उकता देने वाली चुनाव प्रक्रिया

प्रभाकर चौबे किसी लम्बी उबासी की तरह हमारे देश की ‘चुनाव प्रक्रिया’ अब ऊबाऊ होने लगी है- और चुनाव परिणाम की प्रतीक्षा हनुमान की पूंछ की तरह लम्बी ही होते जाती है। अभी पांच राज्यों की विधानसभा के चुनाव...

प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे
किसी लम्बी उबासी की तरह हमारे देश की ‘चुनाव प्रक्रिया’ अब ऊबाऊ होने लगी है- और चुनाव परिणाम की प्रतीक्षा हनुमान की पूंछ की तरह लम्बी ही होते जाती है। अभी पांच राज्यों की विधानसभा के चुनाव हुए- डेढ़ माह लग गया। पहले तीन चुनाव में इतना वक्त नहीं लगता रहा। यह सोचा गया कि एक-एक जगह के परिणाम घोषित करते चलने में इसके परिणाम का प्रभाव दूसरे क्षेत्र में पड़ता है जो ठीक नहीं है। मतलब एक विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र में एक पार्टी का उम्मीदवार जीता तो दूसरी जगह जहां चुनाव हो रहा है वहां इसका असर पड़ सकता है। जिन्हेंं पहले दूसरे आम चुनाव की याद हो वे बता सकते हैं कि एक विधानसभा क्षेत्र का परिणाम घोषित होता रहता और पड़ोस के विधानसभा क्षेत्र में वोटिंग चलती होती और पहले क्षेत्र में जिस पार्टी का केंडीडेट जीता हो तो वह पार्टी पड़ोस के क्षेत्र में आकर प्रचार करने लगती कि वहां पार्टी जीत गई और इसका शायद असर भी होता। चुनाव प्रक्रिया बदलने का एक तो यह कारण हो सकता है। इसके साथ ही जैसे-जैसे समय बीतने लगा चुनाव में कई तरह के हथकंडे अपनाए जाने लगे। शुरूके दौर में पैसा, कम्बल, साड़ी, शराब बांटना ही चलता था। बाद में जैसे-जैसे समय बीतने लगा आम चुनाव में ‘बूथ कैप्चरिंग’ का रिवाज-सा हो गया। बूथ कैप्चरिंग का मतलब होता किसी खास पार्टी के दबंग उस बूथ पर कब्जा कर लेते। मतदाता को वोट डालने दिया नहीं जाता। उन दिनों ऊंगली पर निशान लगाने का रिवाज नहीं था। मतपत्र पर उस पार्टी के निशान पर ठप्पा लगाना होता। होता यह कि पार्टी के दबंग बूथ पर कब्जा कर ‘वोट के ठेकेदार’  के द्वारा निर्देशित चुनाव चिन्ह पर ठप्पा लगाते और इस तरह परिणाम को प्रभावित करते। धनबल और बाहुबल का खुला खेल चलता। स्थानीय पुलिस मूकदर्शक की भूमिका में होती। यह दु:खद स्थिति रही। बूथ कैप्चरिंग केवल ताकत के बल पर ही नहीं होता। लालच देकर भी बूथ कैप्चरिंग किया जाता- उन दिनों किसी वोटर के या बड़ी संख्या में वोटरों के नाम पर दूसरे वोट कर देते- अवैध वोटिंग जमकर कराई जाती। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होते।
यह विचारणीय है, इस पर गहन चर्चा हो कि जैसे-जैसे समय बीतने लगा लोकतांत्रिक प्रणाली में भ्रष्टाचार घुसने लगा। पहला आम चुनाव जितना सादगी, ईमानदारी से हुआ उतना बाद के चुनाव नहीं हुए। क्या बात है कि धीरे-धीरे चुनाव में धनबल व बाहुबल का प्रभाव बढ़ा। कुछ राजनीतिक दल व व्यक्ति चुनाव जीतने के लिए चुनाव को प्रभावित करने के लिए ताकत का प्रयोग करने लगे। एक ओर तो यह प्रचारित किया जाने लगा- मीडिया में चर्चा की जाने लगी कि हमारा लोकतंत्र मजबूत हो रहा है, दूसरी ओर चुनाव में गड़बडिय़ां बढऩे लगीं। मतदान के दौरान मारपीट, हिंसा, हत्या आम घटना में शामिल होने लगे। कई भय के कारण भी मत डालने नहीं जाते। ऐसी भी शिकायतें आने लगीं थीं कि अधिक मतदान ‘वास्तविक मतदान’ न होकर गड़बड़ किया गया मतदान है। यह सही है कि आम चुनाव के प्रारंभिक दौर में ही चुनाव में वोटरों को ‘प्रलोभन’ का रिवाज शुरू हो गया था- 1952 के चुनाव में भी हुआ। हां, कम हुआ। बाद में तो यह आम चर्चा में रहा कि फलां बूथ में मतदान शाम को तेजी से हुआ क्योंकि उस मतदान केन्द्र में एक खास इलाके के वोटर ‘पैसे’ का इंतजार करते बैठे रहे- दोपहर को पैसा पहुंचा तब जाकर घर से निकले। बहरहाल यह दु:खद ही है कि अब चुनाव में भ्रष्ट आचरण बढ़ा है- हमारा लोकतंत्र केवल उम्र में परिपक्व हो रहा है-आचरण में ‘राजनीति’ इसे भ्रष्ट ही रखने में अपना हित देख रही है। बुर्जुआ लोकतंत्र का सारा दुर्गुण प्रत्यक्ष है- लगता है यह लोकतंत्र सजोरों द्वारा सांठ-गांठ कर निर्बलों पर राज करने का सुनहरा अवसर प्रदान करने वाला बन गया है। चुनाव प्रक्रिया लम्बी हो जाने से और भी कष्ट समा गए हैं। एक तो एक माह पूर्व आचार संहिता लागू कर दी जाती है। यह आचार संहिता क्यों लागू की जानी चाहिए। लोकतंत्र के इतने साल बाद भी क्या हमारे राजनीतिक दल इतने ‘लोकतांत्रिक’ नहीं हो पाए हैं कि वे खुद को एक नियम से संचालित कर सकें सेल्फ रेगुलटरी सिस्टम क्या राजनीतिक दलों ने पैदा नहीं किया, उसका विकास नहीं किया जिसके कारण एक अलग एजेंसी को उन पर अंकुश लगाना पड़ रहा है। अगर हमारे राजनीतिक दल लोकतांत्रिकता में पूर्णत: दीक्षित हों, पूर्णत: समर्पित हों, लोकतंत्र को आत्मसात कर लें, लोकतंत्र को एक कल्चर मान लें तो आयोग जैसी संस्था की इस रूप में जरूरत ही न हो। बहरहाल यह ख्याली पुलाव है। इस तरह की सम्भावनाओं से राजनीति नहीं चलती न यथार्थ बदलता। चुनाव आयोग मतदान व मतगणना ही नहीं कराता। चुनाव आयोग इस समय पूरी तरह ‘सर्वशक्तिमान’ बनकर डिक्टेट करते चलता है। यह हमारे राजनीतिक दलों की करनी का परिणाम है-
जैसी करनी, वैसी भरनी।
लेकिन राजनीतिक दलों की करनी का परिणाम तो जनता को भोगना पड़ रहा है। अब चुनाव में उत्साह नहीं रहा। वह ललक नहीं रही। एक रस्म अदायगी-सी हो गई है कि चलो एक ‘नेग-चार’ निपटा दिया जाए, एक रस्म अदायगी-सा लगता है वोट डालना। और ‘कोई नृप होय, हमें का हानि’ की सामंती सोच जा नहीं रही। आचार संहिता महीना भर चलती है और बड़ी त्रासद स्थिति निर्मित कर देती है। मजेदार बात यह कि इस आचार संहिता का नाम लेकर रोजमर्रा के काम तक कभी-कभी अटका दिए जाते हैं- ये काम नहीं होगा- आचार संहिता लगी है। आचार संहिता सरकार के लिए होती है- राजनीतिक दलों के लिए छूट है। राजनीतिक दल तो चुनाव सभा में ये-ये, ये-ये और ये-ये, मुफ्त बांटने की घोषणा करते चलते हैं। मतदाताओं को रिझाने के लिए लटके-झटके चलाने पर रोक नहीं। साड़ी, कम्बल, रुपया, शराब बांटने पर कानून कार्रवाई लेकिन टी.वी., लैपटाप, सायकल और मोबाईल और न जाने क्या-क्या मुफ्त देने का वायदा करने पर रोक नहीं। अजीब बनाया जा रहा है हमारा लोकतंत्र। राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र में सामाजिक-सामूहिक हित के काम के साथ कुछ उपहार देने की घोषणा करते है। पर प्रलोभन चलेगा। वाह!
चुनाव प्रक्रिया हफ्तों खिंच जाती है। इस दौरान होता क्या है। न्यूज  चैनल्स में केवल बहस। बहस भी तू-तू, मैं-मैं की। 70 साल में कुछ नहीं हुआ के जवाब मांगे जाते हैं और होता यह है कि हर दल को ‘अपने आंख का फोड़ा दिखाई नहीं देता, दूसरे दल की आंख की छोटी सी फुंसी भी दिखाई दे जाती है।’  जिस दल ने पिछले चुनाव में ‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी’ का नारा उछालकर चुनाव जीता वह कामकाज में शून्य रहा लेकिन इस चुनाव के दूसरे दल पर आरोप लगाकर ही आगे निकल जाना चाहता है। न्यूज चैनल्स की बहसें अब उबकाई पैदा करने लगी है। चुनाव प्रक्रिया खत्म होते तक यही चलता है। यह लम्बी अवधि मीडिया को बौना बनाने के काम आ रही है। लगता है चुनाव के अलावा देश में चर्चा के लिए और विषय रहा नहीं। हर जगह केवल राजनीतिक चर्चा-किसी शादी के भोज में जाओ- क्या हो रहा है यूपी में... यहीं से बात शुरू होती है। शमशान तक में चुनाव छाया रहता है। अजीब स्थिति हो जाती है।
क्या चुनाव की अवधि छोटी नहीं की जा सकती। मतलब 10 दिन में चुनाव निपटे और परिणाम आ जाए। माना कि सुरक्षा का सवाल है। लेकिन क्या इसकी व्यवस्था नहीं की जा सकती। पूरा देश लम्बे समय तक केवल चुनाव में उलझा रहे- यह तो सांस्कृतिक क्षरण का लक्षण भी हुआ।  चुनाव आयोग तो खर्च की सीमा बांध देता है और उम्मीदवार इस सीमा का हिसाब भी पेश कर देते हैं। क्या यही सत्य है। हमारा लोकतंत्र क्या इसे ही ‘सत्यमेव जयते’ मान ले रहा है। इतना झूठ और इतना अविश्वास- लेकिन कहा जाए कि लोकतंत्र परिपक्व हुआ है। यह भी एक झूठ है। दरअसल हमारे कुछ राजनीतिक दल सामंतवाद के घोड़े पर चढक़र लोकतंत्र की गद्दी तक जाते हैं। क्या इस स्थिति में महीनों पड़ा रहना कष्ट नहीं देता? यह स्थिति एक तरह से जनता को सजा देना है। चुनाव प्रक्रिया कितनी कम अवधि की हो, इस पर विचार हो- हमारे पास तकनीकी जानकारी व व्यवस्था को रेगुलेट करने वाले विशेषज्ञों की कमी नहीं है- कमी है तो राजनीतिक इच्छाशक्ति की। अत: राजनीतिक इच्छाशक्ति जागे तो चुनाव की यह लम्बी प्रक्रिया छोटी की जा सकती है। राजनीतिक दलों के खर्च की सीमा तय कर दी गई है, आचार संहिता का पालन कराया जा रहा है तो क्या चुनाव की लम्बी अवधि कम करने की दिशा में विचार नहीं किया जा सकता और उसे मूर्तरूप क्यों नहीं दिया जा सकता। एक और बात सरकार पांच साल के लिए चुनकर आती है। लेकिन व्यवहार में चुनी हुई सरकार केवल साढ़े चार साल ही काम कर पाती है- शपथ ग्रहण के बाद दो माह तो कुछ औपचारिकताओं, उत्साह में कटते हैं, फिर अंतिम वर्ष 2 माह के लिए आचार संहिता का बंधन।  सरकार तो होती है लेकिन राजनीतिक गतिविधियां छ: माह से ही ‘चुनाव’ में लीन हो जाती है। इस तरह जनता को तो  पांच साल के लिए नहीं मिलती सरकार। बहरहाल बात यह कि इतनी लम्बी चुनाव प्रक्रिया को कम किस तरह किया जाए उस पर अब गम्भीरता से सोचा जाना चाहिए।  राजनीति में अब ‘उपदेश युग’ खत्म हो और ‘काम का युग’ शुरू हो।
prabhakarchaube@gmail.com


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