अलग गोरखालैंड के असल इरादे

क्या दार्जिलिंग हिल्स में यह सारी लड़ाई नेपाली भाषा और गोरखा अस्मिता को लेकर लड़ी जा रही है? इसकी जड़ में जाएं, तो सबसे बड़ा खेल आर्थिक है, जिस पर इस इलाके के क्षत्रप अपना वर्चस्व चाहते हैं...

पुष्परंजन
अलग गोरखालैंड के असल इरादे
Gorkhaland
पुष्परंजन

क्या दार्जिलिंग हिल्स में यह सारी लड़ाई नेपाली भाषा और गोरखा अस्मिता को लेकर लड़ी जा रही है? इसकी जड़ में जाएं, तो सबसे बड़ा खेल आर्थिक है, जिस पर इस इलाके के क्षत्रप अपना वर्चस्व चाहते हैं। चाय बगान और दार्जिलिंग टी के निर्यात से लेकर पर्यटन, शराब की बिक्री से कई सौ करोड़ की सालाना आमदनी को कोलकाता में बैठे राजनेताओं से छीन लेना भी गोरखा आंदोलन के कर्णधारों का सबसे बड़ा लक्ष्य रहा है।

एसएस अहलुवालिया भाजपा सांसद से कृषि राज्य मंत्री बन गये। उनकी खामोशी, इस पूरी कपट कथा की पोल खोलती है। खानापूर्ति के लिए एसएस अहलुवालिया ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिख दिया है कि वह बतायें कि गोरखालैंड की मांग सही है, या नहीं। यह कितना बड़ा मजाक है कि अपने क्षेत्र की भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बारे में एक चुना हुआ प्रतिनिधि देश के गृह मंत्री से पूछ रहा है!

 

दार्जिलिंग में जून 1986 के वे दिन मुश्किल से बिसरते हैं, जब सुभाष घीसिंग से पहली मुलाकात हुई थी। और 'आखिरी मुलाकात’, 28 जनवरी, 2015 को नई दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के आईसीयू में देखने भर की हुई थी। उसके दूसरे दिन सुभाष घीसिंग अलग गोरखालैंड की अधूरी ख्वाहिश के साथ गुजर गये। अलग गोरखालैंड की आतिश ऐसी थी कि उससे निकले सुभाष घीसिंग जैसे नेता की पूरी दुनिया में पहचान बनने लगी थी।

उन दिनों मेरे जैसे नये-नवेले पत्रकार के लिए सुभाष घीसिंग से मुलाकात, और फिर उस पर स्टोरी एक किला फतह करने जैसा लग रहा था। आतिश और उसे बुझाने वाले आब का डर सुभाष घीसिंग को इतना सताये रखता था कि हर नये मिलने वाले की पहले पूरी तरह जांच करा लेते थे। उन्हें शक होता था, सामने वाला कहीं उनके किये-कराये पर पानी न फेर दे। और ऐसा किया भी, तो उन्हीं के लोगों ने।

1968 में सुभाष घीसिंग ने 'नीलो झंडा’ नामक राजनीतिक-वैचारिक मंच का गठन किया था। उसके ग्यारह साल बाद, 22 अप्रैल 1979 को सुभाष घीसिंग ने दार्जिलिंग हिल्स के नेपाली भाषी लोगों के लिए अलग राज्य बनाने की मांग कर दी। साल भर के भीतर, 5 अप्रैल 1980 को सुभाष घीसिंग ने अलग राज्य के नाम का भी ऐलान कर दिया, 'गोरखालैंड’! जिस पार्टी के बैनर तले अलग राज्य की लड़ाई लडऩी थी, सुभाष घीसिंग ने उसका नाम रखा, 'गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा अंग्रेजी के शार्ट फार्म में, 'जीएनएलएफ’।

1986-87 गोरखा आंदोलन का सबसे हिंसक कालखंड रहा है, जिसमें लगभग 1200 लोग मारे गये थे। जून 1986 की वह तारीख अब मुझे याद नहीं है, पर दार्जिलिंग के डॉ. जाकिर हुसैन रोड के जिस मुख्यालय में सुभाष घीसिंग से मुलाकात हुई थी, चलते वक्त उन्होंने चेतावनी दी थी, सुबह पांच बजे जैसे भी आप लोग दार्जिलिंग से निकल लीजिए। हमने वैसा ही किया। सिलीगुड़ी से 35 किलोमीटर पहले कुर्सियांग हिल्स तक पहुंचे तो पता चला कि 12 जगहों पर बम विस्फोट हुए हैं। यानी, सुभाष घीसिंग विस्फोट वाली योजना से वाकिफ थे।

सुभाष घीसिंग यहीं तक नहीं रुके। उन्होंने तत्कालीन नेपाल नरेश बीरेंद्र बीर बिक्रम शाहदेव को पत्र लिखकर कहा कि वह इसमें हस्तक्षेप करें, क्योंकि दार्जिलिंग कभी नेपाल का हिस्सा हुआ करता था। नेपाल नरेश बीरेंद्र इस पर चुप लगा गये। जुलाई 1988 में सुभाष घीसिंग अगले राज्य की मांग को छोडऩे पर सहमत हो गये। यह अंदरखाने सौदेबाज़ी का परिणाम था कि 22 अगस्त 1988 को केन्द्र, राज्य सरकार, तथा सुभाष घीसिंग ने 'दार्जिलिंग गोरखा हिल कौंसिल’ (डीजीएचसी) के गठन किये जाने वाले दस्तावेज़ पर दस्तखत किये।

इसके बजरिये इस इलाके में पर्यटन, आर्थिक-सांस्कृतिक विकास का अधिकार हिल कौंसिल को प्राप्त हो गया था। सुभाष घीसिंग का दो दशकों तक 'डीजीएचसी’ पर अखंड राज रहा। इस बीच 'दार्जिलिंग गोरखा हिल कौंसिल के तीन चुनावों में सुभाष घीसिंग की पार्टी,'जीएनएलएफ’ को फतह हासिल होती रही।

चौथा चुनाव 2004 में था। उधर, कोलकाता में कुछ ऐसे रणनीतिकार बैठे थे, जिन्हें एक तीर से दो शिकार करना था। पहला, सुभाष घीसिंग का प्रभामंडल निस्तेज करना, और दूसरा लक्ष्य था गोरखा राजनीति में फूट। सरकार ने चुनाव न कराने का ऐलान करते हुए सुभाष घीसिंग को 'डीजीएचसी’ का वाहिद 'केयर टेकर’ बनाने की घोषणा कर दी। इसके प्रकारांतर, 6 दिसंबर 2005 को दार्जिलिंग हिल्स में विभिन्न जनजातियों की 'ट्राइबल कौंसिल’ बनाने का फरमान जारी कर दिया। यहीं से फूट का सिलसिला आरंभ हुआ। पार्टी के युवा नेता, और सुभाष घीसिंग के सबसे भरोसेमंद विमल गुरूंग ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएमएम) बनाने का ऐलान किया।

विमल गुरूंग को इंडियन आइडल से मशहूर हुए प्रशांत तमांग का साथ मिल गया। इन लोगों की वजह से सुभाष घीसिंग का जनाधार खिसकने लगा, और मार्च 2008 में 'डीजीएचसी’ के चेयरमैनशिप से इस्तीफा देने के बाद जलपाईगुड़ी स्थित अपने घर जाकर बैठ गये। सुभाष घीसिंग एक बार जो राजनीति से विस्थापित हुए, उनका दोबारा से पुनर्वास नहीं हो सका।

लेकिन क्या दार्जिलिंग हिल्स में यह सारी लड़ाई नेपाली भाषा और गोरखा अस्मिता को लेकर लड़ी जा रही है? कहने के लिए नेपाली भाषा-भाषी और गोरखा मूल के लोगों के लिए यह आंदोलन है। इसकी जड़ में जाएं, तो सबसे बड़ा खेल आर्थिक है, जिस पर इस इलाके के क्षत्रप अपना वर्चस्व चाहते हैं। चाय बगान और दार्जिलिंग टी के निर्यात से लेकर पर्यटन, शराब की बिक्री से कई सौ करोड़ की सालाना आमदनी को कोलकाता में बैठे राजनेताओं से छीन लेना भी गोरखा आंदोलन के कर्णधारों का सबसे बड़ा लक्ष्य रहा है।

रोमित बागची ने उन दिनों को याद करते हुए 'गोरखालैंड: क्राइसिस ऑफ स्टेटहुड’ नामक पुस्तक में लिखा, '13 'ऑफ शॉप’, और 54 लाइसेंसी बार से तीन करोड़ रुपये महीने की उगाही के उद्देश्य से सुभाष घीसिंग ने शराबबंदी का फरमान जारी किया। उन दिनों दार्जिलिंग हिल्स के 112 ग्राम पंचायतों में से छह पर 'सीपीआरएम’(कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ रेवोल्यूशनरी मार्क्सिस्ट) का कब्जा था, बाकी पर 2007 तक 'जीएनएलएफ’ का कंट्रोल रहा। 'जीजेएमएम’ के बनने के बाद सुभाष घीसिंग ने 'डीजीएचएस’ के प्रशासक पद से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही सभी ग्राम पंचायतों ने विमल गुरूंग की 'जीजेएमएम’ के प्रति अपनी वफादारी दिखानी शुरू कर दी।’


गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएमएम)के अस्तित्व में आने के तीन साल के भीतर ही विमल गुरूंग ने दार्जिलिंग हिल्स में अपनी नेतागिरी अच्छी जमा ली थी। 2011 के विधानसभा चुनाव में 'जीजेएमएम’ को दार्जिलिंग जिले के तीन विधानसभा क्षेत्रों में 79 प्रतिशत मत मिलना इसका सबसे बड़ा प्रमाण था।

दार्जिलिंग शहर में माकपा प्रत्याशियों को मात्र 3.5 फीसद वोट प्राप्त हुए, तो उसकी वजह बंगाली समर्थक बताये गये। दार्जिलिंग के चाय बगानों पर कोलकाता, सिलीगुड़ी के उद्योग घरानों के आधिपत्य को ऐसे उकेरा गया, गोया ये बंगाल सरकार के उपनिवेश हों। चाय बागानों में कितने वर्कर रखने हैं, उस पर पहले सुभाष घीसिंग की मर्ज़ी चलती थी, बाद में विमल गुरूंग ने अपनी चलानी आरंभ कर दी।

दार्जिलिंग शहर में दुकानों पर जो बोर्ड लगाये जाते, उसमें लिखे पते पर 'पश्चिम बंगाल’ नहीं, 'गोरखालैंड’ लिखने की शुरूआत हो गई थी।

फिर भी, विमल गुरूंग को यह भय सताता रहा है कि जिस राजनीतिक व्यूह रचना से सुभाष घीसिंग निपटा दिये गये थे, उसी ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल उनके विरूद्ध न होने लगे। 2015 में कलिंगपोंग विधानसभा क्षेत्र के नेता हर्क बहादुर क्षेत्री ने 'जीजेएमएम’ से अलग होने का ऐलान किया। हर्क बहादुर क्षेत्री ने आरोप लगाया कि विमल गुरूंग इस क्षेत्र में विकास के मूल मुद्दे से भटक गये हैं, ये सिर्फ वोट पाने और पैसा बटोरने के वास्ते राजनीति कर रहे हैं। इसके अलावा एक और खेल हुआ।

मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने इस इलाके में विकास के नाम पर विभिन्न जनजातियों के अलग-अलग 'डेवलपमेंट बोर्ड’ बनाने का ऐलान किया। इससे भड़के 'जीजेएमएम’ के नेता अमर सिंह राई ने बयान दिया, 'यह फूट डालो, और राज करो’ की नीति है। पांच वर्षों में 'कोलकाता’ ने ऐसे छह बोर्ड बनाये हैं। लेपचा, तमांग, राई, भूटिया, शेरपा और मगर कम्युनिटी के विकास बोर्ड बनाने का मतलब यही है।’

अमर सिंह राई के आरोप में दम इसलिए लग रहा है, क्योंकि सिलीगुड़ी शहर से मशहूर फुटबॉल खिलाड़ी वाइचुंग भुटिया को तृणमूल के टिकट से चुनाव लड़वाने के पीछे यही रणनीति थी। मगर, इस बार ममता बैनर्जी ने बंगाली भाषा को अनिवार्य किये जाने का ऐलान क्या किया, अपनी रणनीति में खुद उलझ सी गईं।

विमल गुरूंग, और भाजपा के नेता शायद इसी प्रतीक्षा में थे। इस सुलगते सवाल पर पेट्रोल डालने में भाजपा ने भी अप्रत्यक्ष सहयोग किया है, ताकि ममता बैनर्जी राष्ट्रपति चुनाव तक इसी विषय में उलझी रहें। हालांकि, मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने बंगाली की अनिवार्यता दार्जिलिंग हिल्स में समाप्त करने का ऐलान कर दिया। मगर, इसमें काफी देर हो चुकी थी।

गोरखालैंड आंदोलन में अपनी रोटी सेंकने, और लारा-लप्पा देने में भाजपा ने जिस तरह का छल-प्रपंच किया है, उससे वहां का आम नागरिक कम वाकिफ है। दार्जिलिंग लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत कलिंगपोंग, कुर्सियांग, सिलीगुड़ी, माटीधर नक्सलबारी, दार्जिलिंग, फांसीदेवा-सुरक्षित और चोपरा समेत सात विधानसभा क्षेत्र आते हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जसवंत सिंह को यहां से टिकट दिया था। मैनीफैस्टो में जसवंत सिंह के मुद्रित वायदे को दार्जिलिंग हिल्स के लोगों ने संभाल कर रखा है, जिसमें उन्होंने गोरखालैंड बनवाने का संकल्प किया था।

ऐसे संकल्प के पीछे लोगों को भरोसा इसलिए था, क्योंकि केंद्र की भाजपा सरकार नवंबर 2000 में झारखंड, और छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा दिलवा चुकी थी। भाजपा, तेलंगाना व गोरखालैंड के निर्माण को सिद्धांतत: समर्थन दे रही थी। मगर, जसवंत सिंह खुद ही 'बुरे दिन’ के शिकार होकर कोमा में चले गये। 2014 के आम चुनाव में एक बार फिर उसी पुराने वायदे के साथ भाजपा के एसएस अहलुवालिया, दार्जिलिंग लोकसभा सीट से जीत गये।

उन्हें समर्थन देने वाले गोरखालैंड के नेताओं को एक माह बाद ही इस धोखे का अहसास हो गया, जब जून 2014 में तेलंगाना को 29वां राज्य बनाया गया। फरेब का यह सारा फसाना मोदी सरकार के आने के बाद गढ़ा गया।

एसएस अहलुवालिया भाजपा सांसद से कृषि राज्य मंत्री बन गये। मगर, उनकी खामोशी, इस पूरी कपट कथा की पोल खोलती है कि सिर्फ वोट के वास्ते गोरखा मतदाताओं की भावनाओं से कैसे खेला गया। एसएस अहलुवालिया ने नारदा-शारदा घोटाले से संबंधित सवाल न जाने कितनी बार सदन में उठा चुके हैं, मगर गोरखालैंड का सवाल उनकी सूची से बाहर होता है।

खानापूर्ति के लिए एसएस अहलुवालिया ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिख दिया है कि वह बतायें कि गोरखालैंड की मांग सही है, या नहीं। यह कितना बड़ा मजाक है कि अपने क्षेत्र की भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बारे में एक चुना हुआ प्रतिनिधि देश के गृह मंत्री से पूछ रहा है!

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

पुष्परंजन के आलेख