हमारा गणतंत्र - यह क्या हो रहा है...?

प्रभाकर चौबे देश ने अपना 68वां गणतंत्र दिवस मनाया 68 साल हो गये देश को गणतंत्रात्मक राज्य बने। हमारा देश विविधाओं का समुच्चय है, इसलिए विविधापूर्ण यह देश बहुत ही खूबसूरत है- इसकी तासीर भी खूबसूरत है। ...

प्रभाकर चौबे

प्रभाकर चौबे
देश ने अपना 68वां गणतंत्र दिवस मनाया 68 साल हो गये देश को गणतंत्रात्मक राज्य बने। हमारा देश विविधाओं का समुच्चय है, इसलिए विविधापूर्ण यह देश बहुत ही खूबसूरत है- इसकी तासीर भी खूबसूरत है। देश आ•ााद तो 15 अगस्त 1947 को ही हो गया था। लेकिन वर्तमान युग में केवल आ•ाादी पर्याप्त नहीं है, देश की जनता को अपनी सरकार चुनने का अधिकार मिलना चाहिए अत: हमने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अपनाई। हमारे यहां सामंतवाद के विरुद्ध वैसे कोई संघर्ष नहीं हुआ। हमने अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ संघर्ष किया इसमें सामंतवाद के खिलाफ संघर्ष की कहीं लेशमात्र भी सुगबुगाहट नहीं थी।  आ•ाादी की लड़ाई के समय ही एक तरह से तय-सा था कि भारत लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को स्वीकार करेगा। नये युग की राजनीतिक विचार धारा की नब्ज को पहचानते हुये हमारे नेताओं ने यह बता दिया था कि देश में आ•ाादी के बाद लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली ही स्वीकार की जायेगी। अत: 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू किया गया और भारत एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य के रूप में सामने उभरा। हमारा देश लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली के तहत चल रहा है। लेकिन दिक्कत यह है कि हमारे यहां सामंतवाद के विरुद्ध कोई संघर्ष नहीं किया गया।  इसका परिणाम यह हुआ है कि शासन प्रणाली तो लोकतांत्रिक है, लोकतंत्र की व्यवस्था के अनुरूप है। संविधान भी लोकतंत्र के लिए है, लेकिन सामंती विषाणु हमारे लोकतंत्र में कायम है। इन विषाणुओं को पूरी तरह खत्म करने के लिये जिस तरह के संघर्ष की जरूरत होती है, वैसा कुछ संघर्ष हुआ नहीं। दरअसल हमें ‘सत्ता हस्तांतरण’ के तहत आ•ााद घोषित किया गया। यद्यपि आ•ाादी के लिए 90 वर्षों तक लम्बा संघर्ष किया गया। जनता ने घोर कष्ट सहे- देश को गरीब, भूखा, बीमार रखने का पूरा काम अंग्रेज सरकार करती रही। हमारे यहां सामंत तो नहीं रहे लेकिन सामंतवादी प्रकृति न केवल कायम रही वरन विडम्बना यह कि लोकतंत्र जैसे-जैसे बड़ा होते गया, मतलब आगे चलते गया- शासक वर्ग में सामंती मिजाज, सामंती सोच मजबूत होते गये। हमारे यहां शासन व्यवस्था तो लोकतांत्रिक है, लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है, लेकिन सामंती मानसिकता कायम है। मतलब सामंती सोच, सामंती मानसिकता के रथ में बैठकर लोकतांत्रिक प्रणाली से शासन चलाया जा रहा है। तौरतरीके बदले नहीं। वोट पाने के लिए मतलब वोटर का समर्थन पाने, वोट कब्जियाने के लिये धन बल, बाहुबल और तमाम तिकड़मों का सहारा लिया जाने लगा है। लगता है हमारा लोकतंत्र ‘जुगाड़’ का तंत्र बना दिया गया है। लोकतंत्र एक कल्चर है, एक आचरण है, इसके कहीं दर्शन नहीं होते।
हमारे यहां परिवारवाद की बड़ी चर्चा की जाती है। परिवारवाद को लेकर गांधी-नेहरु परिवार ही निशाने पर रखा जाता है। लेकिन अब तो कुछ और दलों (साम्यवादी दलों को छोडक़र) में परिवारवाद घुस गया है। यह विचारणीय है कि कांग्रेस तो 130 साल पुरानी पार्टी है, उसमें अगर आज नाती-पोते राजनीति में आ गये हैं तो आश्चर्य नहीं लेकिन भाजपा नयी पार्टी है, उसमें भी पिता के साथ पुत्र व नाती ‘टिकिट’ पा रहे हैं। आगे पार्टी पुरानी होते चलेगी तो आगे की पीढिय़ां भी राजनीति में आएंगी। इसमें नाक-भौं क्यों सिकोडऩा- यह तो चलेगा ही। वैसे भी लोकतंत्र में अपना काम चुनने का सबको बराबर का अधिकार है। लेकिन अब तो राजनीति इतनी महंगी कर दी गई है कि  सामान्य आर्थिक स्थिति के व्यक्ति के लिए राजनीति करने की नहीं देखने की चीज है। आमजन राजनीति में नहीं आ सकते- केवल वोटर ही बने रहें। लोकतंत्र को केवल एक ‘शासन प्रणाली’ ही बनाकर रख दिया गया है-चुनाव हों और जो पार्टी ज्यादा होशियारी के साथ वोट प्राप्त कर ले वह राज करें- फिर पांच साल या जरूरत के अनुसाार कभी भी चुनाव हो और पुन: उसी तरीके से वोट प्राप्त कर ले और सरकार बनाकर राज करे। कभी-कभी तो यह लोकतंत्र उकताहट भी पैदा करता है। वैसे संविधान में बोलने, लिखने आदि-आदि की आ•ाादी है, धन कमाने की, गरीब बने रहने की भी, गिडगिड़ाने की, रोने की भी आ•ाादी है। रोइये, रोते रहिये, कोई न तो रोकेगा न रोने की सजा मिलेगी- रोने की आ•ाादी है, जी भर कर रोइए- चौराहे पर खड़े होकर रोइए... लेकिन रोना ही न पड़े, यह व्यवस्था नहीं की जा सकती। जनता थक-हार कर कहती है- ‘कहां जाई, का करी...’ मतलब पस्त हो जाती है जनता। कोई सुनने वाला नहीं। सजोरो के खिलाफ गवाह नहीं मिलते तो सजोर बाइज्जत छूट जाता है। अजीब विडम्बना है- सामंतीकाल में जैसे किसी को सात खून माफ का वरदान दिया जा सकता था तो इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में धन बल से हर तरह का वरदान प्राप्त हो जाता है। देश छोड़ कर भाग जाने तक का वरदान मिल जाता है। चिंतक, दार्शनिक विचारक कहते रहे हैं, कहते भी हैं कि लोकतंत्र और गरीबी एक साथ नहीं रह सकते। लोकतंत्र बचाना है तो गरीबी दूर करनी होगी। लेकिन देश में तो लोकतंत्र और गरीबी एक साथ झूला झूल रहे। लगता है लोकतंत्र कायम रहे इसलिये गरीबी को कायम रखा जाना जरूरी है। गरीब न हों तो कुछ तो चुनाव ही न जीतें, हार जायें। इसलिये बड़े ताकतवर यह चाहते हैं कि गरीबी रहे, गरीब रहें और उनकी तरक्की की बात कर गरीब के वोट लिये जायें, और गरीब अपनी तरक्की की घोषणा सुनकर जल्दी झांसे में आ जाते हैं। हर चुनाव में गरीबों की बात कर वोट बटोरे जा रहे हैं। गरीब केवल मन मसोसकर रह जाते हैं। गरीब आदमी देखते हैं कि उनके प्रतिनिधि शानदार जिंदगी जी रहे और गरीब के कल्याण के लिये काम करने की शपथ ले रहे। गरीब व्यथित होकर बोल उठता है-
अपन खाथे गूदा-गूदा
हमला देथे फोकला...।
मतलब प्रतिनिधि खुद तो माल खा रहा और वोटर को फोकला (छिलका) दे रहा।  वायदों को वायदे ही रहने दो इसी में उनकी खूबसूरती कायम रहती है और लोकतंत्र समृद्ध होता है। अगर 1952 (प्रथम चुनाव) से लेकर आज तक के राजनीतिक वायदों का कोई पुस्तक तैयार हो तो वायदों का महाग्रंथ तैयार हो जायेगा और इसे संसद के गेट पर लगा दिया जाये तो जनता इस महागं्रथ के दर्शन कर उसकी पूजा-अर्चना करने लगेगी, धूप-दीप, फूल-बत्ती और कुछ चढ़ोत्री भी चढ़ाने लगेगी। यह वायदों का महाग्रंथ हमारे लोकतंत्र की उपलब्धि के रूप में दर्ज हो जायेगा। गजब का हमारा लोकतंत्र है- नाम लोकतंत्र, काम सामंततंत्र की तरह। सत्ता के इर्द-गिर्द जो कुछ भी है वह अपनी सोच में एक सामंत है। बड़ा कठिन समय आ गया है।  अब  सत्ता पर काबिज दल, व्यवस्था के मालिकों को अपने अलग सिपाही होने लगे हैं। पुलिस उनके अधीन काम करने विवश कर दी गई है। यह समय बड़ा  डरावना समय है- पुलिस को, कानून को सुला दिया गया है, और नई शक्तियां उभर कर सामने आ गई है जो पुलिस और कानून एक साथ है।  संविधान के सामने ही संकट खड़ा कर दिया जा रहा है। आज तो संविधान बचाने की जरूरत है, अगर संविधान ही तोड़-मरोड़ा गया तो लोकतंत्र कहां से बचेगा। इसलिये आज संविधान की पहरेदारी की जरूरत है। कुछ जनविरोधी ताकतों का लक्ष्य संविधान को बदलना है अत: इस 68 वें गणतंत्र दिवस पर मंथन इस बात पर हो कि संविधान की रक्षा करने क्या करना है... हमारी आकांक्षाओं को स्वर देने वाले जितने प्रावधान हैं, उन पर ही अपरोक्ष रूप से हमला किया जाने लगा है और एक ऐसी स्थिति पा लेने की हड़बड़ी है कि संविधान के ऐसे प्रावधानों की छुट्टी कर दी जाये, काट-पीटकर उन्हें अपठनीय बना दिया जाये। हमारा यह 68वां गणतंत्र दिवस कुछ संकल्प लेने का आह्वान कर रहा है।
हमारा गणतंत्र यह लोकतांत्रिक व्यवस्था जिसे हर्ष-उत्साह-विश्वास-गौरव के साथ-साथ जन ने गण ने स्वीकार किया, वह किस तरह गंदली की जा रही है...
prabhakarchaube@gmail.comÐ


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