बिहार में अनैतिकता का खुला खेल

नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिया और पर्दे के पीछे किए गए षडय़ंत्र के चलते फिर से मुख्यमंत्री बन गए...

बिहार में अनैतिकता का खुला खेल
Nitish Kumar
एल.एस. हरदेनिया

नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिया और पर्दे के पीछे किए गए षडय़ंत्र के चलते फिर से मुख्यमंत्री बन गए। जब उन्होंने इस्तीफा दिया उस समय वे महागठबंधन के मुख्यमंत्री थे और इस महागठबंधन को बनाने में सबसे प्रमुख भूमिका स्वयं नीतीश कुमार की थी। महागठबंधन बनाने की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए नीतीश कुमार ने बार-बार कहा था कि वे भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार की राजनीति से हमेशा के लिए संबंध-विच्छेद कर रहे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने अनेक बार कहा था कि यदि बिहार में भारतीय जनता पार्टी की विजय होती है तो पाकिस्तान में खुशी मनाई जाएगी, फटाके फोड़े जाएंगे और दिए जलाए जाएंगे।

पिछले दो-तीन दिनों से बिहार में जो कुछ हुआ है वह अनैतिकता और अवसरवादिता का नंगा नाच है। सच पूछा जाए तो बिहार में संसदीय प्रजातंत्र की मूल आत्मा की सामूहिक हत्या की गई। इस सामूहिक हत्या के तीन मुख्य अपराधी हैं-नीतीश कुमार, लालू यादव और भारतीय जनता पार्टी के सुशील मोदी। पिछले तीन दिनों में इन तीनों नेताओं ने जो कुछ किया उसे जानकर और सुनकर उन लोगों का सिर शर्म से झुक गया है, जो राजनीति में नैतिकता के समर्थक हैं।

नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिया और पर्दे के पीछे किए गए षडय़ंत्र के चलते फिर से मुख्यमंत्री बन गए। जब उन्होंने इस्तीफा दिया उस समय वे महागठबंधन के मुख्यमंत्री थे और इस महागठबंधन को बनाने में सबसे प्रमुख भूमिका स्वयं नीतीश कुमार की थी। महागठबंधन बनाने की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए नीतीश कुमार ने बार-बार कहा था कि वे भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार की राजनीति से हमेशा के लिए संबंध-विच्छेद कर रहे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने अनेक बार कहा था कि यदि बिहार में भारतीय जनता पार्टी की विजय होती है तो पाकिस्तान में खुशी मनाई जाएगी, फटाके फोड़े जाएंगे और दिए जलाए जाएंगे। अब फिर से भाजपा बिहार में सत्ता में आ गई है। फिर शायद अमित शाह को यह खबर मिलेगी कि पाकिस्तान में इस घटना के चलते शोक का वातावरण बन गया है।

राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि पिछले चार माह से इस षडय़ंत्र की तैयारी प्रारंभ हो गई थी। मेरी राय में इस षडय़ंत्र की तैयारी उस दिन से प्रारंभ हो गई थी जब नीतीश कुमार ने नोटबंदी का समर्थन किया था। फिर उस षडय़ंत्र ने व्यवस्थित रूप उस समय ले लिया जब भाजपा के राष्ट्रपति के उम्मीदवार को नीतीश कुमार ने अपना समर्थन घोषित कर दिया था और बाद में भाजपा उम्मीदवार के राष्ट्रपति पद के नामांकन भरने के समय उन्होंने अपनी उपस्थिति भी दर्ज करवाई थी। इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि त्यागपत्र देने के पूर्व सब कुछ तय हो चुका था। जैसे यह तय हो चुका होगा कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे, उसके तुरंत बाद भाजपा ने उन्हें अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी। चूंकि बिहार में इस समय फुलटाईम राज्यपाल नहीं है और बिहार के राज्यपाल का उत्तरदायित्व बंगाल के राज्यपाल को सौंपा गया है। इसी षडय़ंत्र के चलते बंगाल के राज्यपाल को पटना बुला लिया गया था ताकि संवैधानिक औपचारिकताओं को पूर्ण करने में किसी प्रकार की देरी न हो।

नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने वाले हैं यह बात लालू यादव को भी पता लग गई थी। 'टाईम्स ऑफ इंडिया’ में छपी खबर के अनुसार इसी बीच लालू यादव ने भाजपा को यह संदेश भेजा कि यदि उसका नेतृत्व बिहार में सरकार बनाने को तैयार है तो मेरा दल उन्हें समर्थन देगा। परंतु लालू यादव ने इस समर्थन की कीमत भी तय कर दी थी और वह यह कि केन्द्रीय सरकार मेरे विरुद्ध प्रारंभ की गई सभी कानूनी कार्रवाईयों को ढीला कर देगी। इस खबर की सत्यता कितनी है कहना मुश्किल है परंतु यदि यह सच है तो इससे यह कहने को मजबूर होना पड़ेगा कि लालू यादव का भाजपा और संघ विरोध सिर्फ सतही है। वैसे अभी तक लालू यादव ने भाजपा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया है। वे लालू यादव ही थे जिन्होंने लालकृष्ण आडवानी की रथ यात्रा बिहार में पहुंचते ही आडवानी को गिरफ्तार कर लिया था और अन्य घटनाक्रम में लालू यादव ने विश्व हिन्दू परिषद के नेता डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा को पटना आगमन पर हवाई जहाज से भी नहीं उतरने दिया था और उनकी दिल्ली वापस जाने की टिकट उन्हें उस समय सौंप दी गई थी जब वे हवाई जहाज में ही बैठे हुए थे। इसलिए विश्वास नहीं होता कि लालू यादव ने भाजपा के सामने अपना सिर झुकाने का प्रयास किया हो। परंतु आज यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सत्ता में राजनीतिक नैतिकता पूरी तरह से समाप्त हो गई है।


जो कुछ बिहार में हुआ है उसे दलबदल की श्रेणी में रखा जा सकता है। दलबदल कर सत्ता हथियाना सच पूछा जाए तो संसदीय लोकतंत्र की हत्या के समान है। प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रामचन्द्र गुहा ने 'टाईम्स ऑफ इंडिया’ को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा कि यदि नीतीश कुमार को महागठबंधन से संबंध-विच्छेद करना था तो उन्हें राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का परामर्श देना था और नए चुनाव का रास्ता प्रशस्त करना था। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तरह के सामूहिक दलबदली पर नियंत्रण लगाने का एकमात्र उपाय यही है कि यदि सत्ता हथियाने की खातिर दलबदल किया जाता है तो उस स्थिति में जो दलबदल करते हैं उन्हें मतदाताओं के बीच जाकर अपने निर्णय की सहमति लेना चाहिए और यदि दलबदल से चुनी हुई सरकार के हाथ से सत्ता छीनने की संभावना बढ़ती है तो उस स्थिति में मध्यावर्ती चुनाव ही एकमात्र संवैधानिक उपाय होना चाहिए।

वर्ष 1967 में मध्यप्रदेश समेत कुछ राज्यों में सामूहिक दलबदल किया गया था। इससे मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तरप्रदेश की चुनी हुई सरकारों का तख्ता पलट गया था। उस समय इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं। मध्यप्रदेश में तो 36 विधायकों ने कांग्रेस से त्यागपत्र देकर तत्कालीन जनसंघ और राजमाता विजयाराजे सिंधिया से हाथ मिलाकर संविद का गठन किया था और मिश्र जी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को अपदस्थ कर सत्ता संभाली थी।

36 विधायक कांग्रेस छोड़ने वाले हैं यह बात राजनीतिक गलियारों में फैल चुकी थी। उसी बीच मिश्र जी ने यह मांग की कि उन्हें विधानसभा भंग करने की सिफारिश करने के लिए अधिकृत किया गया है। परंतु यह अधिकार मिश्रजी को नहीं दिया गया। मिश्रजी का तर्क था कि जिस घोषणापत्र और जिन राजनीतिक आश्वासनों को देकर जो चुने जाते हैं यदि वे उन्हें त्याग कर ऐसे दल के साथ हाथ मिला लेते हैं जिनके घोषणापत्रों और आश्वासनों से उनका कोई लेना-देना नहीं था तो ऐसे लोगों को दलबदल के द्वारा पाई गई सत्ता का उपभोग नहीं करने देना चाहिए। परंतु मिश्रजी को ये अधिकार नहीं दिया गया। उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं और उन्होंने शायद मिश्र जी के प्रति अपने वैयक्तिक द्वेष के कारण शायद ऐसी सलाह नहीं दी। यहां स्मरणीय है कि प्रथम चुनाव के पूर्व मिश्रजी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की आलोचना करते हुए कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया था।

उस समय यह अफवाह थी कि मिश्रजी का त्यागपत्र नेहरू विरोधी षडय़ंत्र का प्रारंभिक हिस्सा था। परंतु मिश्र जी के बाद किसी और बड़े नेता ने कांग्रेस से इस्तीफा नहीं दिया। मिश्र जी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा और वर्ष 1950 से लेकर 1962 तक उन्हें कांग्रेस में प्रवेश नहीं दिया गया। परंतु 1963 में उन्हें प्रवेश मिला और रायपुर के कसडोल नामक क्षेत्र से वे विधानसभा के लिए चुने गए और मुख्यमंत्री बने। 1967 में उन्होंने फिर मुख्यमंत्री का पद संभाला परंतु चंद महीनों के बाद ही उनके खिलाफ कांग्रेस में विद्रोह हुआ और 36 विधायकों ने कांग्रेस से त्यागपत्र देकर उनकी सरकार का तख्ता पलटने का रास्ता प्रशस्त किया।

उनके अपदस्थ होने के कुछ दिन बाद हाईकोर्ट ने उन्हें अगले छह वर्ष के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। परंतु जिन भी कारणों से इंदिरा गांधी ने उन्हें विधानसभा भंग करने का परामर्श देने से रोका था, इस वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता कि यदि उस समय मध्यप्रदेश विधानसभा भंग कर दी जाती और यह परंपरा बन जाती कि जब भी इस तरह का दलबदल हो या तो संबंधित विधायक को पुन: जनता के बीच में जाना चाहिए और यदि दलबदल इतने बड़े पैमाने पर हुआ है जिससे सत्ता परिवर्तन हो गया है उस स्थिति में मध्यावर्ती चुनाव करवाने चाहिए। यदि ऐसी परंपरा बन जाती तो यह संक्रामक रोग सदा के लिए समाप्त हो जाता और बिहार में चंद घंटों के अंतराल में नीतीश कुमार एक राजनीतिक प्लेटफार्म को त्याग कर दूसरे प्लेटफार्म से पुन: मुख्यमंत्री नहीं बन पाते।

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