भीम ऑटो पर राधिका वेमुला

सुभाष गाताड़े मार्च महिना के मध्य से एक अलग ढंग की यात्रा तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सडक़ों पर निकलेंगी। यात्रा एक नीले रंगे के पिकअप टरक (जतनबा) पर चलेगी- जिसे भीम ऑटो के नाम से संबोधित किया जा रहा ह...

सुभाष गाताड़े

सुभाष गाताड़े
मार्च महिना के मध्य से एक अलग ढंग की यात्रा तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सडक़ों पर निकलेंगी।
यात्रा एक नीले रंगे के पिकअप टरक (जतनबा) पर चलेगी- जिसे भीम ऑटो के नाम से संबोधित किया जा रहा है- और जिसमें अपने बेटे के साथ सवार होगी लगभग पचास साल की उम्र की राधिका वेमुला, उनका बेटा राजा और चन्द करीबी सहयोगी। दलित स्वाभिमान रथ यात्रा के नाम से संबोधित की जा रही प्रस्तुत यात्रा गांव-गांव में बनी दलित बस्तियों में पहुंचेगी और लोगों को बताएंगी कि किस तरह जातिवादी ताकतों ने दलितों को उनके अधिकारों से वंचित कर रखा है और किस तरह आज तक उनके बड़े बेटे रोहित वेमुला को- जो हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कॉलर था और ऐसी ताकतों का विरोध करता था- न्याय नहीं मिल सका है, जिसे ऐसी ताकतों के चलते आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा था।
एक साल से अधिक वक्त गुजर गया जब रोहित ने आत्महत्या की, मगर अभी भी उसे न्याय दिलाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा सके हैं बल्कि टालमटोल की जा रही है। सभी जानते हैं कि किस तरह अंबेडकर स्टूडेंटस एसोसिएशन के इस जुझारू कार्यकर्ता ने- जिसने अपनी राजनीतिक जीवन की शुरूआत वामपंथी संगठन से की थी- उसने किस तरह विश्वविद्यालय परिसर में दक्षिणपंथी विचारों एवं उनके वाहक संगठनों की मुखालिफत की थी और किस तरह केन्द्र में बैठे प्रस्तुत संगठन के आंकाओं ने दबाव डाल कर उसे तथा उसके सहयोगी मेधावी दलित छात्रों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया था, यहां तक कि कथित तौर पर दो केन्द्रीय मंत्रियों ने इस मामले में दखलंदाजी दी थी, उन्हें छात्रावासों से निकाल दिया गया, उनकी स्कालरशिप रोकी गई थी और अंतत: वह शिक्षा संस्थान के परिसर में टेंट लगा कर रहने को मजबूर किए गए थे। रोहित की आत्महत्या से पैदा आक्रोश ने देश भर में जबरदस्त सरगर्मी पैदा की थी, वाम तथा अंबेडकरवादी संगठनों ने तथा अन्य आम छात्रों ने मिल कर जोरदार आंदोलन चलाया था, जिसके चलते हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के विवादास्पद कुलपति पोडिले अप्पाराव को अस्थायी तौर पर अपने पद से हटना भी पड़ा था।
मगर जब आंदोलन की लहर का असर कम हुआ तो कुलपति ने अपना पदभार फिर ग्रहण किया और उनकी हर मुमकिन कोशिश यही है कि शिक्षा संस्थान के परिसर में असहमति की तमाम आवाजों को कुचल दिया जाए।  विश्वविद्यालय प्रशासन विरोध के सभी स्वरों को खामोश करने के लिए इस कदर बेचैन रहा है कि जब रोहित की प्रथम बरसी (17 जनवरी) पर छात्रों, युवकों तथा अन्य लोगों ने सुश्री राधिका वेमुला के साथ मिल कर रैली के जरिए विश्वविद्यालय में प्रवेश करना चाहा तो उन्हें अन्दर घुसने तक नहीं दिया गया और गेट पर ही गिरफ्तार किया गया था।
हालांकि अभी भी रोहित को न्याय नहीं मिला है, उसे आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले बेदाग घूम रहे हैं, मगर इसी दौरान एक बात अवश्य हुई है कि पिछले साल उठे आन्दोलन के ज्वार के चलते रोहित की आत्महत्या को लेकर अनुसूचित जाति जनजाति /अत्याचार निवारण/ अधिनियम, 1989 के तहत पुलिस के पास प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है जिसमें कथित तौर पर पोडिले अप्पाराव तथा दो केन्द्रीय मंत्रियों का भी जिक्र है। यह अलग बात है कि मामला वहीं लटका हुआ है, आगे की कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
इसके पीछे का उनका तर्क सीधा है - रोहित के दलितत्व से इन्कार करो और उसकी आत्महत्या से जुड़ी प्रथम सूचना रिपोर्ट में जिन-जिन लोगों के नाम दर्ज है, उनके खिलाफ दलित अत्याचार निवारण अधिनियम के सख्त प्रावधानों के तहत हो सकने वाली कार्रवाई से उन्हें बचा लो। और इसे अंजाम देने के लिए उन्होंने हर मुमकिन तरीका अपनाया है ताकि रोहित को वडेरा जाति- एक पिछड़ी जाति जिससे उसके पिता आते हैं - का दिखाया जाए।
यह अलग बात है कि इस मामले की जांच के लिए बनाए गए एक सदस्यीय रूपनवाल आयोग ने उसे दिए टर्म ऑफ रेफरेंस को लांघ कर रोहित की जाति पर अपना फैसला सुना दिया तथा उसे गैरदलित घोषित कर दिया, जबकि यह पहले से स्पष्ट था कि उन्हें इस मसले पर राय देने के लिए नहीं कहा गया था, न ही वह उसके लिए जिम्मेदार अधिकारी थे, जो ऐसा करने में सक्षम थे। इतनी सारी कवायद के बाद भी सरकार को शायद सुकून नहीं था। उन्हें शायद अन्देशा था कि रोहित की पहचान से इन्कार करने में उन्होंने निभाए विवादास्पद रोल को लेकर उनकी बदनामी हो सकती है, इसलिए उन्होंने एक और चाल चली। एक दसनापू श्रीनिवास, जो खुद एक दलित है मगर किसी हिन्दूवादी संगठन का कार्यकर्ता है, उसके माध्यम से गुंटूर के कलेक्टर के पास यह अर्जी दे डाली कि रोहित का छोटा भाई राजा वेमुला ने अपने आप को दलित साबित करने के लिए फर्जी प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किया है। विडम्बना ही है कि जिस कलेक्टर ने रोहित के दलित होने पर मुहर लगाई थी उसी ने उपरोक्त  शिकायत को जिले की जाति पड़ताल कमेटी को भेज दिया और इस समिति ने कहा कि राजा दलित नहीं है।
पूरे मामले को सरसरी निगाह से देखने वाले भी बता सकते हैं कि इस पूरे प्रसंग में केन्द्र सरकार का बहुत कुछ दांव पर लगा है। न केवल साख बल्कि केन्द्रीय मंत्रियों के पदों का सवाल भी जुड़ा है। और मामले के सभी आयामों को मददेन•ार रखते हुए उसने शायद यही तय किया है कि रोहित के दलितत्व को प्रमाणित करने का मामला जहां तक संभव हो टालते रहा जाए। अगर हम मामले की तह में जाएं तो यह पता चलता है कि मामला महज रोहित के साथ हुए अन्याय तक सीमित नहीं है और न ही उसी बहाने हिन्दुत्व की सियासत के दलितद्रोही अन्तर्वस्तु पर से परदा हटने का नहीं है। यह बार-बार देखने में आ रहा है कि विगत ढाई साल से अधिक वक्त से जब से भाजपा हुकूमत में आई है तब कई उदाहरण हमारे सामने आते हैं जहां किसी न किसी प्रकार से उसकी कोशिश दलितों के स्वतंत्र एसर्शन अर्थात स्वतंत्र दावेदारी को रोकने की रही है, भले ही वजीरे आजम मोदी अपने आप को अंबेडकर का परम शिष्य घोषित करते फिरते हों। फिर चाहे हम आईआईटी मद्रास में दलित बहुजन छात्रों द्वारा गठित फोरम अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल पर पाबंदी लगाने के प्रसंग को देखें  या मुंबई स्थित अंबेडकर भवन- जिसका निर्माण खुद डॉ. अंबेडकर ने किया था- उसे ध्वस्त करने के मामले पर गौर करें  या राजस्थान के छात्रावास में रह रही मेधावी छात्रा डेल्टा मेघवाल के साथ हुए बलात्कार और उसकी हत्या के मामले को रफा-दफा करने की कोशिशों को देखें या देश के अग्रणी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की बेहद प्रगतिशील एवं समावेशी प्रवेश नीति जिसने वंचित तबकों के वहां प्रवेश को बेहद सुगम बनाया था उसे कमजोर करने की, खतम करने की विश्वविद्यालय प्रशासन की कोशिश देखें।
और यह अकारण नहीं था कि पिछले साल जब रोहित को न्याय दिलाने तथा देश भर के शिक्षा संस्थानों में भेदभाव की समाप्ति के लिए रोहित अधिनियम लागू करने को लेकर देशव्यापी आंदोलन हो रहा था और छात्र-युवा समुदाय ही नहीं, बल्कि दलित तबकों में बढ़ती बेचैनी ने हुकूमत को बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर होना पड़ा था, उन्हीं दिनों समूची केसरिया पलटन ने मीडिया से सांठगांठ करके- फिर भले उसके लिए नकली वीडियो का इस्तेमाल करना पड़े - ‘राष्ट्रवाद’ के मसले को उछाला था तथा रोहित को न्याय दिलाने के मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश की थी। जब तक इन पंक्तियों से आप रूबरू होंगे नीले ट्रक पर सवार होकर निकली राधिका वेमुला की इस स्वाभिमान यात्रा का आगा•ा हो चुका होगा। मौजूदा माहौल को देखते हुए और इस अनुभव पर गौर करते हुए कि केन्द्र में सत्तासीन सरकार किसी भी मामले में उत्पीडि़त तबके की मांगों को मानना तो दूर उनके प्रति संवेदनशीलता दिखाने से भी दूरी बनाए रखती है, इस बात का कयास लगाना मुश्किल नहीं है कि यात्रा का परिणाम क्या निकलेगा? नतीजा जो भी निकले, यह तो स्पष्ट है कि इस अनोखे संघर्ष में जिसके न्यायपूर्ण होने पर कोई सन्देह नहीं कर सकता उन्हें नैतिक जीत पहले ही मिल चुकी है।रोहित गुजर गया है, मगर जिस मकसद के लिए वह लड़ रहा था, वह अभी अधूरा है।
प्रश्न उठता है कि कौन आगे आएगा ताकि आइंदा किसी रोहित के सामने इस तरह अपनी जीवनलीला अधबीच ही समाप्त करने की नौबत न आए!


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