कृपया राष्ट्र व देश को संकुचित न करें

शीतला सिंह : दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रामजस कॉलेज में वाम व दक्षिणपंथी छात्रों के टकराव के बाद ‘मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से नहीं डरती’...

शीतला सिंह

शीतला सिंह
दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रामजस कॉलेज में वाम व दक्षिणपंथी छात्रों के टकराव के बाद ‘मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से नहीं डरती’ जैसी बहुचर्चित फेसबुक पोस्ट को लेकर चर्चा में आई लेडी श्रीराम कॉलेज की छात्रा गुरमेहर कौर अपनी अभिव्यक्तियों के कारण केन्द्र सरकार, उसका नेतृत्व कर रही भाजपा व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के निशाने पर आईं और उन्हें रेप करने तक की धमकी दी गयी, तो विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों के छात्र-छात्राओं ने मुखर होकर उनका जैसा समर्थन किया, उससे उम्मीद है कि अंधताओं की भांग का नशा पूरे कुएं में फैलने से पहले खत्म किया जा सकेगा। इस समर्थन से गुरमेहर का आत्मविश्वास भी वापस आया है, जो इससे पहले छात्र नेता या विचारक की अर्जित छवि त्यागकर अपने गृहनगर जालंधर वापस चली गयी थीं और सबको शुभकामनाओं  के साथ अपेक्षा की है कि उन्हें भविष्य के लिए अकेला छोड़ दें। अब उन्होंने प्रसन्नता सूचक नये ट्वीट में लिखा है-दो हजार लोग एकजुट। मेरे सारे दोस्त। मेरे प्यारे शिक्षक। काश, मैं भी वहां होती।’ यह और बात है कि उनके पितामह और घर के अन्य सदस्यों को लगता है  कि वे अभी बच्ची हैं और इस कारण उनमें चिन्तन शक्ति का पूर्ण विकास नहीं हो पाया है।
25 शत्रुओं को मार गिराने वाले उनके पिता कारगिल के युद्ध में शहीद हो गये थे। इसलिए वे चर्चा में आयीं तो उनके आलोचक पूछ रहे थे कि क्या शहीद की बेटी को पाकपरस्त होना शोभा देता है। लेकिन अब वे इस सवाल के सामने खड़े नहीं हो पा रहे कि क्या शहीद की बेटी को बलात्कार की धमकी देना उचित है और ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? फिलहाल, पुलिस ने धमकाने वालों पर रिपोर्ट दर्ज कर ली है और कार्रवाई का इंतजार है।
लेकिन वह प्रश्न, जिससे केन्द्र सरकार के दो मंत्रियों ने इस मामले को जोड़ रखा है, देशभक्ति और देशद्रोह का है, जो अवश्य ही विचारणीय है। गुलमेहर ने अपने पिता की शहादत के लिए पाकिस्तान के बजाय युद्ध को दोषी बताया, तो केन्द्रीय गृहराज्यमंत्री ने तमक कर पूछा था कि जाने कौन उनके दिमाग को इस तरह ‘गंदा’ कर रहा है। माकपा नेता सीताराम येचुरी की ओर से उन्हें इसका जवाब इस रूप में मिला था कि सबको पता है कि किरण रिजिजू का दिमाग कौन गंदा करता है। इसके बाद हरियाणा के एक बहुचर्चित मंत्री के मुंह से जो फूल झड़े हैं, उन्होंने गुरमेहर के समर्थन में उठी हर आवाज को पाकपरस्त बताकर उसकी देशभक्ति पर सवाल खड़ा कर दिया है।    
जहां तक देशप्रेम व राष्ट्रभक्ति का सवाल है, इन दोनों शब्दों में भिन्नताएं हैं। देश भूमि का टुकड़ा भर नहीं होता, बल्कि उसमें रहने वालों से बनता है और उसके मूल संयोजक तत्व व्यक्ति ही होते हैं। हां, भूमि के साथ उस देश में रहने वाले लोगों के सम्बन्ध अन्योन्याश्रित हैं। चूंकि ‘व्यक्ति’ जीवन्त है, इसलिए उसकी भूमिका भूमि से भिन्न है। जीवन्तता में ही विचार, निर्णय व कार्यशक्ति हो सकती है, इसलिए उसे महत्वपूर्ण मानना ही पड़ेगा। व्यक्तिविहीन देश की तो परिकल्पना ही संभव नहीं है। इसी प्रकार राष्ट्र और राष्ट्रवाद शब्दों की भी नये संदर्भों में नई व्याख्या की आवश्यकता है। सवाल यह भी है कि नेशन, कौम और राष्ट्र किस सीमा तक समानार्थी हैं और राष्ट्र की नई परिभाषा कैसे की जानी चाहिए? क्या राष्ट्र देश से बड़ा संयोजक तत्व हो सकता है? ऐसा होता तो यूरोप, जो एक राष्ट्र है और जिसकी भाषा, धर्म, संस्कृति व जीवनदर्शन में एकरूपता है, वह 18 भागों में बंटा न होता। जिस राष्ट्रमंडल का भारत सदस्य है, वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर आधारित है। जो देश कभी ब्रिटिश साम्राज्य के अंग थे, स्वतंत्र होने के बाद उन्हें उसका अंग मान लिया गया। ब्रिटेन की महारानी ही इस संगठन की प्रमुख हैं। लेकिन यह परिस्थितियों का सामना करने के लिए पुरानी यादों को संजोने का प्रयोग मात्र है और इसके सदस्य देश एक दूसरे के आलोचक व विरोधी भी हैं।
अपने बहुधर्मी, बहुभाषाई व बहुसंस्कृति वाले स्वरूप के कारण है कि भारत अभी राष्ट्र नहीं बन पाया है। यह कई राष्ट्रों का समूह है, जो अपने अस्तित्व से यह संदेश भी देता है कि पुराने शब्दों, कल्पनाओं और परिभाषाओं से पृथक नये संदभों व अर्थों में ही जीना होगा। इसीलिए हमने पूर्वोत्तर के असम क्षेत्र की जातीय, धार्मिक और कबीलाई मानसिकता को तुष्ट करने के लिए छोटे-छोटे सात राज्य बना दिये हैं, जबकि नागालैंड में जन्मे नये सांस्कृतिक विवाद को, जिसमें महिलाओं को द्वितीय श्रेणी का मानने का आग्रह है, कोई स्वीकार नहीं कर पा रहा।
1947 में अंग्रेजों द्वारा अलग देश की मुस्लिम लीग की मांग स्वीकार कर देश का विभाजन स्वीकार करने के बावजूद स्वतंत्र भारत की नई परिकल्पना, जो उसकी संवैधानिक परिकल्पना व संकल्प में दिखती है, भिन्न है। धार्मिक मान्यता ही प्रमुख होती तो कश्मीर इस भारत का अंग नहीं होता। यह और बात है कि विभिन्नताओं के कारण हम किसी-किसी को विशेषाधिकार देकर भी स्थिति को संभालते हैं। कश्मीर के संदर्भ में अनुच्छेद 370 इसका उदाहरण है। ऐसे ही पूर्वोत्तर क्षेत्र और आन्ध्र के लिए भी व्यवस्थाएं हैं।
जो लोग भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं, वे हिन्दू की नई परिभाषा बताते हैं। यह कि इस देश में रहने वाले सभी हिन्दू हैं। लेकिन वे उसके अंतर्विरोधों में फंसकर अस्वीकार्य हो जाते हैं। पूजा पद्धति के आधार पर देश का न बंटना सुनिश्चित करना है तो यह कैसे हो सकता है कि एकेश्वरवाद और बहुदेववाद में विश्वास करने वालों की संज्ञा एक ही हो जाये।  संज्ञा का यह कथित एक्य आमतौर से दुर्भाव पैदा करने के निहित स्वार्थों के अधीन होता है। फिर धर्म ही निर्णायक व संयोजक होता तो पाक को तोडक़र बंगलादेश क्यों बनता? इसी प्रकार 57 इस्लामी देश सबसे अधिक आपस में भी क्यों लड़ते? आईएसआईएस इस्लामी मान्यता के लोगों की हत्या करने में ही सबसे अग्रणी क्यों होता? जिन बौद्धों को आज हिन्दू बताया जा रहा है, भारतीय ब्राह्मण संस्कृति का आग्रह उनके इस देश से सफाए का कारण क्यों कर बनता? अनीश्वरवाद की कल्पना तो शास्त्रों और उपनिषदों में पहले से विद्यमान थी। बुद्ध और उनकी मान्यता का समाज तो उसके बाद बना।
भारत से बौद्धों का सफाया करने को मान्यता देकर उन्हें हिन्दुत्व का बोधक बताना किसी की भविष्य की योजना हो सकती है, लेकिन एकात्मता का आधार नहीं हो सकती। इसीलिए गुरमेहर के दादा ने कहा कि मेरी पोती देशद्रोही नहीं है। अपने पिता की शहादत के लिए युद्ध को जिम्मेदार बताने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल देशद्रोह का कारण कैसे बन सकती है? ऐसे में अच्छा हो कि देश, राष्ट्र, उनकी भक्ति या उनसे प्रेम जैसे शब्दों को एक बार पुन: परिभाषित किया जाये, जो हर किसी पर लागू हो। यह काम संविधान सभा का कार्य करने वाली संसद ही कर सकती है। हां, शब्दों के नाम पर देश के बंटवारे का काम कतई नहीं होना चाहिए और इस देश में रहने वाले व्यक्तियों को भी इसी रूप में मानना चाहिए कि हम इसकी एकता के पक्षधर हैं, नई परिभाषा के आधार पर एकता तोडऩे के नहीं।


देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

शीतला सिंह के आलेख