तबाह होती निरपराध जिन्दगियां

सुभाष गाताड़े : ऐसे मौके कम आते हैं जब कोई सेवारत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ‘पुलिसिंग प्रणाली’ और ‘अपराध न्याय प्रणाली’ को लेकर सवाल उठाता है। ...

सुभाष गाताड़े

सुभाष गाताड़े
ऐसे मौके कम आते हैं जब कोई सेवारत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ‘पुलिसिंग प्रणाली’ और ‘अपराध न्याय प्रणाली’ को लेकर सवाल उठाता है।
जनाब सत्येन्द्र गर्ग, जो ज्वाइंट सेक्रेटरी के पद पर हैं तथा जिन्हें उत्तर-पूर्व का प्रभार मिला हुआ है। उनकी ताजा फेसबुक टिप्पणी इस मायने में विशेष महत्व रखती है। (द टेलीग्राफ, 20 फरवरी 2017)टिप्पणी का फोकस वर्ष 2005 में दिल्ली में हुए बम धमाके में- जिनमें 67 लोग मारे गए थे- संलिप्तता के आरोप में पकड़े गए तीन मुस्लिम युवकों और ग्यारह साल सलाखों के पीछे गुजारने के बाद उनकी रिहाई पर है। मालूम हो कि अदालत ने इन तीनों के खिलाफ पुलिस द्वारा पेश सबूतों को ‘गढ़े हुए’ करार दिया था और उन्हें खारिज किया था तथा पुलिस के खिलाफ तीखी टिप्पणियां की थीं।
अपनी टिप्पणी में जनाब गर्ग लिखते हैं कि ‘आखिर आप जब किसी ऐसे अपराध के लिए सलाखों के पीछे ग्यारह साल गुजारते हैं, जिसे आपने अंजाम नहीं दिया हो, तो आप व्यवस्था से क्षुब्ध हो सकते हैं। मैं उन युवकों के मानसिक स्थिति की कल्पना कर रहा हूं, जिन्हें 11 साल सलाखों के पीछे गुजारने पड़े। आखिर यह कैसी पुलिस व्यवस्था है और किस तरह की अपराध न्यायप्रणाली है जहां निरपराधों को इस तरह जेल में सडऩे के लिए छोड़ा जा सकता है।’ अखबार के प्रतिनिधि से बात करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिन सुरक्षा अधिकारियों ने इस केस की जांच की है, उन्हें भी जवाबदेह बनाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पुलिस के इस पक्षपातपूर्ण जांच का नतीजा है कि उन 67 पीडि़तों के परिवारों के लिए भी न्याय से इन्कार किया गया है और हम शायद कभी नहीं जान पाएंगे कि आखिर इन बम धमाकों को किसने अंजाम दिया था!
इन तीन अभियुक्तों में से एक अभियुक्त रफीक शाह, जो उस वक्त कश्मीर विश्वविद्यालय का एमए का छात्र था, उसने धमाके के दिन अपने विश्वविद्यालय में कक्षाएं भी अटेंड की थीं। कॉलेज का अटेण्डेंड रजिस्टर ही नहीं, उसके तमाम सहपाठियों तथा शिक्षकों ने उसके लिए गवाही भी दी थी, मगर अपनी बेगुनाही साबित करने में उसे ग्यारह साल लग गए। वही हाल दूसरे अभियुक्त हुसैन फाजली का भी था। पुलिस के पास महज एक मोबाइल नम्बर था, जिसके आधार पर वह उसे फंसाने में मुब्तिला रही। इन अभियुक्तों का मनोबल तोडऩे के लिए पुलिस ने जो भी कुछ किया वह किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक कहा जा सकता है, उसने उन्हें मारा पीटा, निर्वस्त्र रखा, यौन प्रताडि़त किया, यहां तक कि उनकी पेंट में चूहे छोड़े गए, उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया।
इस पूरे प्रसंग को लेकर गृहमंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों का साफ कहना था कि जल्दबाजी में की जाने वाली ऐसी गिरफ्तारियां दरअसल अपने वरिष्ठों को खुश करने के लिए तथा पदक पाने के लिए की जाती हैं। एक अन्य अधिकारी ने यह भी कहा कि- सरकार को चाहिए कि जांचकर्ताओं के खिलाफ तथा जांच एजेंसियों में स्थानापन्न उनके वरिष्ठों के खिलाफ जांच बिठा दें और दोषी अधिकारियों को दंडित करें।
प्रश्न उठता है कि ऐसा कब तक चलता रहेगा। एक के बाद एक केस इसी तरह अदालत में बिना सबूतों के अभाव में खारिज होंगे और अपनी जिन्दगी के बेशकीमती साल सलाखों के पीछे गुजारने के लिए लोगों तथा उनके परिवारों की जिन्दगी में जहर घोलते रहेंगे।
ध्यान रहे अदालत की प्रतिकूल टिप्पणियों का फोकस इस बार भी दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल पर ही है, जो अपनी विवादास्पद सक्रियताओं के चलते बार-बार सुर्खियों में रहती है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब उसके अपने मुखबिर रहे दो व्यक्तियों को- इरशाद अली और मौरूफ कमर जिन्हें उसने कश्मीरी आतंकी कह कर जेल में बन्द किया था- अदालत ने रिहा किया जब उसके सामने स्पष्ट हुआ कि किस तरह यह दोनों व्यक्ति खुद पुलिस के लिए काम करते थे और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के किसी गेमप्लान में शामिल होने से इन्कार करने के चलते उन्हें उसी पुलिस के अफसरों ने फंसा दिया था। कुछ समय पहले सूचना अधिकार कानून के तहत हासिल की गई जानकारी के हिसाब से प्रस्तुत एजेंसी- जिसका निर्माण 1986 में किया गया था- वहां दोषसिद्धि दर महज 30 फीसदी है। पिछले दिनों जामिया टीचर्स सालिडारिटी एसोसिएशन की तरफ से बाकायदा एक रिपोर्ट जारी की गयी थी जिसमें इसी स्पेशल सेल ने कवर किए 24 मामलों का जिक्र था, जिसमें यही स्पष्ट हो रहा था कि किस तरह उसने निरपराधों को फंसाया और बाद में सभी बरी हो गए।
विडम्बना ही है कि यह अकेले दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल का मामला नहीं है।
अगर हम महाराष्ट्र को देखें तो वर्ष 2004 के बाद 30 से अधिक व्यक्ति जिन्हें आतंकवादी घटनाओं की संलिप्तता को लेकर पकड़ा गया था, वह सभी 2004 के बाद या तो बेगुनाह छोड़ दिए गए थे या डिस्चार्ज किए गए थे। अब्दुल वाहिद शेख- जिसे मुंबई के ट्रेनों में धमाकों को लेकर इसी तरह फंसाया गया था- और बाद में बेदाग बरी किया गया, उसने पत्रकार को साफ बताया कि किस तरह समाज में उसी सम्मान के साथ जीना असंभव होता है अगर आप पर एक बार आतंकी होने का ठप्पा लगता है। अब्दुल वाहिद को जब गिरफ्तार किया गया था तो उसका बेटा दो साल का था और बेटी महज छह माह की थी।
इस बात को भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि आतंकवाद के नाम पर इस तरह बेगुनाहों को प्रताडि़त करने का सिलसिला धार्मिक अल्पसंख्यकों तक नहीं बल्कि दलितों एवं आदिवासियों तक फैला हुआ है। नक्सल प्रभावित या डिस्टर्बड कहे गए इलाकों में आज भी ऐसे सैकड़ों बेगुनाह जेलों में सड़ते मिलेंगे जिन्हें महज जनान्दोलनों में भाग लेने के लिए पुलिस ने बन्द कर दिया और उन पर तमाम फर्जी धाराएं लगा दीं।
आखिर जब बार-बार ऐसी घटनाओं का खुलासा हो रहा है तो यह भी सोचना आवश्यक है कि आखिर क्या कदम उठाए जाएं ताकि ऐसे निरपराधों को किसी न किसी तरह मुआवजा दिलाया जा सके। आदर्श तो यह भी होगा कि संबंधित पुलिस अधिकारियों को भी अपने किए की सजा मिले। मनमोहन सिंह सरकार के दिनों में उसने कोई योजना बनाई थी ताकि आतंकी मामलों में फंसाए गए लोगों को- जिन्हें अदालत ने बेदाग बरी किया जाए- मुआवजा दिया जाए, मगर वह मामला विभिन्न कारणों से सिरे नहीं चढ़ सकी।
एक तरीका यह निकल सकता है कि जिस न्यायाधीश ने इन मामलों को देखा हो और जो इस मामले में स्पष्ट हो कि उन्हें निर्दोष को फंसाया गया है, उन्हीं को सशक्तिकृत किया जाए कि वह मुआवजे का ऐलान करें। और इस प्रणाली को प्रभावी बनाने के लिए इसके कुछ पैमाने भी तय किए जा सकते हैं। मुआवजे की राशि तय करने के लिए संबंधित अदालत पीडि़त से अधिक सामग्री भी मांग सकता है ताकि वह स्पष्ट करे कि उसका नुकसान- महज आर्थिक सन्दर्भ में नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक प्रताडऩा एवं भावनात्मक दोहन के रूप में किस तरह हुआ।  ऐेसे मुआवजे में दंडात्मक तत्व भी शामिल होना चाहिए जिसे संबंधित पुलिस अधिकारियों से वसूला जाना चाहिए। भारतीय कानून में अपराधिक न्यायालय द्वारा मुआवजा दिलाने की कल्पना प्रचलित है। अपराध दंड संहिता, 1973 की धारा 357 के मुताबिक अदालत अपराध के पीडि़त को दोषसिद्ध व्यक्ति की तरफ से हासिल जुर्माने से मुआवजा दे सकता है।


देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

सुभाष गाताड़े के आलेख

क्या महिलाओं को शांति से जीने का अधिकार नहीं है