सब ठीक है- सब ठीक है

प्रभाकर चौबे: पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं- ऐसी कहावत वर्षों से चली आ रही है। पुरखों ने बनाई है। लगता है किसी काल विशेष में किसी के प्रारम्भिक चाल-चलन को देखकर हमारे पुरखों ने यह कहावत बनाई हो।...

सब ठीक है- सब ठीक है
प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे

पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं- ऐसी कहावत वर्षों से चली आ रही है। पुरखों ने बनाई है। लगता है किसी काल विशेष में किसी  के प्रारम्भिक चाल-चलन को देखकर हमारे पुरखों ने यह कहावत बनाई हो। इस शताब्दी का सन् 2016 बीत गया-2017 लगा। लेकिन पुरानी कहावत इस 2017 के साल के लिए फिट बैठती है- ‘पूत के पांव पालने में पता चल जाते हैं।’ मतलब 2017 कैसा रहेगा, यह जनवरी (कहें 2017 के बाल्यकाल) 1 जनवरी 2017 से ही पता चल गया। दिसम्बर 2016 के अंतिम दिन नोटबंदी की अवधि खत्म हुई।

कहा जाता रहा कि 50 दिन का कष्ट भोग लीजिए, आगे अच्छे ही अच्छे दिन है...। लगे रहो लाईन में। भटको चिल्हर के लिए... और कष्ट सहते 50 दिन बीते। 8 नवम्बर 2016 से दिया जा रहा कष्ट, बताया जाता रहा कि 30 दिसम्बर को छूमंतर हो जाएगा। फिर कहां का दु:ख, कहां का कष्ट। बस मजे ही मजे हैं। जनता कहती लाईन में लगे रहना कष्टप्रद तो है। लेकिन आगे अच्छे दिन हैं। दिन-ब-दिन बैंक के सामने की लाईन बढ़ते ही जा रही थी... उम्मीद पर दुनिया कायम है, सोचकर जनता डटी रही। सरकार रोज कहती बस 50 दिन, 50 दिन की ही तो बात है। फिर लाईन की जरूरत नहीं रहेगी...। सरकार ‘कैशलेस युग’ ला रही है। नोट की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। बस ऊंगली से एक बटन दबाओ, और देखो कि नोट का काम मोबाईल का बटन कर रहा है।

50 दिन बीते, सन् 2016 बीता। 2017 लगा। जनता सुबह उठी- सोचने लगी नया सूरज ऊगा होगा। रुपये-पैसे निकालने का कष्ट गायब हो गया होगा। लेकिन जनवरी में भी नये साल लगने पर भी बैंक के सामने की लाईन खत्म नहीं हो रही...।

दिसम्बर के अंतिम दिनों में सरकार ने घोषणा की कि अब एटीएम से 4500 रुपए निकाल सकते हैं। पहले 2000 रुपए की सीमा थी...। जनता ने सोचा चलो 2017 कुछ तो चला। लेकिन 1 जनवरी को ही एटीएम टें बोल गया- शिकायतें आने लगीं कि एटीएम से 4500 रुपए नहीं निकल रहे...।

एटीएम को अपग्रेड नहीं किया गया है। एटीएम वही पुराने और आदेश नया। एटीएम नया आदेश मानने की स्थिति में नहीं है। जनता में फिर निराशा फैली एटीएम खाली है, या भरे, यह तो पता नहीं, लेकिन एटीएम एक बार में 4500 रुपए नहीं उगल रहे। यह तो ऐसा हो रहा है कि चालीस के दशक की मोटरकार से 2017 में 80 किमी से ऊपर दौड़ लगाने की आशा करें...। पुरानी मशीन पर नया बोझ डालोगे तो यही होगा। जनता फिर ठगी गई...।

इस बार कालाधन बाहर निकालने का नारा उछाला गया और जनता को बैंक की लाईन में लगा दिया गया। कालाधन रखे कोई और, कालाधन से कोई और मजे करे, कालाधन राजनीति को चमकाने के काम आये और लाईन में लगे जनता। कालाधन वाले बैंक क्या किसी भी दफ्तर की लाईन में नहीं लगते। दफ्तर उनके बंगले के सामने लाईन में खड़ा होता है। पूरी व्यवस्था को कालाधन अपने तरीके से संचालित करता है। बड़ा ही गोरखधंधा है।

इस पर काफी बहस हो चुकी कि कालाधन आएगा कि नहीं- आएगा तो कितना आएगा। वैसे ईमानदारी की बात यह कि सरकार कभी भी कालाधन नहीं निकाल सकती- या यह भी कह लें कि नहीं निकालना चाहती। जिस दिन कालाधन को खदेडऩे में भिड़ेगी सरकार, उस दिन उसका पत्ता साफ कर दिया जाएगा। सत्ता भी यह जानती है। लेकिन सत्ता बनी रहे, जनता को समझाया जाता रहे इसलिए सरकार कालाधन, भष्टाचार, बेईमानी आदि-आदि बुराईयों के खिलाफ बोलती रहती है। कितनी सरकारें आईं, कितनी गईं, लेकिन कालाधन अपना विकास करते गया। सरकारें कालाधन की गार्ड का काम भी करने लगती हैं।


कालाधन क्या है, यह सरकार तय करती है। जनता जिसे कालाधन बताये, सरकारें शायद उसे कालाधन न कहें। कहें कि यह तो अपने उद्यम से कमाया गया धन है- और पूछा जाए कि ये उद्यम क्या है, क्या होता है। यह उद्यम कुछ के पास ही केन्द्रित क्यों होता है, पूरे समाज के पास उद्यम क्यों नहीं होता। क्या समाज उद्यमहीन होता है। क्या इस पूरी सामाजिक संरचना में समाज के उद्यम का कोई योगदान नहीं, क्या समाज को कुछ ही लोगों ने बनाया है और उनके ही शक्तिकेन्द्र पर टिका है समाज। व्यवस्था के केन्द्र में कौन हैं, वे शक्ति कहां से पाते हैं। व्यवस्था की परिधि से विशाल समुदाय को क्यों बाहर रखा जाता है- क्या व्यवस्था की परिधि से बाहर रखने वाले केवल दर्शक बनाकर रखे जाएं।

जनता के कष्ट को जनता की सहनशीलता कह दिया जाता है। व्यवस्था के केन्द्र में बैठे लोग कहते हैं कि हमारी जनता बहुत ही सहनशील है। उस की सहनशीलता की तारीफ की जानी चाहिए। जनता के कष्ट को महिमामंडित करने की यह सामंती सोच है। सामंतकाल से ही राजा अपनी प्रजा की सहनशीलता के किस्से गढ़ता। सामंतीकाल में सत्ता केन्द्र के साथ चिपके कुछ विचारक सत्ता को शिक्षा देते कि अपनी प्रजा को अंधकार में, अशिक्षा में रखो। प्रजा जागरूक हो गई, शिक्षित हो गई तो वह सवाल करेगी। सवाल हमेशा से ही सत्ता को विचलित करते रहे हैं, इसलिए आज भी इस लोकतंत्र में सत्ता पर काबिज व उनके समर्थक कहते हंै, सिखाते हैं कि सवाल न करे जनता... जनता देखे। देखे कि सत्ता काम कर रही है। कार्पोरेट के लिए किया जाने वाला काम भी जनता के लिए ही किया जानेवाला काम मान जाए क्योंकि कार्पाेरेट को जो दिया जाएगा, उसका कुछ अंश बहकर जनता तक आएगा।  कार्पोरेट के संसार में एक छोटी पाईप लगाकर रखी गई है जिसमें से बूंद-बूंद लाभ टपकता है और बहकर जनता तक जाता है। जनता उससे अपनी प्यास बुझाए। सामंतीकाल से जिस सहनशीलता की बात पैदा की गई वह आज इस लोकतंत्र में सत्ता के काम आ रही है। सत्ता उन तमाम अस्त्रों को कायम रखती है जो उसके काम के होते हैं।

इस नोटबंदी ने जनता को हलाकान कर दिया। हमारे यहां दुख को कमकर आंकने के लिए कुछ सुक्तियां गढ़ दी गई हैं जो दुर्बलजन को दु:ख सहने की आदत डाल देती है। कहा जाता रहा है, आज भी कहा जाता है कि पिछले जनम का किया अब भोग रहे हैं...। आज अच्छे कर्म करो तो अगला जनम सुधरे। गरीब, मजबूर, परेशानजन यह नहीं समझ पाते पिछले जनम में ऐसा कितना बुरा कर दिया कि यह पूरा जन्म ही कष्टमय हो गया। लेकिन इस जनम में अच्छा करने भिड़ जाते... मतलब व्यवस्था जो कहे वैसा करो, सहनशील बनो। कर्मों का फल तो भोगना ही है।

अपने हाथ में कुछ नहीं है इसलिए इस जन्म में भले काम करो। नोटबंदी से हो रही तकलीफ को पिछले जनम में किये गये किसी गलत काम का नतीजा समझो। ऐसा समझोगे तो तकलीफ हो रही, ऐसा नहीं कहोगे। कहोगे कि पिछले जनम का किया भोग रहे हैं।

अगर सवाल करोगे तो समझो इस जनम में पुन: गलत काम कर रहे हो, इसका अगले जनम में भोगना होगा अत: सवाल ही न करो। नोटबंदी पुण्यकर्म है- यह यज्ञ है। इस यज्ञ का भोग ग्रहण करो... बैंक के सामने लाईन में खड़े होना पुण्यकर्म है। एटीएम केवल 2000 निकाल रहा है तो यह ऊपर वाले की इच्छा है। मानो और बिना नाक-भौं सिकोड़े इसे स्वीकार करो। मानुष जनम मिला है, अगर अभी के व्यवस्था में काम में मीन-मेख निकाला तो अगला जनम पता नहीं किस योनि में जन्म मिले। लिखने वाले ने लिख दिया कि सन् 2016 के आठ नवम्बर से कुछ भौतिक कष्ट उठाना पड़ेगा, इसे हंसते-हंसते उठाना।

जनता ने कष्ट उठाया, उठा रही है। आगे भी उठाने तैयार है। राजनीतिक दल भी अपना-अपना सुधारने में लग गये और जनता के कष्ट में शरीक न होकर दूर से ही मारक मंत्र पढऩे लगे...। गजब की सहनशीलता है- जनता की इसी सहनशीलता का सुफल कुछ राजनीतिक जमकर लाभ उठा रहे हैं। आवाज आती है, मीडिया चिल्लाता है- सब ठीक है, सब ठीक है... जनता देखती है, किधर, कहां, क्या ठीक है। सब ठीक है का मतलब क्या है। मीडिया बोल रहा है तो सब ठीक ही होगा, हम ही गलत हैं। कभी-कभी कमीज उलटी उतर जाती है। सरकार उतारने में भी ऐसा हो जाता है।

prabhakarchaube@gmail.com

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