किसका, और कैसा महागठबंधन!

पुष्परंजन : पिछले लगभग पांच साल से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ताओं को अकेले दम पर पार्टी को खड़ी करने के हसीन सपने दिखा रहे थे।...

पुष्परंजन

पुष्परंजन
पिछले लगभग पांच साल से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ताओं को अकेले दम पर पार्टी को खड़ी करने के हसीन सपने दिखा रहे थे। दिसंबर के पूर्वाद्र्ध तक राहुल गांधी की किसान सभा, खाट सभा खूूब लगी। उस समय अंदाजा नहीं था कि कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ‘प्लान बी’ पर फोकस कर रहे थे। ‘प्लान बी’, यानी सपा से गठबंधन। लेकिन इस ‘प्लान बी’ की मिट्टी-पलीद सपा की पहली लिस्ट से ही हो रही है। जहां कांग्रेस के ‘सीटिंग एमएलए’ हैं, वहां भी सपा ने प्रत्याशियों के नाम की घोषणा कर दी। इससे कांग्रेस ग़़ुस्से में है। उत्तर प्रदेश में मुसलमान प्रत्याशियों को टिकट देने की जो होड़ लगी है, उससे मुस्लिम मतों का बंटना तय है। इससे सांप्रदायिकता घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ेगी। गैर भाजपा दलों के मुस्लिम प्रत्याशियों के बीच जंग छिडऩे का नजारा देखने को तैयार रहिए।
सवाल यह है कि बिहार में महागठबंधन के लिए जितना जोश विपक्ष के सभी प्रमुख नेताओं ने दिखाया था, उसकी त्वरा 2017 तक आते-आते कहां विलुप्त हो गई? विपक्षी एकता और सांप्रदायिक शक्तियों के विरूद्ध जो चेहरे पटना के मंच पर दिखे थे, उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं नजर आ रहे हैं? इस तथाकथित महागठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजीत सिंह से यदि सपा नेता सीधी बातचीत नहीं कर सके, तो चुनाव में किस तरह सांप्रदायिक शक्तियों की तरफ  वोट के स्थानांतरण को रोक सकेंगे? पश्चिम उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट का मजगर ( मुस्लिम, जाट, गुजर, राजपूत) वोट समीकरण, महागठबंधन नहीं होने की सूरत में किस तरफ  शिफ्ट करता है, यह देखना दिलचस्प होगा। गठबंधन राजनीति की बहती गोमती में ऑल इंडिया मजलिसे इत्तहादुल मुसलमीन के नेता असदुद्दीन ओवैसी भी हाथ धो लेना चाहते हैं। अजीत सिंह सभी 403 सीटों पर छोटे दलों को मिलाकर लड़ेंगे, ऐसी हुंकार उन्होंने भर दी है। क्या यह सारा कुछ कांग्रेस के युवा कमान की अपरिपक्वता का परिणाम है?
पता नहीं यह किस तरह का महागठबंधन संवाद है, जिसमें सपा ने मगरूर होकर कह दिया कि 403 में से 54 सीटों पर कांग्रेस ‘डिजर्व’ करती है, उसे ज़्यादा से ज़्यादा 30 सीटें और दे सकते हैं। सपा उपाध्यक्ष किरणमोय नन्दा यहां तक कह गये कि रालोद नेता से कोई बात नहीं हुई है। यह मीडिया में लगातार बने रहने का अहंकार है कि सपा नेतृत्व अजीत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता से बात तक नहीं कर रहा है। दरअसल, कांग्रेस गठबंधन नहीं कर रही है, अपनी दुर्गति करा रही है। सपा उससे ऐसे पेश आ रही है, जैसे सीट शेयर नहीं, रोटी के बचे टुकड़े उसके आगे फेंक रही हो। राज बब्बर ने सही कहा कि गठबंधन कार्यकर्ताओं के सम्मान के आधार पर हो। लेकिन क्या सचमुच कांग्रेस कार्यकर्ताओं की सुनी जा रही है? सम्मान तो दूर की बात है, इस तथाकथित महागठबंधन का आधार सिर्फ  यह है कि राहुल को अखिलेश अच्छे लगते हैं। सांप्रदायिक ताकतों को रोकने की बात तो बस बहाना है।
कल तक गुलाम नबी आजाद कांग्रेस, आरएलडी, और सपा के बीच गठबंधन की खबरों को ‘बेसलेस’ कह रहे थे। कुछ दिन पहले तक कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता मानने को तैयार नहीं थे कि बिहार की कथा यूपी में दोहराई जाएगी। उन्हें लगता था कि कांग्रेस आलाकमान पार्टी में जान फूंकने के लिए सचमुच गंभीर है। भावुक और समर्पित कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि क्यों पार्टी के ‘सेनापति’ ऐसे समय देश में नहीं हैं, जब चुनाव आयोग तारीख की घोषणा करने को है। राहुल गांधी एक बार फिर रहस्यमय विदेश यात्रा पर थे। ख़ुसूसन, चुनाव के वक्त राहुल की विदेश यात्रा रहस्य और अटकलबाजियों से भरी होती है। सितंबर 2015 में ऐसा ही हुआ था, जब बिहार चुनाव का बिगुल बज चुका था और राहुल गांधी किसी अनजाने से देश में छुट्टियां मना रहे थे। तब पांचजन्य ने अपने संपादकीय में चुटकी ली थी, ‘पुरानी पार्टी के नये मिस्टर इंडिया!’ क्या यह उस ‘बीमारी’ का प्रारंभिक लक्षण है? चुनाव के वक्त जब राहुल गांधी विदेश यात्रा पर हों, तब क्या ऐसा संकेत प्राप्त कर लेना चाहिए कि कांग्रेस के शिखर नेता गठबंधन कर सकते हैं?
उत्तर प्रदेश में जिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपनी ता$कत झोंक दी थी, उनमें से अधिकांश इस समय हताशा, क्षोभ, और ग़ुस्से से भरे हुए हैं। इन कार्यकर्ताओं में से कुछ की प्रतिक्रियाएं लोगों ने टीवी पर देखी होगी। बिहार में ऐसा ही छलावा हुआ था, जब पार्टी कार्यकर्ताओं को लगा था कि कांग्रेस अपने दम पर खड़ी हो जाएगी। ऐन वक्त, राहुल गांधी विदेश से लौटे, और ऐलान किया कि ‘सांप्रदायिक शक्तियों’ से लडऩे के लिए वे महागठबंधन में शामिल होंगे। बिहार में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के उत्साह की कमर टूट चुकी थी। बिहार में महागठबंधन को जो 178 सीटें हासिल हुईं, उनसे क्या कांग्रेस फायदे में रही? 27 सीटें पाने के बाद तीसरे नंबर पर रही कांग्रेस, बिहार में कभी विकल्प की राजनीति कर पायेगी, या विधानसभा की सभी 243 सीटों पर लडऩे की परिकल्पना कभी उसके कार्यकर्ता कर पायेंगे, इस पर हमें शक है।
 कई बार यह देखकर क्षोभ होता है कि एक ऐतिहासिक पार्टी का ‘सेकेंड इन कमांड’, इतना किंकर्तव्यविमूढ़ और ‘कन्फ्यूज़्ड’ क्यों है? कभी आप दाढ़ी में नजर आते हैं, फिर अचानक क्लीन शेव्ड। कभी बैंक, एटीएम की कतार, दलितों की झोंपड़ी में अवतरित होते हैं, फिर दोबारा नहीं दिखते। संसद में भूचाल लाने का शिगूफा छोड़ते हैं, उसके प्रकारांतर बिना विपक्ष को भरोसे में लिये, प्रधानमंत्री के कक्ष में किसानों की चिंता के बहाने पधार जाते हैं। दो हफ्ते की विदेश यात्रा से लौट कर आते हैं, और मंच पर मतदाताओं को कुर्ते की फटी जेब दिखाकर देश का अंतिम आदमी बनने का अभिनय करते हैं। वैसे ही, जैसे केजरीवाल ने मफलर लपेटे, कमीज में बेतरतीब बटन लगा कर बेफिक्र निकल लेने वाले साधारण शहरी बनने का ढोंग किया था। मगर, केजरीवाल ने मुख्यमंत्री बनने तक ‘बेचारा आदमी’ का वेश बनाये रखने में निरंतरता दिखाई थी। राहुल की राजनीति में निरंतरता नहीं है। मोदी को क्या किसी ने क्लीन शेव्ड देखा? नहीं देखा। चाहे दस लाख का सूट पहने, या दस हजार की सदरी, पब्लिक के बीच देश के ‘प्रधानसेवक’ झकाझक, टिच होकर निकलते हैं। पीएम मोदी ने तय किया कि नोटबंदी पर संसद में नहीं बोलना है, तो नहीं बोले। तय किया कि लाल कृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी को खुड्डे लाइन लगाना है, तो लगा के ही माने।
सवाल यह भी है कि बिहार में ब्रांड मोदी की मार्केटिंग के बावजूद गठबंधन की बेबसी भाजपा को क्यों थी? लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा को डूबते को तिनके का सहारा गठबंधन की वजह से मिला। 2014 में ब्रांड मोदी के विराट स्वरूप को देखकर कुछ विश्लेषक आकलन कर रहे थे कि गठबंधन के दिन लदने वाले हैं। मगर, हुआ उल्टा। आज हालत यह है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में केंद्र और विभिन्न प्रांतों को मिलाकर कुल जमा 44 पार्टियां हैं। उसके बरक्स आज की तारीख में दस साल तक गठबंधन सरकार चलाने वाले यूपीए के पास 13 में से 10 सहयोगी रह गये हैं।
‘एनडीए’ ने गठबंधन के नाम पर कौरवों की जो सेना खड़ी की है, उनका कोई दीन-ईमान और राजनीतिक सिद्धांत नहीं है, उससे वही नेता जुड़े हैं, जिन्होंने ताउम्र शाहे वक्त को सलाम करने की राजनीति की है। राम विलास पासवान उनमें से एक हैं। मगर, गठबंधन की दुर्गति भाजपा भी कम नहीं झेल रही है, जो शिवसेना, अकालियों और पीडीपी से निरंतर भद्द पिटवाने के बाद भी उनसे पीछा नहीं छुड़ाती। इसे गठबंधन राजनीति की मजबूरी कहें, या लोकतंत्र की ख़ूबसूरती? एक ओर भाजपा गाली देने वाले सहयोगियों को गले लगाये हुए है, दूसरी ओर कांग्रेस जब सत्ता में थी, भ्रष्ट दलों के गठबंधन को ढो रही थी।
किसी जमाने में जर्मन दार्शनिक फ्रीडरिष नीत्से का मुहावरा ‘लिव डेंजरसली’ (जोखिम के साथ जियो) दुनिया भर में बहस के केंद्र में था। लेकिन जो रिस्क लेने की राजनीति से बचना चाहते थे, उन राजनेताओं के लिए गठबंधन ही विकल्प बचा था। जिस जर्मनी में नीत्से की विचारधारा पर जबरदस्त बहस हुई, वहां सबसे अधिक गठबंधन की राजनीति हुई है। इस समय भारत समेत दुनिया के चौरासी देशों में गठबंधन सरकारें हैं। यूरोप के बाद सबसे अधिक एशियाई देशों में गठबंधन की राजनीति हुई है, तीसरे नंबर पर अफ्रीका है। 1864 में कनाडा में ‘ग्रेट कोअलिशन’ (महागठबंधन) की शुरूआत हुई थी। तो क्यों नहीं इसे दुनिया का सबसे पुराना महागठबंधन कहें, जब कनाडा में लिबरल और डेमोक्रेटिक पार्टी ने मिलकर सरकार बनाना तय किया था।
भारत में पहली गठबंधन सरकार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में 24 मार्च 1977 से 15 जुलाई 1979 तक चल पाई। उनके इस्तीफे के बाद चौधरी चरण सिंह देश के पांचवे प्रधानमंत्री बने। $िफर भी गठबंधन सरकार पांच साल पूरे नहीं कर पाई। 1989 के आम चुनाव के बाद एक बार फिर  गठबंधन सरकार बनी, जो दो प्रधानमंत्रियों वीपी सिंह और चंद्रशेखर को देने के बाद 1991 में असमय वीरगति को प्राप्त कर गई। एक बार $िफर 16 मई 1996 से 19 मार्च 1998 तक देश को गठबंधन सरकार की दुर्गति देखनी पड़ी। अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ  तेरह दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रह पाये। पौने दो साल में तीन प्रधानमंत्रियों अटल जी, एचडी देवेगौड़ा, और इंद्र कुमार गुजराल का रहना सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण था। समय बड़ा बलवान है। 1999 से 2004 तक पांच साल एनडीए की पहली गठबंधन सरकार भी अटल जी ने चलाई। और, उससे भी बड़ी लकीर 13 दलों के गठबंधन वाले यूपीए (संप्रग) ने दो टर्म रहकर खींची। मनमोहन सिंह दस साल गठबंधन कैसे चला ले गये, काश! राहुल गांधी उनसे कुछ मंत्र लेते!
pushpr1@rediffmail.com


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