आखिर कहां से आ रहे हैं ये नोट?

शीतला सिंह एक ओर वित्तमंत्री अरुण जेटली कह रहे हैं कि एक हजार और पांच सौ के अवैध करार हर 16 नोटों में से 13 बैंकों में जमा हो चुके हैं और दूसरी ओर यह स्पष्ट घोषणा भी कर रहे हैं कि अब उनके बराबर नये नो...

शीतला सिंह
आखिर कहां से आ रहे हैं ये नोट?
Notebandi (File Photo)
शीतला सिंह

शीतला सिंह

एक ओर वित्तमंत्री अरुण जेटली कह रहे हैं कि एक हजार और पांच सौ के अवैध करार हर 16 नोटों में से 13 बैंकों में जमा हो चुके हैं और दूसरी ओर यह स्पष्ट घोषणा भी कर रहे हैं कि अब उनके बराबर नये नोट नहीं छापे जायेंगे। यानी नकदी का संकट कम करने के लिए नोटों की जिस अबाधित छपाई का दावा किया जा रहा है, वह किसी भी हालत में पुरानी मात्रा या संख्या तक नहीं पहुंचेगी।

फि लहाल, भारतीय रिजर्व बैंक कितने नोट छापे, इस सम्बन्ध में उसके स्थापित-प्रचलित सिद्धान्त हैं। राज्य को उनसे अधिक की आवश्यकता होती है तो वह एक रुपये के नोट और सिक्के प्रसारित करता है। लेकिन उनके साथ सम्बन्धित धनराशि के भुगतान का आश्वासन नहीं देता यानी उसके नोट प्रोनोट के रूप में स्वीकार नहीं किये जा सकते। लेकिन दो रुपये से लेकर इस साल दो हजार तक के जो नोट प्रचलन में लाये जा रहे हैं, उन पर रिजर्व बैंक का गवर्नर अपने हस्ताक्षर से भुगतान की गारंटी देता है।

देश में मुद्रा का कितना प्रसार हो और वह कहीं इतना ज्यादा या कम न हो जाये कि अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होने लग जाये, यह रिजर्व बैंक के परामर्श और सरकार की शक्ति  के आधार पर निर्धारित होता है। बाजार में नोटों का ज्यादा प्रसार हो जाये तो उनकी कीमत स्वत: कम हो जाती है। यह स्थिति महंगाई को तो बढ़ावा देती ही है, आर्थिक संकट को भी इंगित करती है। इस दृष्टि से देखें तो अब भारतीय रुपये की अन्तरराष्ट्रीय मान्यता है। पहले उसका प्रचलन देश में ही था और वैश्विक क्षेत्र में डालर व पौण्ड ही वह मुद्राएं थीं, जिनके बल पर सारी आवश्यक वस्तुएं हथियारों से लेकर दवाओं एवं अन्य उपभोक्ता वस्तुओं तक सारी आवश्यकताएं पूरी की जाती थीं।

किसी देशवासी को बाहर जाना होता था तो वह रिजर्व बैंक से अनुरोध करता था कि उसे अमुक कार्य के लिए इतनी संख्या में डालर खरीदने की अनुमति दी जाए। पर्यटकों के लिए अनुमति की यह सीमा 500 डालर तक थी और इससे अधिक की आवश्यकता की पूर्ति अपने विदेशवासी परिजनों, मित्रों व अन्य संबंधियों से करनी पड़ती थी।

इसी को लेकर ‘हवाला कारोबार’ भी शुरू हुआ था। इसके कारोबारी आप उन्हें देश में जितने रुपये देते, विदेश में निर्धारित ठिकाने से उसी अनुपात में वहां की विदेशी मुद्रा आपको उपलब्ध करा देतेे। अलबत्ता, इसे गैरकानूनी माना जाता था और रोकने के उपाय भी किये जाते थे।

यहां वित्तमंत्री की घोषणाओं का हवाला वर्तमान वास्तविक स्थिति को प्रस्तुत करने के लिए है, जिसमें एक ओर तो नोटों की उपलब्धता कम होने के कारण बैंकों से अपने खातों से भी निर्धारित मात्रा में ही धन निकालने की अनुमति है और एटीएम से भी दो हजार से अधिक की धनराशि नहीं निकाली जा सकती। इसका सर्वाधिक प्रभाव छोटे लोगों के काम-धंधों और व्यवसायों पर पड़ रहा है। हां, इससे सबसे बड़ी संख्या में पीडि़त वे किसान हैं, पुराने नोट रद्द होने के कारण जिन्हें बुआई के इस मौसम में खाद-बीज भी नहीं मिल पा रहे। इस कारण कई बाजारों में ‘अदला-बदली’ की लगभग बंद हो चुुकी पुरानी व्यवस्था फिर अपनाई जा रही है, जिसका सबसे अधिक लाभ मध्यम वर्ग उठा रहा है, क्योंकि वह अपने हिसाब से बदलाव व मूल्यनिर्धारण में सक्षम है। वह औद्योगिक उत्पादों को अपेक्षाकृत ज्यादा मूल्य पर देकर किसानों की जिंसें कम मूल्य में ले रहा है।


लोगों की अब तक की मान्यताओं के अनुसार, सरकार की व्यवस्था में सबसे ईमानदार बैंक और डाकघर ही थे। लोग इनकी ईमानदारी पर विश्वास भी करते थे। लेकिन अब नियंत्रण और सीमाबद्धता के बावजूद करोड़ों-करोड़ रुपये के नये नोटों की विभिन्न व्यक्तियों और स्थानों से बरामदगी राज्य की नीतियों की असफलता की परिचायक है या ऐसी दोषपूर्ण प्रणाली ही विकसित कर ली गई व नये ढंग से अमल में लाई जा रही है, जिस पर  कार्रवाई का दावा करने वाले राज्य के पास इसका जवाब नहीं है ये नोट किस प्रकार अनुचित हाथों में पहुंचे?

फिलहाल, बैंकों व डाकघरों की व्यवस्थाएं निर्धारित हैं। किसी व्यक्ति को अपने खाते से धन निकालना हो तो बैंक हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान सम्बद्ध व्यक्ति के ही हैं, इससे संतुष्ट होने पर ही भुगतान की प्रक्रिया शुरू करता है। इस प्रकार, बंद पुराने नोट अब केवल खाते में जमा हो सकते हैं और वे ढाई लाख से ऊपर के हैं तो कब, कैसे और कहां से आये? इसकी जवाबदेही जमा करने वाले पर है। ये नोट 10 लाख से अधिक के हुए, तो आयकर विवरणी दाखिल करने के पहले ही जांच प्रक्रिया का सामना करना पड़ रहा है। सरकार का दावा है कि वह निरंतर छापेमारी कर रही है और कौन से लोग इस सीमा में आते हैं, इसकी सूची भी बन चुकी है।

लेकिन जहां तक नोटों का सम्बन्ध है, सब रिजर्व बैंक के हैं जो वितरण हेतु बैंकों व सरकारी खजानों को दिये जाते हैं। इन बैंकों को लाइसेंस भी रिजर्व बैंक ही देता है। वही उनकी संचालन पद्धति भी निर्धारित करता है। सरकार सर्वथा समर्थ मानी जाती है इसलिए उसने बैंकों से धन निकालने की सीमा निर्धारित कर दी है, जिसके अनुसार बैंक में आपके अरबों रुपये जमा हों, तो भी आप हर हफ्ते 24 हजार से अधिक नहीं निकाल पायेंगे। हां, आप व्यापारी के रूप में चालू खाते के संचालक हैं तो यह सीमा 50 हजार तक हो सकती है।

नोटबन्दी की घोषणा 8 नवम्बर को की गई, जिसके अगले दिन बैंकों में अवकाश और उसके अगले दिन से नोटों के विनिमय की घोषणा की गई थी। रुपये निकालने की सीमा तय करने के पीछे सारे खातेधारकों को निर्धारित न्यूनतम धनराशि मिल सकने का तर्क दिया गया था, लेकिन तब इसे अन्तरराष्ट्रीय नियमों और रिजर्व बैंक कानून की धारा-26 (2) का उल्लंघन भी बताया गया था। प्रतिबन्धों के परिणामस्वरूप देश भर में बैंक खाताधारक और पुराने के बदले नये नोट लेने वाले सडक़ों पर पहुंच गये, लम्बी कतारें लगने लगीं, व्यवस्था के लिए सुरक्षाबल भी लगाने पड़े। सवाल है कि ऐसे में वह कौन-सी विधि थी, जिससे कुछ लोगों के पास करोड़ों के नये नोट अनुचित ढंग से पहुंच गये? आखिरकार असीमित नोट निकालने की छूट तो उन्हें भी नहीं थी।

ऐसे में सवाल है कि क्या व्यवस्था दोषपूर्ण होने के कारण बैंककर्मी भ्रष्ट हो गये हैं और अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर कुछ लोगों को निर्धारित सीमा से अधिक भुगतान कर रहे हैं? यदि हां, तो इस नियम व्यतिक्रम का अधिकार उन्हें कैसे प्राप्त हुआ? यदि सारे बैंक नियमों से बंधे हैं तो क्या नोटप्राप्ति की कोई समानान्तर व्यवस्था भी है? चूंकि सारे नोट रिजर्व बैंक के हैं और बैंकों के माध्यम से ही वितरित हो रहे हैं, इसलिए ऐसे में कुछ लोगों को यह भय सताने लगता है कि कहीं इनके प्रचलन का ढर्रा किन्हीं समर्थ नेताओं के कारण परिवर्तित तो नहीं हो रहा?

व्यवस्थाजन्य दोषों के बगैर ऐसा संभव नहीं है और ये दोष व्यवस्था से जनता का विश्वास उठा सकते हैं। इससे जन्मी अव्यवस्था कानून व्यवस्था को समाप्त कर देने वाली अराजकता को जन्म दे सकती है।  रिजर्व बैंक समेत कई बैंकों के अधिकारियों की धर-पकड़ के बावजूद नये नोट जिस तरह देश के विभिन्न भागों में बड़ी संख्या व मात्रा में मिल रहे हैं, उससे जनता में अविश्वास की भावना बढ़ ही रही है। यह स्थिति तुरन्त समाप्त होनी चाहिए, वरना लोग इसके लिए राज्य को ही उत्तरदारी मानेंगे।

इससे जुड़े रहस्यों का पर्दाफाश भी जरूरी है, जिससे नीतियों के प्रति लोगों का विश्वास बना रहे। जनता ने अराजकता व अव्यवस्था से बचाव के लिए ही राज्य नामक संस्था की रचना कर उसे निरंकुश अधिकार दिये हैं, जिससे वह निर्बाध रूप से अपने दायित्व का संचालन कर सके।

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

शीतला सिंह के आलेख

क्या महिलाओं को शांति से जीने का अधिकार नहीं है