रोहिंग्या और राजनीति की रोटी

थोड़ी देर के लिए राजनाथ सिंह की बात मान लेते हैं कि ये घुसपैठिये थे। 'बीएसएफ' जो गृह मंत्रालय के अधीन है, वह क्या कर रही थी...

पुष्परंजन
रोहिंग्या और राजनीति की रोटी
Rohingya
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थोड़ी देर के लिए राजनाथ सिंह की बात मान लेते हैं कि ये घुसपैठिये थे। 'बीएसएफ' जो गृह मंत्रालय के अधीन है, वह क्या कर रही थी? म्यांमार सीमा से लगे मिजोरम के 404 किलोमीटर और बांग्लादेश से लगी 318 किलोमीटर भारतीय सीमा की चौकसी की सामूहिक  बीएसएफ, दूसरे पैरा मिल्ट्री फोर्स, एमआई से लेकर आईवी और लोकल पुलिस की है। सबसे राष्ट्रवादी सरकार की नाक के नीचे घुसपैठ हो रही थी, तो किसके विरूद्ध कार्रवाई होनी चाहिए?

आपकी इच्छा हो, तो उन्हें घुसपैठिया घोषित कर दीजिए। थोड़ी और आग लगानी हो, तो उन्हें आतंकी घोषित कर दीजिए। आठ दिन के नवजात बच्चे से लेकर अस्सी साल के बुड्ढे तक आतंकवादी! ऐसे आतंकवादी, जिन्हें तैयार करने के वास्ते अल $कायदा, आइसिस तक कोशिश में है। दुनिया भर के गबरू जवानों को छोड़कर, कुपोषण के शिकार मरियल से दिखने वाले रोहिंग्या को कोई चौकीदारी के वास्ते गार्ड भी रखना पसंद नहीं करेगा। भारत सरकार बंद लिफाफे में जो कुछ सुबूत सुप्रीम कोर्ट को देगी, उससे साबित कर देगी कि मरे-मरे से दिखने वाले रोहिंग्या दरअसल दुनिया के सबसे $खतरनाक आतंकी हैं। इनकी भी इस देश में नहीं दिखनी चाहिए। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने जब कह दिया कि सब के सब घुसपैठिये हैं, तो भक्तगणों के वास्ते यह बयान ब्रह्मवाक्य जैसा ही है। 

राजनाथ सिंह के बयान पर हँसने और शक करने की दो वजहें हैं। 15 जुलाई 2014 को लोकसभा में प्रश्न संख्या 739 के जवाब में राजनाथ सिंह के जूनियर मंत्री किरण रिजिजू बयान दे रहे थे कि भारत में  अफगानिस्तान से आये 10 हजार 340, म्यांमार से चार हजार 621, श्रीलंका के एक लाख 2241, तिब्बत के एक लाख 1148 शरणार्थी रह रहे हैं, जिन्हें एक तय प्रक्रिया के तहत निबंधित किया गया है। ऐसे लोगों को लांग टर्म वीजो (एलटीवी) देने, स्वास्थ्य, शिक्षा, प्राइवेट संस्थानों तक में आबोदाना और आशियाना मुहैया कराने का काम सरकार का है। सवाल यह है कि 29 दिसंबर 2011 तक म्यांमार से भाग कर जो 4621 लोग शरण लेने आये, क्या उनमें से एक भी व्यक्ति रोहिंग्या नहीं है? गृह राज्य मंत्री रिजिजू 29 दिसंबर 2011 तक का ब्योरा प्रस्तुत कर रहे थे। 2011 से म्यांमार में लोकतांत्रिक सुधारों की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, इसलिए वे आंग सान सूची के लोग नहीं थे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के आंकड़े आपको अस्वीकार हैं, तो 'यूएनएचसीआर' को भी क्यों नहीं निकाल बाहर करते? वे तो 43 हजार रोहिंग्या शरणार्थी बता रहे हैं, जिनमें से 'यूएनएचसीआर' ने 16 हजार 500 को रजिस्टर्ड कर रखा है। 

थोड़ी देर के लिए राजनाथ सिंह की बात मान लेते हैं कि ये घुसपैठिये थे। तो सवाल यह है कि 'बीएसएफ' जो गृह मंत्रालय के अधीन में है, वह क्या कर रही थी? म्यांमार सीमा से लगे मिजोरम के 404 किलोमीटर और बांग्लादेश से लगी 318 किलोमीटर भारतीय सीमा की चौकसी की सामूहिक बीएसएफ, दूसरे पैरा मिल्ट्री फोर्स, एमआई से लेकर आईवी, स्थानीय खुफिया विभाग और लोकल पुलिस की है। देश की सबसे  राष्ट्रवादी सरकार की नाक के नीचे घुसपैठ हो रही थी, तो किसके विरूद्ध कार्रवाई होनी चाहिए? जवाब में आप 'सत्तर साल के नाकारा शासन' को लेकर रूदन आरंभ कर देंगे। सच तो यह है कि आपकी बीएसएफ बांग्लादेश के वास्ते गायों की तस्करी, सीमा पार से नशीली वस्तुएं, नकली नोट, पैसे लेकर सीमा पार कराने जैसे विषयों में ज़्यादा दिलचस्पी लेती रही है। लहर गिनने वाले सुरक्षाकर्मियों के लिए चकमा आ रहे हैं या रोहिंग्या, कोई फर्क नहीं पड़ता। 

मिजोरम मेें तैनात एक अधिकारी का बयान इसी हफ्ते आया कि अराकान वाले इलाके से 170 ईसाई भाग कर मिजो गांव में घुस आये। अराकान की पहाड़ियों पर म्यांमार की सेना और अराकान लिबरेशन आर्मी के बीच घमासान से बचने के लिए ये भागे। अब हमारी सरकार इनकी सुरक्षा कर रही है। कोई इस देश के गृहमंत्री से पूछे कि ये जो 170 गैर मुसलमान अराकान से जान बचाकर भाग आये हैं, इन्हें आप आतंकी मानते हैं, या नहीं? आतंकी मान लेने का पहला पैमाना यदि मुसलमान होना है, तो मोदी सरकार के मंत्री देश को गुमराह कर रहे हैं। 
यही काम आंग सान सूची भी कर रही हैं, जिनकी तस्वीर यह बनी थी कि उन्होंने युद्ध नहीं, बुद्ध के मार्ग पर अग्रसर होकर बर्मा के सैनिक शासन को लोकतंात्रिक सुधारों के लिए बाध्य कर दिया था। सूची को 1991 में नोबेेल शांति पुरस्कार मिला था। मुझे लगता है, आंग सान सूची का इस पुरस्कार के वास्ते चयन करने वाली नोबेल कमेटी से निश्चित रूप से भूल हुई है। इस भूल सुधार का एक ही रास्ता है कि आंग सान सूची से नोबेल पीस प्राइज वापिस लिया जाए। सूची इस पुरस्कार के लायक नहीं हैं। 72 साल की आंग सान सूची के मुंह से जब 'क्लिरेंस ऑपरेशन' जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं, तो लगता है कि इस एलीट महिला की निगाह में इंसानी जीवन का कोई महत्व नहीं है। रोहिंग्या के सफाये के वास्ते जिस तरह के क़िस्से वहां से जान बचाकर भागी औरतें, बूढ़े-बच्चे बयान कर रहे हैं, वह इंसानियत का सिर झुकाने को काफी है।

बल्कि बहुत हद तक हम इसे कह सकते हैं कि बोस्निया-हर्जेगोबिना के बाद इस तरह के सरकारी दमन का शिकार बेसहारा लोग हुए हैं।
और जो लोग 56 इंच का सीना फुलाये, हर इंवेंट पर ड्रेस बदल-बदल कर विश्व नेता बनने का दंभ भरते हैं, उन्हें शायद इसके शब्दार्थ का पता नहीं है। विश्व नेता का मतलब होता है, आप विश्व के सभी देशों में रहने वाले लोगों के नेता हो। उनकी खुशी और $गम में शरीक होना आपका काम है, वरना काहे का विश्व नेता! मोदी कूटनीति की व्याख्या करने वाले यही बताते हैं कि आंग सान सूची यदि इसे स्मार्ट तरीके से हल कर पाती हैं, तो ही ठीक होगा। अलबत्ता, भारत यह जरूर चाहता है कि इन 'घुसपैठियों' को देश से बाहर किया जाये। बांग्लादेश इन्हें वापिस लेना स्वीकार करता है, ऐसा कोई आधिकारिक बयान उसकी ओर से आया नहीं है।

म्यांमार के राखिन प्रांत में रहने वाले रोंहिग्या मुसलमानों का दमन आज से नहीं, पिछले एक दशक से जारी है, जिसमें दो लाख से अधिक रोहिंग्या मुस्लिम बर्मा से भाग चुके हैं। बांग्लादेश से पलायन किये मुसलमानों को पूर्वोत्तर भारत पहले से ही झेल रहा है। अब रोहिंग्या हमारी सीमा पर तैनात फोर्स की गलती से गले आ पड़े हैं। आबादी उत्पादन में आगे रहने वाला बांग्लादेश सिर्फ हमारे लिए समस्या की जननी नहीं है; बर्मा, थाईलैंड भी उससे त्रस्त हैं। 


रोहिंग्या मुसलमानों के कारण बर्मा का राखिन प्रांत राजनीतिक रूप से गरम रहा है। राखिन बौद्धों से रोहिंग्या मुसलमानों की अदावत नई नहीं है। द्वितीय विश्वयुद्ध से ही बौद्ध और रोहिंग्या दोनों समुदाय आपसी दुश्मनी निकालते रहे हैं, जिसमें हजारों जानें गई हैं। 'अराकान रोहिंग्या सेलवेशन आर्मी' के बारे में यही बताया गया कि कुछ दिनों से इनके लोगों ने बौद्धों के साथ-साथ हिंदुओं को भी निशाना बनाना आरंभ कर दिया था। इस तरह की चर्चा से भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों के विरूद्ध माहौल तो बनने लगा है। बजाय, इसके कि सच क्या है, किरण रिजिजू जैसे मंत्रियों के बयान पर भक्त लोग ज़्यादा भरोसा करने लगे हैं।

 यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र से अलग, 57 इस्लामिक राष्ट्रों का संगठन 'ओआईसी' बर्मी मुसलमानों के लिए कुछ वर्षों से चिंतित है। जून 2012 में बर्मा में हुए दंगे में छह सौ रोहिंग्या मुसलमानों की मौत, और बारह सौ के लापता होने को लेकर मक्का में 'ओआईसी' ने आपात बैठक की थी। इस शिखर बैठक को बुलाने वाले सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला ने रोहिंग्या मुसलमानों को पांच करोड़ डॉलर की मदद भेजने की घोषणा की थी। पाकिस्तान में जमाते इस्लामी, म्यांमार दूतावास को उड़ा देने की धमकी कई बार दे चुका है। विगत सोमवार को रूस के चेचन्या, ग्रोजनी में मुसलमानों ने जुलूस निकालकर रोहिंग्या आबादी को समर्थन देने का ऐलान किया। चेचन नेता रमजान कादिरोव ने कहा कि हम चुप नहीं बैठेंगे। तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप ऐर्दोआन ने दमन के विरूद्ध प्रतिरोध व्यक्त किया है। इसलिए यह शिगूफा $गलत है कि सिर्फ पाकिस्तान, बांग्लादेश के अतिवादी संगठन रोहिंग्या के साथ खड़े हैं।

अराकान की पहाड़ियों में रोहिंग्या मुसलमान कब आकर बसे, इसका कोई निश्चित आधार नहीं मिलता। 1891 में अंग्रेजों ने अराकान की पहाड़ियों में जब सर्वे कराया था, तब वहां मुसलमानों की संख्या 58 हजार 255 बताई गई। ये मुसलमान क्या रोहिंग्या थे? पक्के तौर पर कोई नहीं कहता। पचास के दशक में रोहिंग्या मुसलमानों ने बर्मा से अलग राष्ट्र के लिए उत्तरी अराकान में 'मुजाहिद पार्टी' का गठन किया था। आज अराकान की पहाड़ियों में आठ लाख की संख्या में बसे रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में म्यांमार सरकार यही दावा करती है कि ये लोग बांग्लादेश से आये हुए शरणार्थी हैं। बांग्लादेश की विपक्षी नेता बेगम खालिदा ज़िया के पति जनरल ज़िया जब बांग्लादेश के शासनाध्यक्ष थे, तब उनपर म्यांमार ने आरोप लगाया था कि वे रोहिंग्या मुसलमानों को भड़का रहे हैं, और अलगाववाद को हवा दे रहे हैं।

यह सच है कि इस पूरे प्रकरण का भुक्तभोगी भारत रहा है। आग बर्मा में लगी, लेकिन 2012 में उसकी तपिश मुंबई में तब देखने को मिली, जब इस बात पर उग्र हुए कुछ लोगों ने फसाद किये। वहां हुए दंगे में दो मारे गये, और 50 से अधिक घायल हुए। पता नहीं किन कारणों से मोदी सरकार म्यांमार में लोकतंत्र की रहनुमा आंग सान सूची से रोहिंग्या शरणार्थियों के सवाल पर गंभीरता से बात नहीं कर रही है। साक्षी महाराज जैसे सांसद 'चार बीवी चालीस बच्चे' का सांप्रदायिक जुमला दाग कर राजनीति की रोटी सेंक सकते हैं, मगर म्यांमार से 40 हजार के $करीब जो मुसीबत के मारे लोग इस देश में आ गये हैं, उसे किस तरह से बिना संबंध बिगाड़े वापिस उनके मुकाम पर भेजना है, उसपर विमर्श कम, और इस विषय को सांप्रदायिक रंग देकर रोटी सेंकने की चेष्टा हो ज़्यादा हो रही है। सवाल यह है कि रोहिंग्या को इजराइलियों की तरह होमलैंड क्यों नहीं मिलना चाहिए?

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