रिजर्व बैंक, उर्जित पटेल और नोटबंदी

डॉ. हनुमन्त यादव : रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने गत 20 जनवरी को संसद की लोक लेखा समिति की मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में अपने सहयोगियों के साथ उपस्थित हुए।...

डॉ. हनुमंत यादव

डॉ. हनुमन्त यादव
रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने गत 20 जनवरी को संसद की लोक लेखा समिति की मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में अपने सहयोगियों के साथ उपस्थित हुए। बैठक में उन्होने समिति के सदस्यों द्वारा सवालों के माैिखक जवाब दिए। लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के.वी. थामस  ने 8 जनवरी को रिजर्व बैंक के गर्वनर को 10 सवालों की एक सूची भेजी थी, जिसके जबाव लेकर गर्वनर को इस बैठक में उपस्थित होना था। इस बैठक में कांग्रेस तथा तृणमूल कांग्रेस के  सदस्यों द्वारा  नोट बंदी से संबंधित पूछे गए सवालों का भाजपा के सदस्यों द्वारा यह कहकर विरोध किया गया कि चूंकि यह बैठक मौद्रिक नीति की समीक्षा से संबंधित है इसलिए मौद्रिक नीति से संबंधित सवाल ही पूछे जाए । भाजपा सदस्यों के विरोध के कारण नोट बंदी से संबंधित अनेक बिन्दुओं का खुलासा नहीं हो पाया । समिति के अध्यक्ष के.वी. थामस ने रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल को सवालों की एक नई सूची सौंपकर उन्हें जबाव के साथ 10 फरवरी को उपस्थित होने के लिए कहा है ।
समाचार पत्रों के अनुसार इस बैठक में  भाजपा व विरोधी सदस्यों के बीच दो तीन बार गरमागरम तकरार की नौबत भी आई । कहा जाता है कि बैठक के प्रारम्भ में ही समिति के अध्यक्ष के.वी. थामस द्वारा नोटबंदी पर दिए गए बयान का जब विरोध किया तो भाजपा व विरोधी सदस्यों के बीच तकरार की नौबत आ गई । उसी प्रकार भाजपा के सदस्यों ने जब काले धन को निकालने के लिए नोटबंदी कदम के लिए रिजर्व बैंक के गवर्नर का आभार व्यक्त  किया तो कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों ने यह कर विरोध किया कि यदि बैठक में आभार ही व्यक्त करना था तो इस बैठक की जरूरत क्या थी? तीसरी बार तकरार तब हुई  जब विरोधी दल के सदस्यों ने नोटबंदी से संबंधित सवाल पूछने प्रारंभ किए तो भाजपा के सदस्यों ने विरोध करते हुए कहा कि मौद्रिक नीति समीक्षा की इस बैठक में केवल मौद्रिक नीति से संबंधित सवाल ही पूछे जाना चाहिए तथा नोटबंदी संबंधित सवाल न उठाए जाए ।
लोक लेखा समिति में कुल 22 सदस्य होते हैं जिनमें 15 सदस्य लोक सभा के होते हैं। 1967 से अध्यक्ष पद पर  विरोधी दल के लोकसभा सदस्य की नियुक्ति किए जाने की परम्परा चल रही है । वर्तमान में केरल से लोकसभा के लिए निर्वााचत वरिष्ठ कांग्रेसी के.वी. थामस लोक लेखा समिति के अध्यक्ष हैं। लोक लेखा समिति की बैठक में  उर्जित पटेल द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब से  से कुछ महत्वपूर्ण खुलासे हुए हैं।  पहला, नोट बंदी पर सरकार एवं रिजर्व बैंक के बीच जनवरी 2016 से बातचीत चल रही थी। नोटबंदी का फैसला सरकार ने  लिया था। दूसरा,  रिजर्व बैंक के संचालक मंडल की 8 नवम्बर को सम्पन्न आपात बैठक में नोटबंदी का सर्वसम्मति से औपचारिक  निर्णय लेकर सरकार को तत्काल सूचित किया गया था जिसके उपरांत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रात्रि 8 बजे नोटबंदी का ऐलान किया। तीसरा, रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन बाजार में नकदी बढ़ाने के लिए 5000 रुपए तथा 10,000 रुपए के नोट जारी करने पर विचार कर रहे थे। 2000 रुपए का नोट जारी करने का फैसला जून में ही लिया जा चुका था।  चौथा, 500 रुपए तथा 1000 रुपए के कितने नोट रिजर्व बैंक के पास वापस आए इसकी गिनती का काम अभी भी चल रहा है।        
यद्यपि लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के. वी. थामस को अपने सभी सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं पा सकने के कारण निराशा हुई है, किन्तु जो भी थोड़ी बहुत जानकारी दी गई है वह भी महत्वपूर्ण है। एक तो यह साफ  हो गया है कि सरकार जनवरी 2016 से नोटबंदी पर विचार कर रही थी किन्तु वह पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को नोटबंदी के लिए राजी नहीं कर पाई थी इसलिए नोटबंदी नहीं की जा सकी। यह तो एक सामान्य समझ की बात है कि जब रघुराम राजन नकदी लेनदेन बढ़ाने के लिए 5000 रुपए तथा 10,000 रुपए के नोट प्रचलन में लाने पर विचार कर रहे थे तथा 2000 रुपए का नोट मुद्रित करने के बारे में जून 2016 में ही निर्णय ले चुके थे, तो वे 500 रुपए तथा 1000 रुपए के नोटबंदी के लिए क्यों कर सहमति देते?  केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री अर्जुनराम मेघवाल का 2 दिसम्बर को संसद में दिया गया बयान असत्य है कि नोटबंदी का फैसला रिजर्व बेैंक का था सरकार का नही था । क्योंकि यदि नोटबंदी का फैसला रिजर्व बैंक का होता तो उसे 8 नवम्बर को  फैसले करने के लिए अचानक आपातकाल बैठक नहीं करना पड़ती,  वह पूरी तैयारी करने के बाद इसको लागू करती, हर दिन नए नए आदेश जारी नहीं करने पड़ते  तथा इतने दिनों तक अफरातफरी नहीं मचती ।
सरकार द्वारा बिना तैयारी के हड़बड़ी में की गई नोटबंदी के कारण आम जनता के बीच रिजर्व बैंक की छवि खराब हुई है  तथा उसकी स्वायत्तता पर आंच आई है । स्वायत्तता की बात चलने पर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी. सुब्बाराव की कार्यप्रणाली की बरबस याद आ जाती है । डी. सुब्बाराव 2008 से 2013 तक पांच साल रिजर्व बैंक के गवर्नर पद पर रहे। भारतीय उद्योग व्यवसाय को मंदी से बचाने तथा जीडीपी दर में तेजी लाने के लिए उस समय के वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी तथा पी. चिदम्बरम द्वारा बार बार रेपो रेट में कटौती करने की सलाह के बावजूद डी. सुब्बाराव ने रेपो रेट में कमी करना तो दूर की बात उसे बढ़ाते रहे। उन्होंने मुद्रा स्फीति नियंत्रण के नाम पर साल  2010-11 के 16 महीनों में हर एक मौद्रिक नीति की समीक्षा में रेपो रेट की बढ़ोत्तरी करके लगातार  11 बार रेपो रेट में बढ़ोत्तरी का विश्व  कीर्तिमान कायम किया। यही नही उन्होंने अपनी पुस्तक हू मूव्ड माइ इंटरेस्ट रेट्स - लीडिंग द रिजर्व बैंक ऑफ  इंडिया थ्रू फाइव टब्र्यूलेंट इयर्स में दोनों वित्तमंत्रियों पर दबाव डालने का आरोप लगाया।  मुद्रा संकुचन को मुद्रा स्फीति से भी अधिक खतरनाक माना जाता है क्योंकि इससे मनी डिफलेशन अर्थात मुद्रा संकुचन की स्थिति निर्मित होती है जिसें फलस्वरूप बाजार में लेनदेन के लिए नकदी की कमी हो जाती है तथा अंतत: जीडीपी की वृद्धि दर में गिरावट आती है । रिजर्व बैंक के वर्तमान गवर्नर उर्जित पटेल ने यह जानते हुए भी कि 500 रुपए तथा 1000 रु पए के नोटों के विमुद्र्रीकरण से मुद्रा संकुचन की स्थिति निर्मित हो जाने से विकास दर में गिरावट आएगी, सरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दबाव में आकर नोटबंदी को अंजाम दिया। संभवत: सेवानिवृत्त होने के बाद जब वे अपनी  पुस्तक में  अपने संस्मरण लिखेंगे तभी वास्तविकता की पूरी जानकारी मिल पाएगी।


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