अब तो व्याकुलता दिखाएं

नोटबंदी की चोट अब नासूर बन चुकी है, स्वच्छ भारत हमें बहरा बनाने को आतुर है और साल की आखिरी रात बैंगलोर की सडक़ों पर जो नंगा नाच हुआ है वह हमारे भविष्य को पूरी निर्ममता से समझा गया है। ...

अब तो व्याकुलता दिखाएं
चिन्मय मिश्र

चिन्मय मिश्र

तत: किम्? तत: किम्? तत: किम्?
उसके बाद क्या? उसके बाद क्या? उसके बाद क्या?

नोटबंदी की चोट अब नासूर बन चुकी है, स्वच्छ भारत हमें बहरा बनाने को आतुर है और साल की आखिरी रात बैंगलोर की सडक़ों पर जो नंगा नाच हुआ है वह हमारे भविष्य को पूरी निर्ममता से समझा गया है। नोटबंदी से सीधे मरने वालों की संख्या सैकड़ा पार कर गई और अप्रत्यक्ष मौतों की बेहिसाब गिनती कर पाना ही नामुमकिन है। शासक वर्ग दंभ भर रहा है कि नोटबंदी को लेकर कहीं से कोई विद्रोह या असंतोष की आंधी नहीं आई है। जाहिर है जब संवेदनाएं ही मर जाएं तो फिर कहीं कुछ भी हो न•ार थोड़ी आएगा। नोटबंदी से तड़पते लोगों पर सरकार ने मरहम नहीं लगाया और बैंगलोर में महिलाओं से हो रही बदसलूकी को बाजार में मौजूद तमाशबीन देखते रहे। स्वच्छ भारत की आड़ लेकर शहरों में हजारों-लाखों झुग्गी, झोपडिय़ां व कच्चे मकान तोड़ दिए गए। खुले में शौच रहित यानी ओडीएफ लागू करवाने की जिद ने कई वंचितों को मजबूर किया कि वे अपना मल अपने पहने हुए कपड़ों को उतारकर उनसे उठाएं। किसी भी देश में इतनी निर्ममता से गरीबों का तिरस्कार शायद ही किया गया हो। हम आपातकाल में नसबंदी को याद करते हैं लेकिन इस नोटबंदी और स्वच्छ भारत ने तो भारतीय समाज की आत्मा को ही खंडित करने का बीड़ा उठा लिया है।
शंकर गुहा नियोगी ने लिखा था,

‘आपातकाल: इतिहास का काला पन्ना, आपातकाल: मटियामेट कर दिए जिसने करोड़ों परिवारों के स्वप्न, आपातकाल: मजदूरों के मुंह पर ताला, आपातकाल: पूंजीपति मालिकों के लिए सौभाग्य माला, आपातकाल: नंगा कर दिया जिसमें हततेज विरोधी दलों का चेहरा, आपातकाल: भ्रष्टाचारियों का संरक्षक।’ नोटबंदी और स्वच्छता अभियान के बाद ‘क्या?’ यह सोचकर ही घबड़ाहट हो रही है। सरकारों की स्थिति उस घायल शेर जैसी होती जा रही है जो अपनी हर असफलता के बाद दुगुनी आक्रामकता के साथ आम आदमी से पेश आती हैं। सवाल फिर सामने है, हममें व्याकुलता क्यों नहीं झलकती? हमारा असंतोष क्यों नहीं फूट रहा? नियोगी ने कहा भी था, ‘रो माँ रो/नहीं तो तेरे बच्चे का दर्द/मेरे देशवासियों के सीने में/बैठ जाएगा!’ लोग रो रहे हैं, परंतु रुदन बाहर नहीं आने दे रहे हैं और आंसुओं को अंदर ही अंदर पी गए हैं। अपने एक दर्जी मित्र के यहां कुरते का नाप देते-देते जब वहां खड़े एक वृद्ध कारीगर से पूछा, दादा, ‘नोटबंदी?... बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि वह बोले, ‘हमें बेवकूफ  समझ रखा है, चुनाव आने दो नामोनिशान मिटा देंगे।’ पता नहीं ऐसा होगा या नहीं, परंतु सारे भारत में अंदरूनी तौर पर गुस्सा भरा पड़ा है लेकिन बाहर नहीं आ पा रहा। क्यों? शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा था, ‘कटघरे में खड़े कर दिए जाएंगे/ जो विरोध में बोलेंगे/जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएंगे।’ क्या यही नए भारत का सूत्र वाक्य बनेगा?

नोटबंदी की वास्ताविक परिणति को प्रधानमंत्री भी जनता तक पहुंचाने में डर गए। देश का सर्वोच्च पदाधिकारी ही यदि सच्चाई स्वीकारने में हिचकेगा तो आम जनता से क्या उम्मीद रखी जा सकती है? वैसे वह तो अपने विश्वास को इस तरह टूटते देखने की अभ्यस्त हो चली है। संकट सिर्फ इतना है कि इसके बावजूद वह लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धान्तों का अक्षरश: अनुपालन करती है।  

स्वच्छता अभियान के पोस्टरों ने सारा शहर अस्वच्छ बना दिया है। स्वच्छता का आर्तनाद करतीं कचड़ा गाडिय़ां न दिन में चैन लेने देतीं हैं और न रात में सोने देती हैं। स्वच्छता अभियान का पूरा दारोमदार सिर्फ कचड़ा उठाने वाले चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पर डाल दिया गया है। यह ठीक वैसा ही हो रहा है जैसे कि भारतीयों के स्वास्थ्य के साथ हुआ। भारत की सरकारों ने नागरिकों के स्वास्थ्य की पूरी जिम्मेदारी आशा कार्यकर्ता पर डाल दी और स्वयं भ्रमण पर निकल गए। स्वच्छ शहर को लेकर प्रतियोगिताएं हो रहीं हैं। और तो और कलेक्टर भी अब कानून व्यवस्था न देखकर अलसुबह मुंह अंधेरे इस बात का निरीक्षण करने निकल पड़ते हैं कि कहीं कोई खुले में शौच तो नहीं कर रहा। शहरों के हर चौराहे, नुक्कड़ पर अब शौचालय के बोर्ड लगे हैं। वजह यही है कि स्मार्ट शहर के नाम पर ध्वस्त किए जा रहे विरासत स्थलों से नागरिकों का ध्यान कैसे बंटाया जाए! याद रखिए, भारत में अब समृद्धि और विकास तो शौचालयों के  माध्यम से ही आएगा।


गौर करिए, नोटबंदी के बाद आतंकवाद पर लगाम, सत्यवचन। नोटबंदी के बाद माओवाद पर कहर, सत्यवचन। नोटबंदी से कालाधन रखने वालों में खलबली, सत्यवचन। परंतु नोटबंदी बाद यह कोई सत्ताधीश नहीं बता रहा कि नोटबंदी से कितने लोगों का रोजगार छीना? नोटबंदी से कितने लोगों को अपना उपचार कराने में नाकामी हासिल हुई? नोटबंदी से कितने किसानों को हानि उठानी पड़ी? नोटबंदी के बाद नए नोट छापने पर कितना खर्च हुआ? नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था में कितनी मंदी आई? नोटबंदी के बाद कितने लोगों ने (इसी कारण से)आत्महत्या की? नोटबंदी के बाद नकली नोट छपने इतने जल्दी कैसे शुरू हो गए? नोटबंदी ने अनेक बैंककर्मियों को भ्रष्ट कैसे बना दिया? और भी लंबी फेहरिस्त बनाई जा सकती है। एक ठीक-ठाक गति से चलते हुए देश को अचानक ‘स्टाप’ कहकर जिस मुद्रा में था वहीं पर ‘स्थिर’ कर दिया गया। और वह तभी से उसी मुद्रा में जड़ खड़ा है। मांगे गये 50 दिन भी बीत गए और न अच्छ्रे दिन आए न एटीएम में नोट। परंतु हेकड़ी कायम है। शिवमंगल सिंह सुमन ने कहा है, ‘लाचारी है आखिर मैंने ऐसे युग में जन्म लिया है/जहां सभी ने लब्ध सुधा को छोडक़र गरल का पान किया है।’ हर ओर अजीब सी नीरवता छाई हुई है। व्याकुलता अपने चरम पर होते हुए भी अभिव्यक्त नहीं हो पा रही है। किसी सुनहरे भविष्य की आस में हम रेगिस्तान में चमकती धूप को पानी समझते हुए लगातार उस ओर बढ़ते चले जा रहे हैं। दूर-दूर तक कहीं नखलिस्तान का आभास ही नहीं हैं। अब तो आसमान भी जहरीला है। जिसमें परिंदे भी गिने-चुने नज़र आते हैं।

इधर एक और नया साल आ गया है। इस साल बजट भी एक महीने पहले आ जाएगा। तत: किम् की शृृंखला हमारे सामने है। इस बीच सारा देश जैसे किसी प्रहसन के मंच में बदल गया है।  यह ऐसा प्रहसन है जिसकी कोई तयशुदा विषयवस्तु या स्क्रिप्ट नहीं है। पात्र भी अपने ही हिसाब से अपनी भूमिका चुन लेते हैं और गुणगान में जुट जाते हैं। निर्देशक चुप है। वह भी प्रहसन की विषयवस्तु समझाने के अलावा हर एक विषय में हस्तक्षेप करता है। बजट के आने के बाद सारा ध्यान उसके गुण-दोष पर लग जाएगा और नोटबंदी और स्वच्छ भारत से उपजी त्रासदियां शायद पृष्ठभूमि में चली जाएंगी। तत: किम्? मार्च से अगले मानसून की भविष्यवाणियों के विश्लेषण  और रबी की फ सल पर दावे-प्रतिदावे करने में जुट जाएंगे। स्थितियां अंतत: पुन: कदमताल करती ही नजर आएंगी। बहुत पहले बाबा नागार्जुन ने चेताया था,

‘सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक।
जहां तहां दगने लगी, शासन की बंदूक।।
जली ठूंठ पर बैठकर, गई कोकिला कूक।
बाल न बाँका कर सकी, शासन की बंदूक।।’ 

जाहिर सी बात है विषय विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों के लगातार अपमान से उपजी स्थितियों को बेकाबू होते देर नहीं लगेगी। पूना स्थित फिल्म व टेलीविजन प्रशिक्षण संस्थान जैसे अल्पज्ञात व छोटे केंद्र की स्वायत्तता हरण से जो प्रक्रिया शुरू हुई थी वह शिखर की ओर बढ़ते हुए  भारतीय रिजर्व बैंक तक को अपनी चपेट में ले चुकी है। अब चंद स्वायत्त संस्थाएं ही अस्तित्व बचा पाई हैं। क्या हम उनके धराशायी होने का इंतजार करें या प्रतिकार में जुटें? अपनी व्याकुलता को सार्वजनिक करने का यह सर्वश्रेष्ठ समय है। क्या भारतीय समाज इस दिशा में आगे बढ़ेगा? शर्मनाक है कि आज़ादी के सत्तर साल बाद भी हमें यह पंक्तियां सुनाई पड़ती हैं,
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सडक़ पर खड़े हुए।

और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।।

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