‘सत्तर साल की नकारा सरकार’ सुन-सुन कर पक गये। जबकि केंद्र में कुल मिलाकर कांग्रेस ने 54 साल 149 दिन शासन किया है। भाजपा आठ साल 335 दिन शासन कर चुकी है। जद (यू) एक साल 291 दिन सत्ता में रही है। सत्ता का बाकी स्वाद जनता पार्टी, जनता पार्टी सेक्युलर, जनता दल, समाजवादी जनता पार्टी ने चखा है। मगर, प्रधानमंत्री मोदी ने ‘रेनकोट’ सिर्फ डॉ. मनमोहन सिंह को पहनाया है। मोदी सरकार ने पौने तीन साल आरोप लगाते हुए काट लिए। काश! पीएम मोदी ‘रेन कोट’ उतारते, और कार्रवाई करते।
pushpr1@rediffmail.com


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