सरकारी शिक्षा - गोद ले लो!

प्रभाकर चौबे पूरी व्यवस्था में हमारी शिक्षा को ‘बेक बेंचर’ बना दिया गया है- अंतिम बेंच पर बिठा दिया गया है। क्लास रूम में क्लास टीचर होशियार बच्चे को प्रथम पंक्ति में बिठाते हैं- यह नियम अंगे्रजीकाल स...

प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे
पूरी व्यवस्था में हमारी शिक्षा को ‘बेक बेंचर’ बना दिया गया है- अंतिम बेंच पर बिठा दिया गया है। क्लास रूम में क्लास टीचर होशियार बच्चे को प्रथम पंक्ति में बिठाते हैं- यह नियम अंगे्रजीकाल से  पता चला आ रहा है, आज भी चल रहा है। पहली बेंच में बैठने वाले होशियार। माता-पिता अपने बच्चे से पूछते भी रहे कि कहां बैठते हो पहली बेंच पर या आखिरी बेंच पर। बेक बेंचर एक हीनभावना दर्शाने वाला मुहावरा भी बन गया। बहरहाल पूरी व्यवस्था में शिक्षा को बेक बेंचर बना दिया जाना हमारी उसी सोच का परिणाम है- प्राथमिकता तो ‘पूंजी अर्जन’ के तरीकों को दी जाती है। शिक्षा खेल आदि तो ‘सहायक क्रिया’ है- शिक्षा पाकर धन अर्जन कर पाये न भी कर पाये कोई गारंटी तो है नहीं। फिर इसमें सरकार को खर्च करना पड़ता है।  शिक्षा मद में दी गई राशि ‘खर्च’ मानी जाती है, निवेश (इनवेस्टमेंट) नहीं मानी जाती। अंग्रेज यहां अपनी सत्ता को मजबूत करने वाली शिक्षा देना चाहते रहे- वैसा ही दिया। यह अलग विषय है। लेकिन आ•ाादी के  बाद भी शिक्षा में सुधार के नाम पर कई-कई प्रयोग होते रहेे। पूंजीवादी व्यवस्था को जरा भी खरोंच न पड़े, ऐसी शिक्षा दी जाए जो इस व्यवस्था को  कायम रखने में मददगार हो और इसे मजबूत भी करे यह प्रमुख उद्देश्य रहा। आ•ाादी के बाद शिक्षा पर जितने प्रयोग किए गए उतने अन्य किसी क्षेत्र में नहीं किए गए। कुछ शिक्षा आयोग भी गठित किए गए- उनकी सिफारिशों का कितना पालन किया गया, यह तो जनता को पता नहीं। स्कूली शिक्षा पर सुझाव देने कोठारी आयोग का गठन किया गया। 1964 में आयोग में अपनी सिफारिश प्रस्तुत की। लेकिन कोठारी कमीशन की पूरी सिफारिश लागू नहीं की गई। केवल इतना ही किया गया कि जिन प्रदेशों में 10+2 शिक्षा प्रणाली लागू नहीं थी (11 वीं की थी) उन प्रदेशों में 10+2 शिक्षा प्रणाली लागू कर दी गई। कहने का आशय यह कि शिक्षा को लेकर ढेरों प्रयोग किए गए- 8 वीं बोर्ड परीक्षा शुरू की गई। फिर कुछ वर्ष बाद 8वीं के स्थान पर 7वीं कक्षा में बोर्ड परीक्षा लिए जाने का प्रयोग हुआ और 5वीं की जगह 4थी की बोर्ड परीक्षा ली गई। शायद 2-3 वर्ष बाद पुन: 8वीं बोर्ड व 5वीं बोर्ड की परीक्षा शुरू की गई। मजेदार बात यह कि इस प्रयोग में विद्यार्थियों के एक-दो ऐसे बैच भी निकले जिन्होंने न 5वीं की बोर्ड परीक्षा दी न 4थी की, न 8वीं की बोर्ड परीक्षा दी न 7वीं की। शिक्षा को हास्यास्पद स्थिति में पहुंचा दिया गया, आज भी वही स्थिति है।
पालकों को और बच्चों को यह पता निश्चित ही नहीं होता कि इस साल परीक्षा होगी कि ‘सतत मूल्यांकन’ प्रणाली ही जारी रहेगी। परीक्षा होगी तो विद्यालय परीक्षा लेगा या बोर्ड परीक्षा होगी। परीक्षा की जवाबदारी प्रधानपाठक और स्कूल से छीनकर शिक्षा विभाग को दे देना या शिक्षा विभाग खुद ले (पता नहीं, सरकार ने यह किया या शिक्षा विभाग ने, वे ही जानें) यह तो शिक्षा को गौण बना देना है। शिक्षा कोई ‘लघु खनिज’ है क्या जिसकी नीलामी का दायित्व सरकार के विभाग की है? शिक्षा देश के लिए नागरिक तैयार करती है। सरकारें शिक्षा को चलताऊ तरीके से ले रहीं। कभी विभाग कहता है कि केवल सरकारी स्कूलों की परीक्षा विभाग लेगा-फिर कहता है कि निजी स्कूलों की भी परीक्षाएं विभाग लेगा- उसकी समझ में आ नहीं रहा कि उसे करना क्या है? ‘एक को मां की, एक को मौसी की’ मतलब सरकारी स्कूलों के लिए अलग आदेश-नियम निजी के लिए अलग मानदंड- यह शिक्षा के प्रति कौन-सा दृष्टिकोण है, किस कीमत पर चल रही है सरकार। फिर हड़बड़़ी में परिणाम निकालते हैं और ढेरों विसंगतियां होती हैं। बाद में पुनर्मूल्यांकन फिर पुन: रिजल्ट में सुधार, प्रावीण्य सूची में सुधार या नई प्रावीण्य सूची जारी करना ये क्या गोरखधंधा बना रखा है- शिक्षा-परीक्षा है कि मछली पकडऩा। छत्तीसगढ़ी कहावत है-
लकर-धकर के घानी,
आधा तेल, आधा पानी।

दूसरी बात यह कि शिक्षा अधिकार कानून क्या आया व्यवस्था के पेट का पानी डोलने लगा। शिक्षा व्यवसाय पर कब्जा जमाए बैठे किसी को भी यह शिक्षा का अधिकार ‘राईट टू एजुकेशन’ प्रावधान पसंद नहीं आया। साधनसम्पन्न लोगों के स्कूल में वंचितों के बच्चे आएं, यह उन्हें पसंद नहीं। युगों से चला आ रहा है कि जो वंचित है वे बाहर ही रहें। तर्क दिया जाने लगा कि वंचित वर्ग के बच्चे इन सम्पन्नवर्ग के बच्चों के साथ कैसे बैठ सकेंगे? एडजस्ट नहीं कर सकेंगे और हीनता के शिकार होंगे। सम्पन्न वर्ग के बच्चों के टिफिन को देखकर ही वंचित वर्ग के बच्चे भौचक्के रह जाएंगे। सरकारें भी प्रहसन पेश करती हैं। सरकार का बयान आता है कि इस वर्ष वंचित वर्ग के इतने प्रतिशत बच्चों को सजोरों के विद्यालयों में एडमिशन दिलाया गया- सरकार अपनी पीठ थपथपा लेती है। वंचित वर्ग को तुष्ट कर लिया, ऐसा सोचने लगती है। लेकिन सरकारी विद्यालयों-भवनों को धीरे-धीरे निजी हाथों में क्यों सौंपा जा रहा है? जब निजी विद्यालय इतने थे तब सरकारी, नगरपालिका, डिस्ट्रिक्ट कौंसिल के विद्यालयों ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का दायित्व निभाया।
बात यह है कि आज शिक्षा एक बड़ा उद्योग बन चुका है, इसमें करोड़ों रुपए लगे हैं- सबसे बड़ा उद्योग हो शायद। प्राय: हर राज्य में प्राय: हर मंत्री, विधायक किसी नेता का शिक्षण व्यवसाय चल रहा है- उनका हित शिक्षा से नहीं शिक्षा के व्यवसाय के साथ जुड़ा है- शिक्षा व्यवसाय में केवल शिक्षा ही नहीं है। इसमें, पानी की बॉटल, किताबें, कापियां, कापियों पर कवर और कापी-किताब पर नाम लिखकर चिपकाने के लिए पट्टी, बस्ता, यूनिफार्म वाहन आदि-आदि शामिल है और ये सब मिलकर ‘शिक्षा उद्योग’ बने हैं- इतने बड़े उद्योग पर कौन हाथ डाले। पालक भी जाने-अनजाने साथ हैं और इस तरह इस सम्मिलित शक्ति का सबसे पावर फुल उद्योग बन गया है। इसी ताकत का दबाव है कि केन्द्र सरकार का शिक्षा मंत्रालय (मानव संसाधन मंत्रालय) 10वीं बोर्ड परीक्षा फिर से शुरू करने की बात कर रहा है- मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संकेत कर दिया है। इधर प्रदेशों में शायद 8वीं व 5वीं की पुन: बोर्ड परीक्षा शुरू कर दी जाए।
हर साल, समय-समय पर सरकार अचानक जम्हाई लेती-सी मुद्रा में आती है और शिक्षा पर बोल पड़ती है जैसे जम्हाई लेते हुए कोई बड़ा आदमी कहे- पानी लाना... ठीक उसी अंदाज में मानव संसाधन मंत्री बोल उठते हैं- शिक्षा को जनोपयोगी बनाना है और सबकी पहुंच के दायरे में लाना है- सरकार इसके लिए कृत-संकल्पित है। अब एक और वाक्य जोड़ा जा सकता है- 70 साल से जो नहीं हुआ वह हम करेंगे। शिक्षा सुधारने का आशय रह गया है- सरकारों के बदलने के साथ ही पाठ्य पुस्तकें बदलना। सरकार आते ही पहला हमला पाठ्य पुस्तकों पर होता है- पाठ्य पुस्तकें बदली जाएंगी, मानों पाठ्य पुस्तक बदलने से शिक्षा व्यवस्था सुधर जाएगी-ये क्या है। फिर सारी मीडिया चर्चा पाठ्य पुस्तकों पर केन्द्रित कर दी जाती है। शिक्षा के निजीकरण पर चर्चा के लिए अवकाश ही नहीं, स्थान ही नहीं मिल पाता। शिक्षा व्यवस्था किस तरह देश में गैरबराबरी की सोच को मजबूत कर रही है, शिक्षा उसे किस तरह मजबूत कर रही है इस पर बात ही न हो, सरकार की यही मंशा है। शिक्षा में सुधार का एक मतलब कुछ के लिए, यह भी है कि मातृभाषा के विद्यालय बंद हों और अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा शुरू की जाए- वैसे यह कार्पोरेट की मंशा है। भाजपा सरकार भी पूंजीवादी व्यवस्था को मजबूत करने वाली सरकार है। शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी शत-प्रतिशत हो, यह प्रयास चलेगा। दस दिन पहले दिल्ली सरकार ने आदेश निकाला था कि नर्सरी में बच्चों को मोहल्ला स्कूल मेंप्रवेश दिया जाए। सम्पन्न पालकों को केजरीवाल सरकार का यह आदेश पसंद नहीं आया और उन्हें लगा कि यह उनकी ‘इच्छा’ पर पाबंदी लगा दी गई है अत: कुछ सजोर पालक कोर्ट गए। कोर्ट ने केजरीवाल सरकार का आदेश निरस्त कर दिया और टिप्पणी की कि ऐसा आदेश पालकों के अपनी पसंद का स्कूल चुनने के अधिकार पर प्रतिबंध लगाता है। कोर्ट के निर्णय के बाद केजरीवाल सरकार का एक जनहित वाला आदेश शून्य हो गया। मजेदार बात यह कि कोर्ट के इस निर्णय पर कुछ समाचारपत्रों ने हेडिंग लगाई- ‘केजरीवाल सरकार को कोर्ट का झटका...’ समझ में नहीं आया कि इसमें केजरीवाल सरकार को क्या झटका लगा- झटका तो वंचित वर्ग को लगा- यह आदेश सजोरों के अधिकार की रक्षा करता है। दरअसल अब व्यवस्था संबंधी कोर्ट के निर्णय भी ‘वैश्विक पूंजीवाद’ की मंशा के अनुरूप आने लगे हैं। देश की शिक्षा को निजी क्षेत्र गोद लेने आतुर है- सरकार भी गोद देने तत्पर है। लगता है अब सरकार शिक्षा को नहीं पाल सकती... गोद लेने वाला खोज रही है।
prabhakarchaube@gmail.com


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