राजनीतिक अनिश्चितता का दौर

पुष्परंजन : कूटनीति में खुशफहमी बाद के लिए कष्टकारक होती है। कुछ दिन पहले मैक्सिको के राष्ट्रपति एनरिक पेना निएटो इस बात से फूले नहीं समा रहे थे...

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कूटनीति में खुशफहमी बाद के लिए कष्टकारक होती है। कुछ दिन पहले मैक्सिको के राष्ट्रपति एनरिक पेना निएटो इस बात से फूले नहीं समा रहे थे कि शपथ के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें फोन कर अमेरिका आने के लिए आमंत्रित किया है। पेना निएटो को लगा कि वे अचानक से विश्व नेता बन गये हैं, और इसलिए ट्रंप ने उनके स्वागत के लिए वाशिंगटन आमंत्रित किया है। पेना के दरबारियों ने इसे ऐसे पेश किया मानो ट्रंप नहीं, ख़ुदा के यहां से फोन आया हो। उस देश की सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति पेना निएटो हीरो की तरह नमूदार थे। लेकिन जैसे ही ट्रंप ने अमेरिका-मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने की घोषणा की, राष्ट्रपति निएटो धरती पर आ गिरे। ट्रंप ने यह भी कहा कि जो माल मैक्सिको से अमेरिका आयात होता है, उस पर विशेष कर लगाएंगे, और दीवार का खर्च निकालेंगे। ट्रंप द्वारा 440 वोल्ट वाली घोषणा को राष्ट्रपति निएटो झेल नहीं पाये, एक झटके में उन्होंने अगले हफ्ते वाशिंगटन जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया।
ट्रंप ने इसका तसव्वुर नहीं किया था कि निएटो उनके आमंत्रण को ठुकरा देंगे। व्हाइट हाउस मैक्सिको सीमा पर दीवार के बहाने अमेरिकी कांग्रेस को इस पर राजी करने की जुगत में लगा है कि देश में जो वस्तुएं आयात की जाती हैं, उन पर कर लगाए जाएं। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता शान स्पाइसर ने खुलासा किया कि मैक्सिको से आने वाले सामानों पर 20 फीसदी कर लगाने से लगभग 10 अरब डॉलर का राजस्व हर वर्ष जमा होगा, इससे दीवार का खर्च आसानी से निकल जाएगा।
ऐसा लगता है कि ट्रंप शासन में निर्मित दीवार की कहानी लंबी चलेगी। बॉर्डर कंट्रोल के लिए चीन की दीवार जितनी अहमियत रखती है, कुछ सदियों बाद शायद उतना ही महत्व मैक्सिको की इस दीवार को मिले। चीन की ऐतिहासिक दीवार के निर्माण में छिन से लेकर मिंग वंश के शासकों ने कई सदी •ााया किये, मगर ट्रंप जल्दी में हैं। चार साल के भीतर मैक्सिको की दीवार चिनवाकर चुनाव में किये वायदे को पूरा करेंगे।
ऐसा नहीं है कि ट्रंप ने सीमा पर दीवार बनाने का जो तरीका ढूंढा है, उसे दुनिया के दूसरे देश भी अमल में लाने की स्थिति में हों। मतलब, ऐसा संभव नहीं कि मोदी ट्रंप की राह पर चल पड़ें, और पाकिस्तान, बांग्लादेश या नेपाल सीमा पर हजारों किलोमीटर दीवार खड़ी करने का ऐलान कर दें। मगर, जोश में भाजपा, शिव सेना, या संघ का कोई नेता ऐसा बयान दे भी सकता है। इ•ाराइल ने वेस्ट बैंक पर 708 किलोमीटर लंबी दीवार बनाकर ऐसा कर दिखाया है। 2016 में गा•ाा पट्टी पर भूमिगत दीवार बनाने को लेकर भी विवाद आरंभ हैं। मगर, इन दोनों दीवारों के लिए इ•ाराइल ने फिलिस्तीन पर कर नहीं थोपा था। ट्रंप, उस हिसाब से यहूदी शासन से भी दो कदम आगे हैं। बीते रविवार को ट्रंप ने बिन्यामिन नेतन्याहू, और उसके एक दिन बाद मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सिसी से बात की। उस समय दीवार क्या उनकी बातचीत का विषय था?
21 जनवरी को ट्रंप ने सबसे पहले कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूदेउ से फोन पर बात की थी। मोदी पांचवे शासनाध्यक्ष हैं, जिन्हें ट्रंप ने फोन किया। अमेरिकी दूतावास की वेबसाइट पर ‘राष्ट्रपति की कॉल का रीड आउट’ उपलब्ध है। इसमें दक्षिण व मध्य एशिया में सुरक्षा पर बातचीत, अर्थव्यवस्था और रक्षा जैसे क्षेत्रों में मजबूत साझीदारी की चर्चा है। मोदी समर्थक इस खबर से धन्य हो गये हैं कि ट्रंप ने फोन किया है। क्या इसका यह अर्थ निकालें कि मोदी असाधारण रूप से ट्रंप के निकट हो गये? या पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी चिनपिंग, शिंजो आबे, आंगेला मैर्केल, थेरेसा मे आदि से महत्वपूर्ण हो गये? सिर्फ इस बिना पर कि इन नेताओं को ट्रंप ने अब तक फोन नहीं किया है?
हमें इस जमीनी सच को कभी नहीं भूलना चाहिए कि ट्रंप विश्व नेता से अधिक व्यापारी हैं। इसलिए, कुछ सवाल अब भी अनुत्तरित हैं कि ट्रंप ने अमेरिकी उत्पाद खरीदने, और अमेरिकियों को ही नौकरी देने के वास्ते ‘अमेरिका फस्र्ट’ का जो नारा दिया है, उससे प्रधानमंत्री मोदी कितना इत्तेफा$करखते हैं। अमेरिकी दूतावास की वेबसाइट पर उद्धृत शब्दों को ठीक से समझने पर यही लगता है कि ट्रंप ने भारत में प्रतिरक्षा और एटमी ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों को प्राथमिकता देने की बात की है। यह कार्ड एक फरवरी को बजट के बाद खुलेगा।
आमतौर पर जब दो शासनाध्यक्ष औपचारिक बातें करते हैं, तो उनकी शब्दावली में आतंकवाद के विरूद्ध वैश्विक युद्ध, उभयपक्षीय सहकार को मजबूती देने जैसे तमाम संकल्प समाहित कर दिये जाते हैं। सच यह है कि भारत का उद्योग जगत अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। दु:स्वप्न अमेरिका के नये निजाम के निर्णयों को लेकर है। सितंबर 2014 से जून 2016 तक अमेरिकी कंपनियों ने भारत में 28 अरब डॉलर निवेश किया था, जिसे 45 अरब डॉलर तक पहुुंचाने का लक्ष्य था। क्या उसमें बाधा आनी है? यूएस-इंडिया बिजनेस कौंसिल ऊहापोह की स्थिति से गुजर रही है कि वाल स्ट्रीट के जो रणनीतिकार व्हाइट हाउस में हैं, पता नहीं भारत के बारे में क्या सोचते हैं।
भारतीय कंपनियां इस बात से भी बेचैन हैं कि अमेरिकी कारोबार में उन्होंने जो पन्द्रह अरब डॉलर लगाया है, उसका क्या होगा? आईटी के क्षेत्र में भारत से होने वाले निर्यात का साठ फीसदी अकेले अमेरिका के खाते में है। पिछले पांच वर्षों में भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियों ने दो अरब डॉलर से अधिक का निवेश अमेरिका में किया है। सिर्फ तीन कंपनियों का उदाहरण देते हैं। 2005 से 2014 के बीच टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो में 86 ह•ाार नये ‘एचवन-बी वर्कर’ भारत से अमेरिका गये। ऐसे लाखों भारतीय आईटी वर्करों के भविष्य का क्या होगा?
दरअसल, विश्व राजनीति का यह राहूकाल है, जो अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। कैलीफोर्निया के पास स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्री निकोलस ब्लूम की उस थ्योरी को लोग अब गंभीरता से लेने लगे हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि पूरी दुनिया में राजनीतिक अस्थिरता दोगुनी हो जाएगी। जनवरी के शुरू में ई-मेल के जरिये सवाल-जवाब में प्रोफेसर ब्लूम ने स्वीकार किया था कि अमेरिका एक ऐसे आर्थिक-राजनीतिक दौर में प्रवेश कर रहा है, जिसका पहले से अंदाज लगाना कठिन है। प्रोफेसर ब्लूम इससे असहमत नहीं थे कि दुनियाभर में राजनीतिक पूर्वानुमान की परंपरा धराशायी हो रही है, और बंद कमरों में होने वाले सर्वे बेमानी हो रहे हैं। ब्रिटेन का ब्रेक्•िाट, फ्रांस में वर्किंग क्लास का वोट हासिल करने वाली दक्षिणपंथी नेशनल फ्रंट, इटली में पॉप्युलिस्ट पार्टी का उदय और फाइव स्टार मूवमेंट इसके उदाहरण हैं कि जनता भी बेसब्री हो गई है।
दुनिया में राजनीतिक अस्थिरता के इस भयानक दौर से क्या सिर्फ चीनी, और मैक्सिको के वर्कर गुजऱेंगे, या यह संकट भारत के उन लाखों युवाओं पर भी आने वाला है, जिन्हें विदेशों में रोजगार दिलाने का वादा प्रधानमंत्री मोदी अपनी सभाओं में कई बार कर चुके हैं? सिलीकोन वैली के सस्ते आईटी प्रोफेशनल्स ट्रंप के रहते निकाल बाहर किये गये, तो उन्हें दुनिया के किस हिस्से में रोजगार दिलाना है, क्या इसका कोई ब्लूप्रिंट मोदी सरकार के पास है? मोदी प्रशंसकों को चाहिए कि इस पर चिंतन करें, और आपात स्थिति में इससे निपटने का मार्ग तलाशें। ट्रंप ने फोन कर दिया, और आप चने की झाड़ पर चढ़ गये। कृपया इस भ्रमरोग से बचिये।
ट्रंप की बिन्यामिन नेतन्याहू से बातचीत के बाद ईरान में भी खलबली मची हुई है। नेतन्याहू अब भी मानते हैं कि ईरान से परमाणु समझौता विश्व के लिए खतरा है, और उसे रद्द होना चाहिए। ईरान के राष्ट्रपति डॉ. हसन रूहानी ने चुनौती दी है कि ट्रंप उसे अकेले निरस्त नहीं कर सकते, क्योंकि उसे सुरक्षा परिषद ने पारित किया है। ‘द न्यू•ा’ में ट्रंप का बयान पाकिस्तानी अवाम के लिए सचमुच चिंता का विषय है, जिसमें उन्होंने बार-बार कहा कि सऊदी अरब, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आने वाले प्रवासियों के लिए हम सख्त रुख अपनाने जा रहे हैं। 2010 की गणना में पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी तीन लाख 63 हजार 699 थे।
राचेल शाबी जैसे टिप्पणीकार ने ट्रंप शासनकाल को ‘ट्रंपिस्ट टाइम’ की संज्ञा देते हुए लिखा कि खैरात लेने का दौर अब खत्म होने वाला है। न्यूयार्क टाइम्स में एक टिप्पणी छपी कि अमेरिका अपने जीडीपी का पच्चीस प्रतिशत दान देने पर खर्च करता है। अब अमेरिकी करदाताओं के पैसे अफ्रीका और पाकिस्तान पर क्यों खर्च किये जाएं? ऐसे विश्लेषण से पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान में घबराहट है। उन्हें चार अरब डॉलर के दान की चिंता सता रही है। 1948 से 2016 तक पाकिस्तान, अमेरिका से 78. 3 अरब डॉलर खैरात में ले चुका है। संभव है, ट्रंप इसका हिसाब मांगें कि खैरात वाले कितने अरब डॉलर आतंकी कैंपों पर खर्च किये गये। 24 सितंबर 2015 को एक रेडियो प्रसारण में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था, ‘पाकिस्तान, उत्तर कोरिया से भी बड़ा पागल देश है, और उसे ठीक करना है। पाकिस्तान को ‘कंट्रोल’ करने के लिए भारत से नजदीकियां बढ़ानी जरूरी है।’
सवाल इस्लाम को लेकर भी है कि अमेरिका का नया निजाम पाकिस्तान, अफगानिस्तान, पूर्वी व पश्चिम एशिया में क्या करने जा रहा है? पाकिस्तान के रक्षा विश्लेषक लेफ्टिनेंट जनरल तलत मसूद कहते हैं, ‘पाकिस्तान को इंतजार करना होगा। देखें कि वे क्या करते हैं।’ 2014 के बाद अमेरिका द्वारा दक्षिण एशियाई कूटनीति का गुजरातीकरण किया जाना, निशा देसाई विस्वाल को दक्षिण व सेंट्रल एशियन मामलों की सहायक विदेशमंत्री बनाया जाना एक किस्म का ‘पैराडाइम शिफ्ट’ था। ट्रंप जिस तरह से अप्रत्याशित स्वभाव के हैं, उनकी कूटनीति का पूर्वानुमान लगाना उसी तरह कठिन होगा। ट्रंप तो मोदी बनने से रहे। मगर मोदी में ट्रंप बनने की पूरी संभावना है!
pushpr1@rediffmail.com


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