वैयक्तिक स्वतंत्रताओं की रक्षा आवश्यक

शीतला सिंह : देश में अपराध और दण्ड की जो व्यवस्था स्वतंत्रता पूर्व से चली आ रही थी, पुराने कानूनों में कुछ नए पैबन्द जोडक़र अभी भी वही आगे बढ़ायी जा रही है। ...

शीतला सिंह

शीतला सिंह
देश में अपराध और दण्ड की जो व्यवस्था स्वतंत्रता पूर्व से चली आ रही थी, पुराने कानूनों में कुछ नए पैबन्द जोडक़र अभी भी वही आगे बढ़ायी जा रही है। उसमें परिमार्जन केवल इतना किया गया है कि जेलों को दण्डगृह के बजाय सुधारगृह बना दिया गया है और जिन बन्दियों को सश्रम कारावास मिला है, उनसे काम ही नहीं लिया जाता बल्कि दस्तकारी व निर्माण आदि के कार्यों में दक्ष भी किया जाता है। ताकि वे जेल से निकलकर अच्छे नागरिक की भूमिका निभा सकें। लेकिन आम धारणा आज भी यही है कि जेलें वास्तव में ‘अपराधी बनाने की केन्द्र’ हैं और जो एक बार उनके अन्दर जाता है, उसके मन से उनका डर समाप्त हो जाता है। लेकिन विचाराधीन बन्दियों के साथ सलूक का सवाल इससे अलग है। यह भी कि उन्हें लम्बे अरसे तक विचाराधीन रखना कितना उचित है?
इसीलिए इससे सम्बन्धित कानून में थोड़े परिवर्तन भी हुए हैं और किसी विचाराधीन कैदी के खिलाफ  साठ दिनों में आरोपपत्र नहीं दाखिल होता तो वह जमानत का हकदार हो जाता है। लेकिन उनमें अनेक ऐसे भी हैं, जिन पर एक नहीं कई-कई मुकदमे हैं और वे लम्बी अवधि तक चलते व बढ़ते रहते हैं। दूसरी ओर वर्तमान निर्वाचन पद्धति के अनुसार बाहुबली व अपराधी सरगना भी चुनाव लडऩे में सक्षम हैं और राजनीति में उनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। उनमें सर्वाधिक सत्तारूढ़ दलों में होते हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा के ताजा चुनाव में भाजपा ने 403 में से जो 325 सीटें जीती हैं, उनमें उसके 137 निर्वाचित विधायकों की छवि आपराधिक बतायी जा रही है। दूसरे दल इस मामले में उससे पीछे हैं, लेकिन हम जानते हैं कि इन प्रवृत्तियों से कोई भी दल मुक्त नहीं है।
इस सिलसिले में प्रमुख प्रश्न यही है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता का, जो उसके संविधानप्रदत्त मूल अधिकारों में शामिल है, हरण कब, किन परिस्थितियों में और कितनी अवधि के लिए करना उचित है? साथ ही विचाराधीन और दोषसिद्ध बन्दियों में कितना अन्तर होना चाहिए? फिलहाल, स्वतंत्रता दोनों की छीनी जाती है। उन बन्दियों को छोडक़र जो अपनी हैसियत, प्रभावों और कानूनी विधानों के अनुसार विशिष्ट श्रेणी पाने योग्य माने जाते हैं और जिनके खाने-पीने व रहने की अलग व्यवस्था भी रहती है, आम या साधारण कैदियों के साथ जेल में लगभग समान व्यवहार ही होता है। उनमें कोई स्वतंत्रता के लिए जमानत की प्रतीक्षा करता है तो कोई पैरोल के लिए चिन्तित है ताकि जेल से बाहर निकल सके। दोनों के लिए निर्धारित मानदण्ड हैं, जिनके अनुसार वे इसका लाभ उठाते या वंचित रह जाते हैं।
एक वक्त सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीएन भगवती ने टीका की थी कि फ ांसी पर, जिसकी सजा ‘रेयरेस्ट आफ  रेयर’ अपराधों में ही दी जाती है, चढऩे वाले अति साधारण, कमजोर, गरीब, आदिवासी, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक ही होते हैं। आज तक कोई बड़़ा आदमी फांसी पर नहीं चढ़ा। अब इसे न्याय की कमजोरी कहा जाये या प्रस्तुत साक्ष्यों पर न्यायाधीशों द्वारा प्रयुक्त किया जाने वाले विवेक का सामथ्र्य कि जो बड़े-बड़े वकीलों को अपने पक्ष में खड़ा कर सकते हैं, न्याय की परिभाषाओं का लाभ उठाकर फांसी चढऩे से बच जाते हैं। कभी उन्हें फांसी होती भी है तो वे राष्ट्रपति के विवेक का लाभ उठा लेते हैं, जिसे सजाओं के शमन या माफी का अधिकार है।
जिन बन्दियों पर देशद्रोह, आतंकवाद और उनसे मिलते-जुलते नामों वाली धाराओं के मुकदमे चलते हैं, वे लम्बी अवधि तक जमानत के पात्र नहीं माने जाते। बाद में वे साक्ष्य के अभाव में रिहा भी हो जायें तो उनकी स्वतंत्रता के हनन की क्षतिपूर्ति किसी भी प्रकार संभव नहीं हो पाती है। आरोपित होने पर जो बदनामी उनके साथ नत्थी हो जाती है, उसे छोड़ भी दिया जाये तो 10-10 वर्षों तक और कई बार इससे भी ज्यादा अवधि तक जेलों में बंद रहने के बाद वे दोषमुक्त होते भी हैं तो तब तक आयु बढ़ जाने के कारण नौकरियों की पात्रता से वंचित हो जाते हैं। इससे उन्हें जो मानसिक व शारीरिक कष्ट मिलता है, उसके परिहार के लिए उनके पास एकमात्र उपाय यही होता है कि वे इसके लिए अभियोजन को जिम्मेदार ठहराकर मुआवजे का केस चला सकते हैं।
लेकिन तब भी सवाल रह जाता है कि उनके खिलाफ  जो कुछ हुआ, वह किसी दुर्भावना या लाभ उठाने की प्रवृत्ति के फलस्वरूप हुआ या स्वाभाविक प्रक्रिया का अंग था? ऐसे मामलों में अभियोजन को दोषी ठहराना प्राय: कठिन होता है। साथ ही जांच से लेकर फैसला करने वाले तक सारे अधिकारी विशेषाधिकारों से सम्पन्न होते हैं और उनको अपने कर्तव्यों के निर्वाह के दौरान लिये गये फैसलों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए किसी व्यक्ति की हत्या में अभियोजन द्वारा दोष सिद्ध करने के बाद अदालत के आदेश से कोई व्यक्ति फांसी पर चढ़े और उसके बाद जिस व्यक्ति की हत्या में उसे फांसी हुई, वह स्वयं अदालत में प्रस्तुत होकर कहे कि मैं तो मरा ही नहीं था और न वह लाश मेरी थी और सजा पाने वाला निर्दोष था, तो भी इसके लिए किसी पुलिस अधिकारी या न्यायाधीश को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह तर्क उन सबकी रक्षा कर देता है कि उन्होंने तो निर्धारित विधि और मानदण्डों के अनुसार निर्णय किया था।
लेकिन जो बन्दी लम्बी अवधि तक जेलों में बंद रहने को मजबूर होते हैं और अभियोजन द्वारा जिन्हें जेल में रखने का औचित्य सिद्ध किया जाता है, निर्दोष सिद्ध होने पर उनके हितों की रक्षा की कोई न कोई व्यवस्था तो होनी ही चाहिए। विशेषाधिकारों की वह व्यवस्था तो राज्य की ही देन है जिसके चलते इन निर्दोषों के साथ हुए अन्याय के लिए किसी अधिकारी को जिम्मेदार और दोषी नहीं माना जाता। इसलिए उनकी वैयक्तिक स्वतंत्रता के पक्ष में समाधान के लिए कोई नयी प्रक्रिया अपनायी ही जानी चाहिए। हम जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति को जेलों में रखने की राज्य की ‘चाह’ कानूनी विवशताओं का नतीजा कम और अन्य स्वार्थों व इच्छाओं का परिणाम ज्यादा होती हैै। यह स्थिति कैसे समाप्त हो, यह प्रश्न भी विचारणीय है ही। इस सिलसिले में ज्यादा नहीं तो दण्ड के लिए विचाराधीन रहते हुए कैदी की जो स्वतंत्रता समाप्त की जाती है, उसकी अवधि को तो कम किया ही जा सकता है, जिससे उसकी पीड़ा घट सके।
यह दायित्व राज्य का ही है, जो अपनी विधायी शक्तियों के माध्यम से ऐसे उपाय कर सकता है। इसकी ओर ध्यान नहीं दिया गया तो वैयक्तिक स्वतंत्रता किसी नागरिक के मूल अधिकार के बजाय संविधान में वर्णित एक शब्द मात्र रह जायगा, जिससे उसका महत्व और उद्देश्य ही समाप्त हो जायेगा। अपराध के बाद आरोपित को जेल भेजना और उसकी स्वतंत्रताओं का अपहरण राज्य के कानून की आवश्यकताओं में से है। लेकिन इस आवश्यकता के दुरुपयोग से बचाव के प्रश्न पर विचार होना ही चाहिए। लोकतंत्र इसके बिना अधूरा रहेगा।


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