किसान को बेचारा बनाता शासक वर्ग

किसानों की समस्या को समझने वालों ने इस देश में कभी भी सत्ता नहीं संभाली। जब से ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत पर कब्जा किया तब से ही खेती की अनदेखी होती रही है...

किसान को बेचारा बनाता शासक वर्ग
Farmer
शेष नारायण सिंह

किसानों की समस्या को समझने वालों ने इस देश में कभी भी सत्ता नहीं संभाली। जब से ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत पर कब्जा किया तब से ही खेती की अनदेखी होती रही है। सत्ताधीशों की सुविधा के अनुसार खेती करने के अवसर हमेशा से ही उपलब्ध कराये जाते रहे हैं। ऐसा नहीं है कि अपने देश में अधिक नकदी देने वाली फसलों की कमी रही हो। लेकिन उनको भी शासक अपने हित साधन के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं नील, अफीम, रबड़, चाय, पिपरमिंट, गन्ना, काफी, मसाले आदि ऐसी फसलें हैं जो किसान को सम्पन्न बना सकती थीं लेकिन सरकारों ने ऐसा होने नहीं दिया।

करीब चालीस साल बाद क्वांर के महीने में  गांव गया। मेरे गांव में पांडे बाबा वाला महीना बहुत ही खूबसूरत होता है। न गर्मी न ठंडी, तरह-तरह की फसलों की खुशबू हवा में तैरती रहती है। अन्य इलाकों में जिस त्यौहार को  विजयादशमी या दशहरा कहा जाता है उसको मेरे क्षेत्र में पांडे बाबा ही कहा जाता था।  पांडे बाबा हमारे यहां के लोकदेवता हैं।  उनको धान चढ़ाया जाता था।  उनका  इतिहास  मुझे पता नहीं है लेकिन माना जाता था कि पांडे बाबा की पूजा करने से बैलों का स्वास्थ्य बिल्कुल सही रहता है।  गोमती नदी के किनारे दक्षिण में धोपाप है और नदी के उस पार पांडे बाबा का स्थान है। जहां उनका ठिकाना है उस गांव का नाम बढ़ौनाडीह है लेकिन अब उसको पांडे बाबा के नाम से ही जाना जाता है। आज से चालीस साल पहले हर घर से कोई पुरुष सदस्य पांडे बाबा के मेले में दशमी के दिन  जाता था हर गांव से हर घर से लोग जाते थे।  बैलों की खैरियत तो सबको चाहिए होती थी। मैं पहली बार आज से पचास साल पहले अपने गांव के कुछ वरिष्ठ लोगों के साथ गया था, मेरे बाबू नहीं जा सके थे।  उन दिनों दशमी तक धान की फसल तैयार हो चुकी होती थी, अब नहीं होती। इस बार मैंने देखा कि धान के पौधों में अभी फूल ही लग रहे थे, यानी अभी महीने भर की कसर है।

अब कोई पांडे बाबा नहीं जाता। क्योंकि अब किसी को बैलों के अच्छे स्वास्थ्य की ही नहीं है। अब खेती में बैलों की कोई भूमिका नहीं है। पहले बैलों से हल चलते थे, सिंचाई के लिए भी कुएं से पानी निकालने में बैलों की अहम भूमिका होती थी, बैलगाड़ी या लढा से सामान ढोया जाता था। यानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बैलों की बहुत बड़ी भूमिका होती थी। अब नहीं होती। अब ट्रैक्टर से खेत जोते जाते हैं, ट्यूबवेल से सिंचाई होती है, ट्राली से माल ढोया जाता है।  अब ग्रामीण व्यवस्था में बैलों की कोई भूमिका नहीं होती।  इसलिए अगर घर में पल रही गाय बछड़े को जन्म दे देती है तो लोग दुखी हो जाते हैं। अभी तक तो बछड़े को औने-पौने दाम पर बेच दिया जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होता। गाय या बछड़े को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना अब असंभव है। स्वयंभू गौरक्षक ऐसा होने नहीं देते।  

नतीजा यह हो रहा है कि एक ऐसे जानवर को बांध कर खिलाना पड़ रहा है जो गाय और भैंस का चारा खाता है और किसान की आर्थिक स्थिति को कमजोर करता है। पिछले करीब चार महीने से एक नई परम्परा शुरू हो गई है। अब लोग अपने गांव से थोड़ी दूर ले जाकर बछड़ों को रात बिरात छोड़ आते हैं।  वे खुले घूमते हैं और जहां भी हरी फसल दिखती है, चरते खाते हैं। कुछ साल पहले हमारे गांव में पता नहीं कहां से नील गाय बहुत बड़ी संख्या में आ गए थे। अब संकट का रूप धारण कर चुके हैं। बताते हैं कि नील गायों को डराने के लिए 10-15 साल पहले सरकारी तौर पर जंगली सुअर छोड़ दिए गए थे। सूअरों ने नील गाय को तो भगाया नहीं, खुद  ही जम  गए।  अब तक हरियाली वाली फसलें नील गाय खाते थे। आलू, शकरकंद, प्याज, लहसुन, गाजर, मूली आदि के नीचे होने वाली फसलों को सुअर नुकसान पहुंचा रहे थे और अब इसी जमात में वे बछड़े भी शामिल हो गए हैं। जिनको किसानों ने ही  छुट्टा छोड़  दिया है। खेती की हालत बहुत ही खराब है।

कई लोगों को प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी का वह भाषण बहुत अच्छी तरह से याद है जिसमें उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले कहा था कि किसान की आमदनी दुगुनी कर दी जायेगी। नीतियां ऐसी बनाई जायेंगी जिस से किसान को सम्पन्नता की राह पर डाल दिया जाएगा। उनकी बातों पर भरोसा करके किसानों ने उनको वोट दिया, लोकसभा में तो जिताया ही, विधान सभा में भी उनकी पार्टी को वोट दिया और सरकार बनवा दी।  लेकिन उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार बनते ही पशुओं की बिक्री एकदम बंद हो गई।  हर गांव में दो-चार ऐसे नौजवान प्रकट हो गए, जिनके जीवन का उद्देश्य ही गौवंश की रक्षा है। लोग परेशान हैं कि जाएं तो जाएं कहां? जानवरों को बेचकर किसान को अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी। आमदनी दुगुना करने के वायदे वाली सरकार के संरक्षण में काम कर रहे गौरक्षकों ने आमदनी का एक जरिया भी खत्म कर दिया और सरकार कोई भी कार्रवाई नहीं कर रही है।

आज ग्रामीण इलाकों में जो लोग परिवार के मुखिया  हैं, उनकी उम्र साठ साल के पार है। उन लोगों ने अपने बचपन में 1964 की वह  भुखमरी भी देखी है जो लगातार सूखे की वजह से आई थी। किसान लगभग पूरी तरह से बरसात के पानी पर ही निर्भर था। उन यादों से भी लोग कांप जाते हैं।  नरेंद्र मोदी के वायदों के बाद लोगों को उम्मीद थी कि गरीब का बेटा जब प्रधानमंत्री बनेगा तो शायद कुछ ऐसा कर दे जो तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने किया था। हरित क्रान्ति की शुरुआत कर दी थी।

दिल्ली आकर जब खेती किसानी के इंचार्ज कुछ महाप्रभुओं से बात की तो उन्होंने लाखों करोड़ों मीट्रिक टन और लाखों हेक्टेयर में अच्छी फसलों के आंकड़े देकर मुझे संतुष्ट करने की कोशिश की। इन आंकड़ाबाज अफसरों, नेताओं को यह बताने की जरूरत है कि आम आदमी की मुसीबतों को आंकड़ों में घेर कर उनके जले पर नमक छिड़कने की संस्कृति से बाज आएं। अकाल या सूखे की हालत में ही खेती का ख्याल न करें, इसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाएं।  इस देश का दुर्भाग्य है कि जब फसल खराब होने की वजह से शहरी मध्यवर्ग प्रभावित होने लगता है, तभी इस देश का नेता और पत्रकार जगता है। गांव का किसान, जिसकी हर जरूरत खेती से पूरी होती है, वह इन लोगों की प्राथमिकता की सूची में कहीं नहीं आता।

कोई इनसे पूछे कि फसल चौपट हो जाने की वजह से उस गरीब किसान का क्या होगा जिसका सब कुछ तबाह हो चुका है। वह सरकारी मदद भी लेने में संकोच करेगा क्योंकि गांव का गरीब और किसान मांग कर नहीं खाता। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि गांव का गरीब, सरकारी लापरवाही के चलते मानसून खराब होने पर भूखों मरता है। आजादी के बाद जो जर्जर कृषिव्यवस्था नए शासकों को मिली थी, वह लगभग आदिमकाल की थी। 


जवाहरलाल नेहरू को उम्मीद थी कि औद्योगिक विकास के साथ-साथ खेती का विकास भी चलता रहेगा। लेकिन 1962 में जब चीन का हमला हुआ तो उनको एक जबरदस्त झटका लगा। उस साल उत्तर भारत में मौसम अजीब हो गया था। रबी और खरीफ दोनों ही फसलें तबाह हो गईं थीं।  जवाहर लाल नेहरू को एहसास हो गया था कि कहीं बड़ी गलती हुई है। ताबड़तोड़ मुसीबतों से घिरे मुल्क पर 1965 में पाकिस्तानी जनरल, अयूब ने भी हमला कर दिया। युद्ध का समय और खाने की कमी। बहरहाल प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया और अनाज की बचत के लिए देश की जनता से आह्वान किया कि सभी लोग एक दिन का उपवास रखें। यानी मुसीबत से लड़ने के लिए हौसलों की पर बल दिया। लेकिन भूख की लड़ाई हौसलों से नहीं लड़ी जाती। जो लोग 60 के दशक में समझने लायक थे उनसे कोई भी बता सकता है कि विदेशों से सहायता में मिले बादामी रंग के बाजरे को निगल पाना कितना मुश्किल होता है। लेकिन भूख सब कुछ करवाती है। अमेरिका से पी एल 480 योजना के तहत मंगाये गए गेहूं की रोटियां किस रबड़ की तरह होती थीं।

केंद्र सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को क्या मालूम है कि गांव का गरीब किसान जब अपनी बुनियादी के लिए कर्ज लेता है तो कितनी बार मरता है, अपमान के कितने कड़वे घूंट पीता है।  इन्हें कुछ नहीं मालूम और न ही आज के तोता रटंत पत्रकारों को जरूरी लगता है कि गांव के किसानों की इस सच्चाई का आईना इन कोल्हू के बैल नेताओं और नौकरशाहों को दिखाएं।  गांव के गरीब की इस निराशा और हताशा का ही जवाब था 1966 में शुरू हुआ खेती को आधुनिक बनाने का वह ऐतिहासिक कार्य। 2014 के चुनाव के पहले जब नरेंद्र मोदी ने किसान की आमदनी डबल करने की बात की तो लोगों को लगा कि शायद वैसा ही कुछ हो जाए। लेकिन आज की जमीनी सच्चाई यह है कि किसान के लिए सरकारी नीतियों में ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है।

किसानों की समस्या को समझने वालों ने इस देश में कभी भी सत्ता नहीं संभाली। जब से ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत पर कब्जा किया तब से ही खेती की अनदेखी होती रही है। सत्ताधीशों की सुविधा के अनुसार खेती करने के अवसर हमेशा से ही उपलब्ध कराये जाते रहे हैं। ऐसा नहीं है कि अपने देश में अधिक नकदी देने वाली फसलों की कमी रही हो। लेकिन उनको भी शासक अपने हित साधन के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं नील, अफीम, रबड़, चाय, पिपरमिंट, गन्ना, काफी, मसाले आदि ऐसी फसलें हैं जो किसान को सम्पन्न बना सकती थीं लेकिन सरकारों ने ऐसा होने नहीं दिया।

आधुनिक युग में भी भारतीय किसान को अन्नदाता ही माना जा रहा है। किसी भी नेता का भाषण सुन लीजिये उसमें किसान को भगवान बताने की कोशिश की जायेगी। लेकिन उसकी सम्पन्नता के बारे में कोई भी योजना कहीं नहीं नजर आयेगी।  किसान की दुर्दशा का बुनियादी कारण इसी सोच में है। उसकी पैदावार की कीमत सरकार तय करती है। और जब सरकार की तरफ से न्यूनतम खरीद मूल्य तय करने की घोषणा की जाती है तो लगता है कि मंत्री जी बहुत बड़ी कृपा कर रहे हैं और किसान को कुछ खैरात में दे रहे हैं।

समस्या का हल किसान को अन्नदाता और देश की खाद्य आवश्यकताओं के पूर्तिकर्ता के खांचे से बाहर निकालकर नीतियां बनाने की सोच में है। उस पर दया करने की कोई  नहीं है। दुनिया के कई देशों में अन्न की कमी है। वहां विश्व खाद्य संगठन आदि की मदद से अन्न भेजा जाता है।

इस काम में अमेरिका और  विकसित देशों का पूरी तरह  से कब्जा है। हमें मालूम  है कि दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य कंपनी कारगिल भारत में दूरदराज के गांवों में जाकर सस्ते दाम पर गेहूं आदि खरीद रही है उस गेहूं को वह उन देशों में भेजती है जहां खाने की कमी होती है। कारगिल अमेरिकी कंपनी है। सरकार को चाहिए कि किसानों की पैदावार को सीधे विश्व भर में फैले उपभोक्ता तक पंहुचाने का उपाय करे। ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिससे किसान को बेचारा माने जाने वालों को समझ में आये कि किसान बेचारा नहीं होता, अगर जागरूकता हो तो वह अमेरिकी किसानों की तरह बहुत सम्पन्नता का जीवन बिता सकता है लेकिन उसके लिए उसकी आत्मसम्मान की भावना को सही मुकाम पर पहुंचाना होगा, उसको केवल मतदाता ही नहीं, देश के विकास का हरावल दस्ता मानना होगा।

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