स्वच्छ भारत अभियान की ‘गणेश परिक्रमा’

पुष्परंजन : 6अक्टूबर, 2012 को कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ऐसा क्या कह दिया था, जिसे लेकर देश में आग लग गई। उस समय जयराम रमेश ग्रामीण विकास मंत्री थे, और एक सभा में कह दिया...

पुष्परंजन
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6अक्टूबर, 2012 को कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ऐसा क्या कह दिया था, जिसे लेकर देश में आग लग गई। उस समय जयराम रमेश ग्रामीण विकास मंत्री थे, और एक सभा में कह दिया कि हमारे देश में देवी-देवताओं की कोई कमी नहीं है। आप पूछें, तो कुछ ज़्यादा ही देवी-देवताएं हैं। परंतु कुछ कमी है हमारे देश में तो स्वच्छता की। हरेक भारतवासी को शर्म महसूस होना चाहिए कि आज भी साठ प्रतिशत महिलायें खुले में शौच करती हैं। यूपीए मंत्री के इस बयान ने मानों बर्र के छत्ते को छेड़ दिया था। स्वयं उनकी पार्टी के नेता बचाव, लीपापोती, और सफाई देने की मुद्रा में थे। इस घटना के अगले साल 2 अक्टूबर, 2013 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में बयान दिया, ‘मैं कहता हूं, पहले शौचालय, फिर देवालय!’ मोदी उन्हीं बातों, तर्कों को दोहराते गये जिन्हें जयराम रमेश ने रखा था। इस पर धर्म की राजनीति करने वाले किसी नेता को आपत्ति नहीं हुई। राजीव प्रताप रूडी को भी नहीं, जिन्होंने जयराम रमेश के विरूद्ध सबसे पहले मोर्चा खोला था।
देवालय बनाम शौचालय का यह सिलसिला थमा नहीं है। हफ्ता भर पहले गुवाहाटी के मंच पर धर्मगुरु स्वामी चिदानंद सरस्वती ने नारा दिया,‘ पहले शौचालय, फिर विद्यालय, और अंत में देवालय!’ गुवाहाटी का मंच सूबे की भाजपा सरकार का था, जहां मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल प्रदेश के पांच गांवों को शौचालय मुक्त व स्वच्छता अभियान में सबसे आगे रहने के लिए पुरस्कृत कर रहे थे। इस कार्यक्रम के आयोजन में यूनिसेफ, और ‘जीवा’ यानी ग्लोबल इंटरफेथ वाश अलायंस की सहभागिता थी। इसी मंच पर जमीयत उलमा-ए-हिंद के नेता मौलाना मदनी ने ऐलान किया कि बिना शौचालय वाले घर में काजी निकाह नहीं पढ़ाएंगे। जीवा के साथ आये जैन और ईसाई धर्मगुरुओं ने भी शौचालय और सफाई को प्राथमिकता देने पर बल दिया। जीवा के लगभग सभी धर्मगुरुओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान की भूरि-भूरि प्रशंसा की, और केंद्र सरकार के लिए कसीदे पढ़े।  
ग्लोबल इंटरफेथ वाश अलायंस (जीवा) का शुभारंभ संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान 25 सितंबर, 2013  को यूनिसेफ मुख्यालय में किया गया था। जीवा जैसे संगठन को बनाने, और उसे सक्रिय किये जाने के पीछे अवधारणा यह थी कि सभी मतों से जुड़े धर्मगुरु एक मंच पर इक_े हों, और यूनिसेफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के स्वच्छता अभियान को आगे बढ़ायें। यह विमर्श का विषय है कि सामाजिक बदलाव के वास्ते भारत में धर्मगुरुओं की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है? क्या यह किसी ऐसी योजना का हिस्सा है, जिसमें समाज के हर शोबे की  रोजमर्रा की आदतों, व्यवहारों को धर्मगुरु तय करें, और उसे लागू कराने के पीछे सरकार खड़ी हो?
भारत को ‘सेक्युलर देश’ कहने की परंपरा क्यों चल पड़ी, समझ में नहीं आता। ‘सेक्युलर’ का सीधा अर्थ उस व्यक्ति और समाज से है, जिसका संबंध धर्म से नहीं है। बल्कि, भारत को ‘सेक्युलर’ के बदले एक बहुधर्मी देश कहना ज़्यादा उचित होगा। 2011 में हुई जनगणना से जानकारी मिलती है कि भारत में 79.8 प्रतिशत लोग हिंदू मत को मानने वाले, 14.2 फीसदी इस्लाम, 2.3 प्रतिशत प्रभु यीशु को मानने वाले, सिख 1.7 फीसदी, जैन शून्य दशमलव चार प्रतिशत, और शून्य दशमलव सात फीसदी अन्य मतों को मानने वाले लोग हैं। जो बातें इस जनगणना में दिलचस्प थीं, वह ये कि धर्म में आस्था न रखने वाले लोगों की संख्या भारत में तेजी से बढ़ती जा रही है।
2011 की जनगणना में 29 लाख लोग नास्तिक निकले, जो भारत की आबादी के 0. 24 फीसदी हैं। उससे दस साल पहले, 2001 की जनगणना में ऐसे अनीश्वरवादियों की संख्या सिर्फ सात लाख थी। दिल्ली में 13 हजार 606 ऐसे लोग थे, जिन्होंने गणना के दौरान में किसी भी धर्म का होने से मना किया। यह संख्या देश के अन्य मेट्रो शहर से अधिक है। बंगाल और केरल के बारे में हमारी कल्पना थी कि धर्म को न मानने वाले वहां ज़्यादा होंगे। बंगाल में सीपीएम सदस्य संख्या सात लाख से अधिक है, मगर 2011 के जनगणना में सिर्फ दो लाख 30 हजार वैसे लोग निकले जो धर्म में विश्वास नहीं करते। केरल में कोई तीन लाख माकपा के मेंबर हैं, मगर अनीश्वरवादी मात्र 88 हजार हैं। मतलब, जो कामरेड धर्म को अफीम मानने का ढोंग करते रहे, उनकी भी आस्था ईश्वर में रही है।
अकादमिक क्षेत्र में धर्म गुरुओं का समाज पर रुहानियत रूसुख भी शोध का विषय रहा है। सौ साल पहले धर्म का समाजशास्त्रीय विवेचना करने वाले इमाइल दुरखाइम ने माना था कि आध्यामिक गुरु एक ‘एक्सटर्नल फोर्स’ की तरह काम करते हुए सामाजिक बदलाव लाएंगे। प्रोफेसर दुरखाइम ने फ्रायड का प्रसिद्ध शोध ग्रंथ, ‘द फ्यूचर ऑफ एन इल्यूजन’ को अपनी विवेचना का आधार बनाया था। दुनिया के मुख्तलिफ हिस्सों में समय-समय धर्म के सामाजिक पहलू की समीक्षा होती रही है। समाज और राजनीति पर धर्मगुरुओं का कितना दखल और असर है, यह  पश्चिम में सर्वे करने वाली संस्थाओं का प्रमुख विषय रहा है।
अमेरिका की ‘पीईडब्ल्यू रिसर्च सेंटर’ ने दिसंबर 2012 में 230 देशों और इलाकों की जनसांख्यिक जानकारी के हवाले से बताया कि दुनिया की चौरासी फीसदी आबादी आस्तिक है, और किसी न किसी मत में विश्वास करती है। ‘ग्लोबल रिलीजियस लैंडस्केप’ नामक इस रिपोर्ट में 2500 जनगणनाओं, सर्वे, और जनसांख्यिक रजिस्टर को आधार बनाया गया था। ज्यूरिख में ‘विन गालअप’ एक संस्था है, जिसने अप्रैल 2015 में एक सर्वे के आधार पर जानकारी दी थी कि धर्म में अत्यधिक विश्वास रखने वाले दस देशों में थाईलैंड, आर्मेनिया, बांग्लादेश, जार्जिया, मोरक्को, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, अल्जीरिया, केन्या, और मैसेडोनिया हैं। भारत इस सूची में फिलहाल नहीं है, मगर ‘विन गालअप’ के शोधकर्ता मानते हैं कि पिछले तीन वर्षों में भारत में धर्म के प्रति आस्था में तेजी आई है। उसके सामाजिक-राजनीतिक कारण हो सकते हैं।
 अमेरिका में मतदान सर्वेक्षक और विश्वविद्यालयों के स्कॉलर मानते हैं कि वहां एक बहुत बड़ी आबादी अलौकिक ताकतों और टोटकों में विश्वास करती है। इसलिए ‘वोटिंग पैटर्न’ को घुमाने-फिराने में धर्मगुरुओं की बड़ी भूमिका रहती है। मास, प्रेयर, बाइबिल रीडिंग ऐसे सत्र हैं, जहां धर्मगुरु सियासी संदेश लोगों के दिलों-दिमाग में बोते हैं। डॉ. डोबलियरे, शावेज, हैडेन, हेमोंड जैसे अकादमिक क्षेत्र के लोगों ने इसकी विस्तार से चर्चा की है। अफ्रीका को तो धर्म की प्रयोगशाला मान कर चलना चाहिए, जहां औपनिवेशिक ताकतों ने धर्मगुरुओं के जरिये जनता को हांकते रहने का काम लगातार किया है। धाना और माली में अल बरबर व्यापारी और अफ्रीकी शासकों ने सत्ता व व्यापार के वास्ते मजहबी रहनुमाओं का जमकर इस्तेमाल किया था। उसका नाम ही ‘अरब-बरबर टेक्नीक’ पड़ गया।
एक जमाने में सिएरालियोन से भारी संख्या में अफ्रीकी युवा लंदन लाये गये, उन्हें धार्मिक रूप से परिपक्व कर वापिस अफ्रीका छोड़ा गया, ताकि वहां वे लोगों को चर्च में आने की आदत के साथ रहन-सहन भी बदल सकें। इस बारे मेें वाशिंगटन डीसी स्थित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर फॉर अफ्रीकन स्टडी•ा’ में विस्तृत शोध कार्य हुआ है। सब-सहारा अफ्रीका में धर्म गुरु क्या-क्या खेल करते रहे, इसे जानने के लिए 2015 में प्रकाशित राबर्ट ए. दाउद की पुस्तक ‘क्रिश्चनिटी, इस्लाम एंड लिबरल डेमोक्रेसी: लेसन फ्रॉम सब-सहारा अफ्रीका’ पढऩे लायक है। इस पुस्तक में इसकी तफ्सील है कि किस तरह ईसाई और मुसलमान धर्मगुरुओं ने 1980 और 90 के दशक में ‘पॉलिटिकल एक्टीविजम’ (राजनीतिक सक्रियतावाद) को विस्तार दिया।
तो क्या लंबे समय तक उपनिवेशवाद झेल चुका भारत भी राजनीतिक सक्रियतावाद के दौर से गु•ार रहा है, जिसके वास्ते स्वयं सरकार, यूनिसेफ, यूएसएड जैसी संस्थाएं पादरी, उलेमाओं, ग्रंथियों, और धर्मगुरुओं का सहारा ले रही हैं? दिक्कत यह है कि भारत में धर्मगुरुओं की भी अलग-अलग लॉबी है, जिनमें कुछ सत्ता के करीब, तो कई सरकार के विरूद्ध मोर्चा खोलकर अपने हित साधने में लगे हुए हैं। गुवाहाटी के प्रेस सम्मेलन में स्वामी चिदानंद सरस्वती से मैंने सवाल किया था कि ‘एक अरब तैंतीस करोड़ की आबादी वाले देश में जो लोग ‘सरकारी धर्मगुरुओं’ से इत्तेफा$क नहीं रखते, या फिर देश के 29 लाख नास्तिक जो आप सबों की बात नहीं सुनते, उनके बीच इस महाभियान को कैसे छेड़ पाएंगे?’ बाबा का अनुलाप यही था कि हम उन्हें भी सम्मानपूर्वक समझाएंगे। पर, व्यवहार में यह संभव नहीं है।
सरकार चाहे किसी की हो, यूनिसेफ, यूएसएड जैसी संस्थाएं सामाजिक बदलाव के वास्ते जो काम करती आ रही हैं, वह प्रशंसनीय हंै। मगर, साख का सवाल उनके लिए है जो ‘जैसी बही बयार पीठ तब तैसी कीजिए’ के सनातन सिद्धांत पर अपना काम कर रहे हैं। देश भर में शौचालय, स्वच्छ भारत पिछली सरकारों का भी अजेंडा था। जयराम रमेश ने 2012 में ‘निर्मल भारत यात्रा’ की थी, जिसका नामलेवा ‘जीवा’ में कोई नहीं है।
ग्लोबल इंटरफेथ वाश अलायंस की चालीस पेज की मैग•ाीन के हर पन्ने को मैं पलट गया, कहीं एक शब्द इसकी चर्चा नहीं है कि स्वच्छ भारत के वास्ते पिछली सरकारों ने कुछ किया भी है। सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती हुई परमार्थ मिशन की एक और पत्रिका, ‘जर्नी ऑफ पीस’ बाबा के चेलों ने होटल में दी थी। चौरासी पेज में मोदी सरकार की चौरासी परिक्रमा से अधिक कुछ नहीं मिला। यह सब देखकर मन में यही सवाल उठता है कि प्रचार के शोर में हमारे नेता और बाबा स्वच्छ भारत अभियान की गणेश परिक्रमा तो नहीं कर रहे हैं? ऐसा कहने की वजह है। गुवाहाटी के ही मंच पर यूनिसेफ के ‘वाटर सैनिटेशन एंड हाइजीन सेक्शन’ के प्रमुख निकोलाज ओसबर्ट ने बयान दिया कि 75 फीसदी आदिवासियों, और 63 प्रतिशत दलितों को स्वच्छता अभियान की सुविधाएं हासिल नहीं है। मगर, असमिया ढोल की थाप में यह सवाल नेपथ्य में कहीं ग़ुम हो गया!
pushpr1@rediffmail.com


 

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