वर्षाजल का संरक्षण भी बने अभियान

दो साल पहले जब देश के अधिकांश हिस्सों में कम बारिश हुई थी, इन्हीं गर्मियों के दिनों में पेयजल संकट पर चिन्ता और जल संरक्षण के उपायों पर कहीं न कहीं बात जरुर होती थी। प्रचार माध्यमों में पानी बचाने वाल...

देशबन्धु
वर्षाजल का संरक्षण भी बने अभियान
देशबन्धु

दो साल पहले जब देश के अधिकांश हिस्सों में कम बारिश हुई थी, इन्हीं गर्मियों के दिनों में पेयजल संकट पर चिन्ता और जल संरक्षण के उपायों पर कहीं न कहीं बात जरुर होती थी। प्रचार माध्यमों में पानी बचाने वाले ईश्तहार भी दिखाई दे रहे थे। प्राकृतिक संसाधनों के मामले में छत्तीसगढ़ से समृद्ध देश का शायद ही कोई दूसरा राज्य हो। जल संसाधन के मामले में भी यहां काफी अच्छी स्थिति है, लेकिन जिस तरीके से जल का दोहन यहां हो रहा है, उससे इस जल संसाधन के ही खत्म होने का संकट आसन्न दिखाई देने लगा है। बारहमासी बहने वाले नदी-नाले तक सूखने लगे हैं और भूजल स्तर में भी काफी तेजी से गिरावट आ रही है। राज्य के उन इलाकों में जहां 50 से 100 फीट की गहराई में पानी मिल जाता था, वहां अब दो सौ से तीन सौ फीट की खुदाई भी कम पडऩे लगी है। नलकूपों के जरिए पीने के पानी की जरुरतों को पूरा करना जब आज मुश्किल हो रहा हो तो कल के इस भयावह संकट  की कल्पना करना कठिन नहीं है। आज की जरुरत यह है कि कल के लिए पानी कैसे बचाया जाए। साधनों और संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। इस दिशा में प्रयासों की कमी अवश्य दिखाई देती है। बड़े-बड़े जलाशयों, बांधों का निर्माण तो हो रहा है पर उन छोटे-छोटे प्रयासों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जो जल संरक्षण में बेहद कारगर माने गए हैं। सरकार ने राज्य में 50 हजार तालाबों के निर्माण की योजना बनाई है। इसी तरह किसानों के खेतों में डबरियों के निर्माण के लिए अनुदान की योजना भी चलाई जा रही है। दूसरी तरफ सैकड़ों की तादाद में तालाब पट गए,जस पर ध्यान नहीं दिया गया। वर्षाजल के संरक्षण के लिए सभी भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य किया गया है, लेकिन इसका पालन भी नहीं हो रहा है। सबसे पहले सरकार ने सरकारी भवनों में ये सिस्टम लगाने निर्देश दिए थे, जिस पर अब तक अमल नहीं हो सका। प्राकृतिक तरीके से वर्षाजल के संरक्षण की संरचनाएं तहस-नहस हो चुकी हैं। बढ़ते शहरीकरण, क्रांकीट की सडक़ें और विकास की दूसरी गतिविधियों के कारण धरती की वह सतह कम पड़ती जा रही है जो वर्षाजल सोख लिया करती थी। दूसरी तरह भूजल को गहरे नलकूपों ने तीन सौ फीट या उससे नीचे पहुंचा दिया। आज हमारी चिंता यह होनी चाहिए कि धरती की सतह पर जल भंडारों को कैसे बढ़ाया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो उन नदी-नालों को भी पुनर्जीवित करने में मदद मिल सकती है, जो सूख चुके हैं या सूखते जा रहे हैं।  मौसम वैज्ञानिकों ने इस वर्ष भी सामान्य वर्षा होने की संभावना जाहिर की है। वर्षाजल के संरक्षण की दृष्टि से यह एक अच्छा मौका हो सकता। यदि जल संरक्षण के लिए संरचनाओं के विकास और उपयोग को एक विशेष अभियान के रुप में लिया जा सके।


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