चुनाव चिन्ह नहीं, जनता का विश्वास निर्णायक

शीतला सिंह : समाजवादी पार्टी का विवाद, जिसका कुछ ठिकाना नहीं कि कब क्या रूप ले लेगा, अब उसके चुनाव चिन्ह, झण्डे व नाम तक पहुंच गया है।...

चुनाव चिन्ह नहीं, जनता का विश्वास निर्णायक
शीतला सिंह

शीतला सिंह
समाजवादी पार्टी का विवाद, जिसका कुछ ठिकाना नहीं कि कब क्या रूप ले लेगा, अब उसके चुनाव चिन्ह, झण्डे व नाम तक पहुंच गया है। सोमवार को पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने चुनाव आयोग पहुंचकर दावा किया चूंकि असली वे हैं, इसलिए साइकिल चुनावचिह्न उन्हें ही मिलना चाहिए। दूसरी ओर मंगलवार को रामगोपाल यादव ने भी आयोग के कार्यालय जाकर साइकिल पर हक जताया और कहा कि पार्टी के नब्बे प्रतिशत विधायक व सांसद अखिलेश के साथ हैं। यह बात और है कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी से लेकर ज्यादातर विधि विशेषज्ञों और जानकारों का मानना है कि चूंकि इस प्रकार के विवादों के निपटारे की प्रक्रिया लम्बी होती है और चुनाव सिर पर हैं, इसलिए चुनाव निशान फ्रीज करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।
फि लहाल, निर्णय चुनाव आयोग को करना है और वह कुछ भी हो, बड़ा सवाल यही रहेगा कि किसी दल या नेता की लोकप्रियता के मापन में चुनावचिह्नों की क्या भूमिका होती है? उसमें परिवर्तन निर्णायक हुआ करता है या परिवर्तन के बाद युग की मान्यताएं, मतदाताओं के दृष्टिकोण और पसन्द सर्वोपरि होती हैं।
इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस का पुराना चुनावचिन्ह दो बैलों की जोड़ी था, जिसे 1969 में पार्टी के विभाजन के बाद फ्रीज कर दिया गया। उसके एक गुट को, जो दावा करता था कि प्राचीन और असली वह है, संगठन कांग्रेस के नाम पर चरखा चुनावचिन्ह आबंटित किया गया, जबकि दूसरे गुट को गाय और बछड़ा। 1977 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद वह पुनर्विभाजित हुई तो उसका चुनाव चिन्ह फि र बदला। तब इंदिरा गांधी की कांग्रेस को हाथ का पंजा चुनाव चिन्ह मिला तो चरण सिंह की सरकार गिरने के बाद मध्यावधि चुनाव में विभाजन की हानि से सामना होने के बजाय उनको पहले से अधिक सीटें मिलीं और उन्हें फि र प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला। उनकी हत्या के बाद तो सहानुभूति की ऐसी लहर चली कि अगले आम चुनाव में उनके बेटे राजीव गांधी को उसी चुनाव चिह्न पर ऐतिहासिक जनसमर्थन व रेकार्ड सीटें मिलीं। लेकिन यही हाथ का पंजा 1989 में उनकी जीत में सहायक नहीं बन सका।
जाहिर है कि दलों की जीत-हार में चुनावचिन्ह की निर्णायक भूमिका नहीं होती। निर्णायक तत्व होते हैं-उनके प्रति जनता का विश्वास, सोच, पसन्द, लगाव व आस्था। कई बार सहानुभूति की लहर इन्हें और बढ़ा देती है। यही कारण है कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की केन्द्र में बनी तीन लगातार सरकारों के कुल छ: वर्षों के बाद कांग्रेस यूपीए बनाकर सत्ता में आई तो यूपीए दो के दौरान भीं उसकी सीटें बढ़ी हीं। लेकिन 2014 में उसे लोकसभा में विपक्ष की नेता बनने भर को भी सीटें नहीं मिल पाईं और भाजपा को पहली बार अकेले दम पर लोकसभा में बहुमत मिला।
यही बात भाजपा के बारे में भी कही जा सकती है, जिसका नाम पहले भारतीय जनसंघ था। 1977 में जनता पार्टी में विलीन होने और 1979 में विभाजन के फलस्वरूप उससे बाहर आने के बाद उसका नाम, संविधान व चुनाव चिन्ह सब बदले। यहां तक कि झण्डा भी एकरंगे केसरिया के बजाय दोरंगा हो गया और मुसलमानों के पार्टी में प्रवेश का रास्ता भी खोल दिया गया। हम जानते हैं कि अटलबिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व में वह चार बार देश की सत्ता में पहुंची। वह अयोध्या में राममंदिर आन्दोलन के बल पर आगे बढ़ी थी लेकिन 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उसका मत अनुपात घटा तो तभी बढ़ सका जब 2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी इससे विरत हो गये।
एक और उदाहरण आंध्र प्रदेश आधारित पार्टी तेलगुदेशम का है, जिसका गठन फिल्म अभिनेता नन्दमूरि तारक रामाराव ने किया था। वे पहले राजनीति में नहीं थे, न कभी चुनाव लड़े थे, लेकिन तेलगु अस्मिता और उसकी रक्षा का उनका नारा मतदाताओं के दिलों को छू गया और वे नई पार्टी व चुनाव चिन्ह लेकर सत्तारूढ़ हो गये। जो कांग्रेस 1977 के चुनाव में भी आन्ध्र और कर्नाटक में नहीं हारी थी, उसे हराकर वे दोबारा मुख्यमंत्री बने। पारिवारिक द्वन्द्व और विद्रोह भी उनके जीवनकाल में सफ ल नहीं हो पाया। तमिलनाडु का इतिहास भी इसी प्रकार का है। दलितों की अस्मिता, सम्मान और विकास को लेकर नयी पार्टी बनी तो उसने सत्तारूढ़ कांग्रेस को हरा दिया। एमजी रामचन्द्रन की मृत्यु के बाद वह दो भागों में विभाजित हो गई, लेकिन नयी पार्टी ही इस समय सत्तारूढ़ है। रामचन्द्रन की मित्र जयललिता को पिछले लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक सीटें मिली थीं और विधानसभा चुनाव में भी वे परम्परा के विपरीत दोबारा मुख्यमंत्री बनीं।
इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में वामपंथी मोर्चा कांग्रेस को हराकर सत्ता में आया और 35 वर्षों तक सत्तारूढ़ रहा। अब उसे किनारे लगा देने वाली ममता बनर्जी कांग्रेस की विद्रोही नेता ही है, जो तृणमूल कांग्रेस के बैनर पर लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनी हैं। उन्होंने अपनी सहयोगी कांग्रेस को भी किनारे किया लेकिन उनकी लोकप्रियता नहीं घटी। इसलिए यह भी नहीं माना जा सकता कि विभाजन के फलस्वरूप दलों का अस्तित्व या प्रभाव समाप्त हो जाता है।
लोकतंत्र में दलों के पुराने प्रभाव ही निर्णायक होते तो यह कैसे होता कि स्वतंत्रता के बाद राजे महाराजाओं व जमींदारों की बैलगाड़ी चुनाव चिह्न वाली पार्टी 1952 में कुछ सीटों को छोडक़र देशभर में बुरी तरह हारी और जो कुछ राजे-महाराजे जीते भी, वैयक्तिक कारणों से। इस शिकस्त के बाद पार्टी को दोबारा चुनाव लडऩे का साहस ही नहीं हुआ। 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद प्रचार था कि इन्दिरा गांधी को तो विपक्ष की नेता बनने भर को भी सीटें नहीं मिल पायेंगी क्योंकि कांग्रेस के अनेक पुराने व नामचीन नेता उनके विरोधी थे। लेकिन इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ के नारे, राजा-महाराजाओं के प्रिवीपर्स समाप्त करने और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे कार्यक्रमों से जनता में उनके प्रति ऐसा विश्वास जागा कि अनुमानों के विपरीत उन्हें बहुमत से भी अधिक सीटें मिलीं। 1975 में उन्होंने देश पर संकटकाल थोपकर विपक्षी दलों को हतोत्साहित किया और 1977 में अचानक चुनाव की घोषणा की तो विपक्षी नेता कहते थे कि उन्हें चुनाव में फं साया जा रहा है। लेकिन संवादमाध्यम, ज्योतिषी और भविष्यवक्ता कोई अपने मूल्यांकन में नहीं बता पाया कि इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी तक चुनाव हारने जा रहे हैं।
लेकिन परिवर्तनकामी मतदाताओं ने, जो न वाचाल होते हैं और न अपने प्रभावों का प्रदर्शन ही करते हैं, जनता पार्टी के बैनर पर एकजुट विपक्ष को जिताकर सत्ता तक पहुंचा दिया और इंदिरा गांधी के जो पुराने सहयोगी और साथी जीते भी, उनमें से 171 उनका साथ छोडक़र अलग हो गए। अलबत्ता, आगे चलकर स्वार्थजनित विभाजनों के बाद वे हारे तो इन्दिरा गांधी के सामने फि र घुटने टेककर वापस आ गये।
निस्संदेह, राजनीति में दलों की सफलता का मूल तत्व उनमें जनता का विश्वास होता है। वह संवाद माध्यमों और प्रचारकों की सुनती तो है लेकिन फैसला अपने मन, स्वभाव, पसन्द और नापसन्द के आधार पर स्वयं करती है। वह अपढ़, निरक्षर और गरीब हो सकती है लेकिन राजनीतिक फैसलों में उसकी भूमिका सदैव ही लोकतंत्र की रक्षा में सहायक रही है। सपा के संदर्भ में भी चुनाव चिन्ह या पार्टी का नाम नहीं उसके गुटों के नेताओं का स्वभाव, चरित्र, कार्यक्रम, योजना, नीति व जन विश्वास ही निर्णायक होंगे। हां, खुद में जनविश्वास की रक्षा के उपाय उसके नेताओं को ही सोचने हैं।


 

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