शिक्षा परिसरों में तानाशाही की धमक

राजेंद्र शर्मा : गुरमेहर कौर का ख्याल आते ही, बरबस रोहित वेमुला की याद क्यों आ जाती है? क्योंकि जिन ताकतों ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्रों की जनतांत्रिक आवाज दबाने की कोशिश में...

राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा
गुरमेहर कौर का ख्याल आते ही, बरबस रोहित वेमुला की याद क्यों आ जाती है? क्योंकि जिन ताकतों ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्रों की जनतांत्रिक आवाज दबाने की कोशिश में पिछले साल के शुरू में हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित शोध छात्र रोहित वेमुला की जान ली थी, ठीक उन्हीं ताकतों ने और उसी तरह से आज दिल्ली विश्वविद्यालय की बीस वर्षीया छात्रा, गुरमेहर कौर का जीना मुहाल कर दिया है। उसने भी रोहित वेमुला की तरह अपने विश्वविद्यालय परिसर में आरएसएस के छात्र बाजू, एबीवीपी और आम तौर पर संघ परिवार की जनतंत्रविरोधी धौंसबाजी को अपने ही ढंग से चुनौती देने की जुर्रत की थी। रोहित अगर दलित था, तो गुरमेहर स्त्री है; दोनों ही कमजोर तबकों से और भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वालों के विशेष रूप से विचलित कर सकने वाले प्रहारों के शिकार। एक के मामले में आर्थिक-सामाजिक कमजोर स्थिति पर हमला, तो दूसरे के मामले में ट्रोल सेना द्वारा बलात्कार तक की धमकियां! दोनों के खिलाफ संघ परिवार की सेवा में शीर्ष में केंद्रीय मंत्रियों के स्तर तक शासन सन्नद्घ था। रोहित के मामले में तत्कालीन शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी तथा श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने मोर्चा संभाला था, तो गुरमेहर के खिलाफ केंद्रीय गृहराज्य मंत्री, किरण रिजिजू ने सीधे मोर्चा संभाला है। और गुरमेहर को भी उन्होंने कम से कम फौरी तौर पर तो चुप करा ही दिया गया है। राजधानी के लेडी श्रीराम कॉलेज की छात्रा ने शिक्षा परिसरों में जनतांत्रिक आ•ाादी की मांग पर निकाले गए, छात्रों, शिक्षकों व चिंतित नागरिकों के सर्वसमावेशी मार्च से खुद को घोषणा करते हुए अलग किया और परिवार के पास जालंधर चली गई। क्यों? क्योंकि उसने हफ्ते भर में इतना कुछ झेला था और उसको लगा कि, ‘20 साल की उम्र में मैं इतना ही बर्दाश्त कर सकती हूं।’
गुरमेहर कौर का कसूर सिर्फ इतना था कि वह राजधानी के दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठिïत रामजस कॉलेज में छात्रों और शिक्षकों पर, एबीवीपी तथा आमतौर पर संघ परिवार के हिंसक हमले के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन गई। अपने फेसबुक प्रोफाइल में ‘मैं दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा हूं, मैं एबीवीपी से नहीं डरती’ के प्लेकार्ड की तस्वीर लगाकर, उसने युवाओं के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय साइबर स्पेस में संघी दादागिरी को चुनौती दी थी, जहां उनका लगभग एकछत्र राज बना रहा है। गुरमेहर की आवाज, विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों व शिक्षकों की जनतांत्रिक आवाज पर, पुलिस की शह पर बल्कि उसकी सक्रिय हिस्सेदारी से हुए हिंसक हमले के खिलाफ ऐसी चीख बन गई, जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री को इसमें सीधे राष्टï्रवाद, राष्टï्र और राष्टï्रीय सुरक्षा के लिए खतरा दिखाई देने लगा और वह राष्टï्रवाद की तलवार लेकर मैदान में कूद पड़े। उन्होंने गुरमेहर को ‘गुमराह’ घोषित कर दिया और पूछा कि ‘कारगिल के शहीद की बेटी के दिमाग को किस ने प्रदूषित कर दिया है।’ बाद में ज्यादा हो-हल्ला मचने पर अपनी सफाई में उन्होंने वामपंथविरोध तथा राष्टï्रवाद की आड़ लेते हुए कहा कि उनका हमला गुरमेहर पर नहीं वामपंथ पर था। और संघ-वफादारों के आम तौर-तरीके को कुछ और बेपर्दा करते हुए, उन्होंने इसी सफाई के क्रम में बेशर्मी से स्वीकार किया कि गुरमेहर के खिलाफ तलवार भांजने से पहले उन्होंने फेसबुक पर उसकी पोस्ट देखने की •ाहमत भी गवारा नहीं की थी। वह तो बस संघ परिवार पर हमले का शोर सुनकर अपनी तलवार चलाने लगे थे!
फरवरी के आखिर में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में जो कुछ हुआ, न तो अनोखा था और न कोई पहली बार हो रहा था। उल्टे वह शिक्षा परिसरों में प्रशासन व शासन की मदद से संघ का वर्चस्व थोपने की बढ़ती प्रवृत्ति का ही हिस्सा था, जिसमें मौजूदा भाजपा राज में जबर्दस्त तेजी आई है। और तो और इस मुहिम में फौरी तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले बहानों तक में एक निरंतरता है। हैदराबाद विश्वविद्यालय प्रकरण में फिल्म ‘मुजफ्फरनगर बाकी’ है के प्रदर्शन और अफजल गुरु की फांसी का मुद्दा था, तो जेएनयू में अफजल गुरु की ही फांसी और कश्मीर समस्या के गिर्द ‘आ•ाादी’ के नारों का और अब रामजस कॉलेज के मामले में तो, उक्त नारों के लिए जेएनयू प्रकरण में राजद्रोह के मामले में लपेटे गए उमर खालिद खुद ही मुद्दा बना दिया गया। रामजस कॉलेज के अंग्रेजी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय अकादमिक सेमिनार में, उमर खालिद का हिस्सा लेना ही एबीवीपी के लिए हमले का बहाना हो गया। अकादमिक सेमिनार में एबीवीपी के गुंडागर्दी कर के खलल डालने के खिलाफ अगले दिन जब विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं तथा शिक्षकों ने स्थानीय थाने तक जुलूस निकालकर प्रदर्शन करने की कोशिश की, तो इन प्रदर्शनकारियों पर तो पुलिस प्रशासन और संघ परिवार का कहर ही टूट पड़ा।  इसी हमले के खिलाफ उठी प्रबल आवाज का हिस्सा बनने के लिए 20 साल की गुरमेहर कौर को वह सब झेलना पड़ा जो वह झेल नहीं सकती थी।
याद रहे कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, जेएनयू और अब रामजस कॉलेज, जोर-जबर्दस्ती से तथा सत्ता के बल पर संघी वैचारिक वर्चस्व थोपने की कोशिश में शिक्षा परिसरों में जनतांत्रिक माहौल का गला घोंटने की मुहिम के चंद बहुत चर्चित उदाहरण हैं। वर्ना संघ परिवार के केंद्र में सत्ता में आने के बाद शायद ही कोई दिन ऐसा जाता होगा, जब देश में कहीं न कहीं, किसी न किसी उच्च शिक्षा संस्थान से, अल्पसंख्यक/ कश्मीरी छात्रों को डराए-धमकाए जाने, मौजूदा शासकों की हां मेें हां न मिलाने वाले शिक्षकों/ विद्वानों को परेशान किए जाने, एबीवीपी/ मोदी सरकार का विरोध करने वाले छात्रों/ संगठनों पर हमले किए जाने की खबर न आती हो। अगर जेएनयू की निवेदिता मेनन को आमंत्रित करने के लिए राजस्थान में जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय की प्रोफेसर राजश्री राणावत को निलंबित कर दिया जाता है, तो हरियाणा के एक विश्वविद्यालय में महाश्वेता देवी के एक नाटक, ‘द्रौपदी’ के मंचन के सिलसिले में अंगे्रजी विभाग की एक प्रोफेसर के साथ भी ऐसा ही सलूक किया जाता है और हरियाणा के ही एक और विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर तथा   दो वरिष्ठï अधिकारियों को, कश्मीर में दमन के खिलाफ एक ज्ञापन पर दस्तखत करने के लिए विश्वविद्यालय छोडऩे के लिए मजबूर कर दिया जाता है। और केरल में एक लेखक को एक शिक्षा संस्था में पढ़ी अपनी कहानी के लिए राजद्रोह के मामले में लपेट लिया जाता है। वास्तव में आज देश भर में शिक्षा परिसरों में तानाशाही की धमक साफ तौर पर सुनी जा सकती है। राष्टï्रवाद इस मुहिम की तलवार है। दुर्भाग्य से यह बंदर के हाथ तलवार लगने का मामला है। आखिरकार, आज यह तलवार उन्हीं ताकतों के हाथ में है, जो इस देश की सबसे बड़ी राष्टï्रवादी लड़ाई से, आ•ाादी की लड़ाई से, सचेत रूप से दूर रही थीं।


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