छोटे सत्र - छोटी होती चर्चा

प्रभाकर चौबे : पिछले कुछ वर्षों से संसद तथा राज्य विधानसभाओं में सत्र ‘लघु’ होने लगे हैं। यहां तक कि बजट सत्र भी छोटा किया जाने लगा है जबकि बजट सत्र कम से कम दो-अढ़ाई माह का होना चाहिये।...

प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे
पिछले कुछ वर्षों से संसद तथा राज्य विधानसभाओं में सत्र ‘लघु’ होने लगे हैं। यहां तक कि बजट सत्र भी छोटा किया जाने लगा है जबकि बजट सत्र कम से कम दो-अढ़ाई माह का होना चाहिये। लेकिन अब सरकारों ने नया तरीका अपनाया है- सत्र छोटा करो। हास्यास्पद स्थिति है। एक दिन तो राज्यपाल के भाषण का होता है। छोटा सत्र जनता के साथ न्याय नहीं है। इससे तो बजट सत्र बुलाना ही क्यों चाहिए। वित्तमंत्री अपने वित्त सचिव के माध्यम से बजट जारी कर दें। इंटरनेट पर डाल दें। मोबाईल पर मैसेज भेज दें कि राज्य का बजट देखना हो तो राज्य सरकार का फलां-फलां साईट पर जाइए, क्लिक कीजिए बजट देख लीजिए। सत्र बुलाने, पेश करने और विपक्ष की बात सुनने के झंझट से मुक्ति मिलेगी। जब हर काम डिजिटल होना है, जब बार-बार कहा जा रहा है कि देश को डिजिटल बनाना है तो सरकार भी सत्र क्यों बुलाए- नेट पर सत्र पढ़ ले जनता। संसद के सत्र भी छोटे होने लगे हैं। जब बजट सत्र छोटा किया जाने लगा है, तो अन्य सत्र- मानसून सत्र, शीतकालीन सत्र की क्या औकात कि वे बड़े हों अत: दोनों ही सत्र ‘बोनसाई’ कर दिये गये हैं। छोटे-छोटे सत्र सुन्दर सत्र, मधुर सत्र, मधुर बातें। बाद में अपनी पीठ खुद थपथपा ली कि सत्र काफी सफल रहा। इतने दिनों में इतने घंटे चर्चा हुई। सत्र की अवधि कम क्यों की जाने लगी है। इस पर मीडिया भी उतनी आवाज नहीं उठा रहा। कुछ चिंतक जरूर चिंता व्यक्त कर रहे हैं लेकिन सत्ता तो चिंतकों की अपने मतलब से सुनती है और अपने अनुसार उनकी अनसुनी करती जाती है। कोई भी सत्ता चिंतकों, साहित्यकारों की उतनी ही सुनती है जो उसके हित में हो और उतनी ही आ•ाादी बरदास्त करती हो जिससे सत्ता पर खरोंच न आये। एक सीमा- यह सीमा ‘सत्ता’ तय कर देती है। सत्ता अपने खिलाफ उतना ही सुनती है जितना वह पसंद करती है। इसलिये सरकारों ने सदन के सत्रों की अवधि अपनी सुविधा को ध्यान में रखकर तय कर लिया है। लम्बे-लम्बे सत्र होते रहे। उनमें सरकार की बखिया उधेडऩे का काफी वक्त मिलता रहा। सरकारें मुश्किल में पड़ती गईं अत: सत्र ही छोटा कर दो- ‘न रहे बांस न बजे बांसुरी...’ न सत्र लम्बा हो न विपक्ष को मौका मिले। अब तो सत्र के दौरान कई-कई बार सदन से वाकआउट किया जाने लगा है। वाक-आउट आम बात हो गई है। पहले वाक-आउट प्रमुखता से मीडिया में आता। जनता भी मानती कि कोई बड़ी बात हुई होगी। अब तो 15-15 दिन सदन ठप कर रखने का रिकार्ड कायम हो रहा है। मजेदार बात यह कि भाजपा कांग्रेस को दोष देती है और कांग्रेस भाजपा को।  वे दोनों ही यह कर रहे- ‘को बड़ छोट कहत अपराधू...।’ इसका कारण यह भी है कि दोनों का ही रास्ता, आर्थिक विकास का रास्ता, नीतियां एक समान हैं। बहरहाल सवाल यह कि सत्र छोटे क्यों किये जा रहे हैं- क्या सरकारें प्रतिपक्ष से डरने लगी है।  क्या सरकार की कमीज मैली-सी हो गई है या एकदम गंदी हो गई है और वह इसे प्रतिपक्ष के माध्यम से जनता तक पहुंचने नहीं देना चाहती। क्या संविधानिक इच्छा पूरी करना है इसलिये नाममात्र को सत्र बुला लिया ले-दे कर रस्म अदायगी कर दी- नेगचार पूरे कर दिये। विपक्ष भी खुश और सत्तापक्ष तो खुश होता ही है। अब तो प्रतिपक्ष तक छोटे सत्र का सवाल खड़े नहीं कर रहा प्रतिपक्ष भी मजे में है। लगता है सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष दोनों के बीच एक आपसी समझ पैदा हो गई है। दोनों ही इसी बुर्जुआतंत्र के प्रोडक्ट हैं अत: दोनों की कुंडली एक-सी है और इसीलिये दोनों का ही संसदीय आचरण एक-सा है। लगता है अब जनता भी उदासीन-सी हो गई है और बौद्धिवर्ग भी निराश-सा हो गया है। क्या कहें। कोई सुनता ही नहीं। सुनता भी हो तो ध्यान नहीं देता। पक्ष-विपक्ष का एक-सा आचरण संसदीय लोकतंत्र को घर की खेती बना रहा है।
होना तो यह चाहिये कि सत्र लम्बे हों। सालभर सत्र चलें। कुछ जरूरी अवकाश को छोड़ कर, बाकी दिन सत्र हों तभी सही काम होगा। अपने संसदीय क्षेत्र, विधानसभा क्षेत्र में जाने के लिए अवकाश का उपयोग हो। रोज का भत्ता मिले, वेतन और अच्छा सम्मानजनक दैनिक भत्ता मिले। हां, पेंशन दी जाये लेकिन एक ‘राष्ट्रीय पेंशन’ नीति बने जिसमें हर नागरिक को निश्चित पेंशन की पात्रता हो। छोटे सत्र से सरकार की तकलीफ शून्य हो जाती है और उसे संसदीय कार्य कम से कम करने का सुअवसर प्राप्त हो जाता है। छोटे सत्र होने के कारण कई-कई जरूरी मुद्दे उठाने का समय नहीं मिल पाता, उठाये नहीं जा सकते और सरकार आराम से बिना काम किये, बिना जवाब दिये बुचक लेती है। मजेदार बात यह कि यहां रोज ही सत्र की बात की जा रही है उधर मंत्री तक तो रोज अपने सरकारी दफ्तर जाते नहीं हां, कुछ अपवाद हो सकते हैं। कुछ मंत्री हो सकता है रोज ही दफ्तर जाते हों। लेकिन अधिकतर तो घर पर ही अपने सरकारी दफ्तर में काम करते हैं। कई बार मुख्यमंत्री ने रोज या हफ्ते में तीन दिन अनिवार्य रूप से दफ्तर जाने की हिदायत दी। प्राय: हर मुख्यमंत्री ने दी है लेकिन ‘इस कान सुन, उस कान निकाल’ की स्थिति निर्मित हो जाये तो मुख्यमंत्री क्या करें।
इन दिनों प्राय: हर राज्य का बजट सत्र चल रहा है। संसदीय तंत्र का यह बजट मौसम है। अच्छा लगता है कि बसंत और बजट सत्र एक साथ आते हैं। बसंत में ही बजट आता है। लेकिन अब केन्द्र सरकार ने बजट पेश करने की तिथि बदल दी- पहले 28 फरवरी को बजट पेश किया जाता था। पूंजीवाद को मजबूत करने वाला बजट। बजट पेश करने की तारीख बदल दी गई लेकिन चरित्र ज्यों का त्यों रखा गया। कबीर ने कहा है-
मन न रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा...।
विचार पंूजीवादी, बजट की तारीख बदल कर कुछ नया देने का ढकोसला- जनता को भ्रम में रखने का नया नुस्खा। पूंजीवादी सरकारें ऐसे ढेरों चोंचले कर जनता को भरमाती रहती है। बहरहाल राज्य विधानसभाओं के बजट सत्र का मौसम चल रहा है। छत्तीसगढ़ के वित्तमंत्री ने भी बजट पेश किया। यह एक रस्म अदायगी है। बजट पेश होते ही त्वरित टिप्पणी की जाती है। राजनेता तो करते ही हंै। मीडिया भी करता है। और कुछ विशेषज्ञ मीडिया में चर्चा करते हैं। यह लोकतांत्रिक तरीका है। चर्चा हो, जमकर हो। जनता को पता चले कि उनके लिये पेश किये गये बजट में क्या-क्या है और इसका आर्थिक गतिविधियों पर क्या-क्या प्रभाव पड़ेगा। राजतंत्र में यह सुविधा नहीं थी- अब हर नागरिक को पता होता है कि उनके लिये सरकार क्या करने का रही है। कहां स्कूल खोलेगी, कहां कॉलेज और कहां अस्पताल किस आय वर्ग को क्या देगी। पूरा आर्थिक क्रियाकलाप सामने रख दिया जाता है। लेकिन साल भर में जनता को कहां कुछ याद रहता है। और प्रतिपक्ष भी अपने काम में व्यस्त हो जाता है। बस फिर अगला बजट आ जाता है।
 विकासोन्मुख बजट का क्या अर्थ है। किसका विकास और किस हद तक विकास। राज्य के प्रतिव्यक्ति आय के बढऩे का अर्थ क्या है और उसे मापने का पैमाना क्या है। वही पूंजीवादी पैमाना। अगर प्रतिव्यक्ति आय 90 हजार वार्षिक हुई है तो इसका क्या अर्थ हुआ? सकल घरेलू उत्पाद को आबादी से भाग देकर प्रतिव्यक्ति आज की गणना कितना भ्रामक दृश्य पेश करती है- मानो किसी राज्य की आबादी दो है। जिसमें एक व्यक्ति की वार्षिक आय एक लाख रुपये है और दूसरे की 10000 रुपये है तो राज्य में प्रतिव्यक्ति औसत वार्षिक आय कितनी हुई। सकल आय एक लाख +10 हजार= एक लाख दस हजार उसे दो से भाग दे दो तो प्रति व्यक्ति औसत आय हुई 55 हजार (वाह! ये है पूंजीवादी गणना पद्धति और इसी रास्ते पर हमारी सरकारें चल रही हैं। उन्हें चुनाव की ही पड़ी रहती है। संसाधनों का असमान बंटवारा ही पूंजीवादी सरकारों में चलता है। खुश हो लीजिये।
prabhakarchaube@gmail.com


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