गरीबपरस्ती का स्वांग, अमीरपरस्ती का काम

राजेंद्र शर्मा नोटबंदी की प्रधानमंत्री द्वारा घोषित पचास दिन की अवधि के आखिर तक आते-आते, इसके बड़े पैसे वालों के खिलाफ किसी तरह का हमला होने का मुखौटा भी आखिरकार पूरी तरह से उतर गया है।...

गरीबपरस्ती का स्वांग, अमीरपरस्ती का काम
राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा
नोटबंदी की प्रधानमंत्री द्वारा घोषित पचास दिन की अवधि के आखिर तक आते-आते, इसके बड़े पैसे वालों के खिलाफ किसी तरह का हमला होने का मुखौटा भी आखिरकार पूरी तरह से उतर गया है। बेशक, अपने इस विनाशकारी और सबसे बढक़र अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र से जुड़े गरीब मेहनतकशों की रोजी-रोटी को ही खतरे में डालने वाले कदम को, सही और वास्तव में देश के हित में बहुत ही जरूरी ठहराने के लिए, मोदी सरकार की ओर से कालेधन व भ्रष्टïाचार तथा नकली मुद्रा पर रोक से लेकर, आतंकवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने तक के दावे किए जा रहे थे। लेकिन, इन दावों में पिरोए गए एक चमकदार धागे की तरह, लगातार इसे एक अमीर-विरोधी कार्रवाई बनाकर आम जनता के गले उतरवाने की जो कोशिश की जा रही थी, वह भी किसी से छुपी हुई नहीं थी। वास्तव में नोटबंदी के ‘अमीर-विरोधी’ होने के इस दावे को सबसे बढक़र खुद प्रधानमंत्री द्वारा उछाला जा रहा था। प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा के बाद, जापान में उस पर अपनी पहली सार्वजनिक टिप्पणी से ही इसकी शुरूआत कर दी थी। इसी क्रम में बाद में उन्होंने ‘गरीब चैन की नींद सो रहा है और अमीर नींद की गोलियों की तलाश में भटक रहे हैं’ जैसे चर्चित जुमले भी दिए। नोटबंदी के अमीर-विरोधी होने के नाते ही गरीब-हितकारी होने का यही दावा, पचास दिन की घोषित अवधि का आखिरी सप्ताह शुरू होने तक प्रधानमंत्री जोर-शोर से कर रहे थे। मुंबई के अपने दौरे पर प्रधानमंत्री का इसका दावा कि अब गरीबों की मुश्किलें घटेंगी और अमीरों की मुश्किलें बढ़ेंगी, इसी का उदाहरण था।
लेकिन, मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के आयोजन में ऐसी थोड़ी सी लफ्फाजी भी प्रधानमंत्री को बहुत भारी पड़ गई और गरीबपरस्ती के मुखौटे के पीछे से उनकी सरकार का असली, अमीरपरस्त चेहरा सामने आ गया। वास्तव में प्रधानमंत्री ने तो अपनी आम लफ्फाजी के हिस्से के तौर पर, शेयर बाजार में कमाई करने वालों से इतनी सी शिकायत की थी कि कर के रूप में उनका योगदान कहीं कम है और उन्हें अपना योगदान बढ़ाना चाहिए। लेकिन, अपने स्वार्थों के प्रति अति-संवेदनशील तथा आग्रहशील वित्तीय पूंजी को, प्रधानमंत्री को यह स्वांग करना तक हजम नहीं हुआ। इसे शेयर बाजार में दीर्घावधि कमाई पर, जिसमें वास्तव में साल भर से ज्यादा में की गई सारी कमाई आती है, मामूली सा कर लगाने के उस पुराने प्रस्ताव की वापसी के संकेत की तरह लिया गया, जिसको वित्तीय पूंजी की नाराजगी के डर से अब तक कोई सरकार लागू नहीं कर पाई है। वित्तीय हलकों की पहली ही भभकी में मोदी सरकार के हाथ-पांव फूल गए। वित्त मंत्री अरुण जेटली को वित्तीय पूंजी को आश्वस्त करने के  लिए और बाकायदा यह साफ करने के लिए मैदान में उतरना पड़ा कि प्रधानमंत्री की बात को गलत समझ लिया गया था। उनका आशय शेयर बाजार की कमाई पर कर बढ़ाने का हर्गिज नहीं था। शेयर बाजार की दीर्घावधि कमाई पर किसी तरह का कर लगाने का मौजूदा सरकार का कोई इरादा नहीं है। यह दूसरी बात है कि इस आश्वासन के बावजूद, वित्तीय पूंजी ने अपने ऊपर कर का बोझ बढ़ाने की बात सोचने भर की जुर्रत करने के लिए धमकाने वाले तरीके से अपनी नाराजगी दर्ज कराना जरूरी समझा। प्रधानमंत्री के उक्त बयान के बाद, शेयर बाजार के खुलने के पहले दिन ही, सेंसैक्स और निफ्टी, दोनों ने एक फीसद से जरा सी कम गिरावट दर्ज कराई।
लेकिन, यह किस्सा इतने पर भी खत्म नहीं हुआ। वित्तीय पूंजी की टेढ़ी न•ारों के दबाव में, वित्त मंत्री को कर अधिकारियों को संबोधित करते हुए बाकायदा यह भी साफ करना पड़ा कि उनकी सरकार तो बड़ी कमाई करने वालों पर लगने वाला कर और घटाने का ही इरादा रखती है, फिर करों का बोझ बढ़ाने का सवाल ही कहां उठता है। वित्त मंत्री ने इस सिलसिले में बाकायदा अपनी सरकार का दर्शन भी स्पष्टï किया कि वह बड़ी कमाई पर करों को, मौजूदा स्तर से नीचे ही ले जाने के पक्ष में है। उनका कहना था कि देश में उत्पादन तथा सेवाओं को विश्वस्तर पर प्रतिस्पद्र्घी बनाने के लिए, करों को घटाया जाना जरूरी है। करों का मौजूदा स्तर उद्यमियों को अंतरराष्टï्रीय स्तर पर प्रतिस्पद्र्घी दामों पर ये माल तथा सेवाएं मुहैया कराने से रोकता है। बेशक, इसके साथ ही वित्त मंत्री ने नवउदारवादी अंधविश्वास पर ही टिका यह बेतुका दावा भी दोहराया कि कर की दरें घटाने से परिपालन बढ़ेगा और इस तरह राजस्व आधार भी बढ़ेगा। यहां तक कि उन्होंने बिना किसी साक्ष्य के यह दावा भी कर दिया कि ज्यादा कर लगना ही कर चोरी यानी कालेधन की समस्या की जड़ है—पहले चूंकि कर की दरें ज्यादा थीं, ज्यादा कर चोरी होती थी।
अब कम से कम इतना समझने के लिए किसी आर्थिक विशेषज्ञता की जरूरत नहीं होगी कि कर घटाने का मतलब सीधे-सीधे बड़ी कमाई करने वालों को और अमीर बनाना ही है। अपने वास्तविक अर्थ में यह कर चोरी तथा इसलिए काली कमाई से भी, बहुत भिन्न मामला नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब, कर घटाने के जरिए सरकार कानूनी तौर पर उन्हें अतिरिक्त कमाई करा रही होगी और यह कमाई, जो कर न घटाए जाने की सूरत में उन्हें कर चोरी से करनी पड़ी होती, अब वे अपनी वैध कमाई के रूप में घर ले जा रहे होंगे।  इससे ज्यादा खुली अमीरपरस्ती और क्या होगी! यही है इस सरकार का असली चेहरा है। याद रहे कि यह इस सरकार के नीतिगत दर्शन का मामला है, किसी अचानक उठाए गए कदम का नहीं।
तब आने वाले दिनों में ‘अमीरों की परेशानी बढऩे’ की प्रधानमंत्री की लफ्फाजी का क्या अर्थ है? जैसा कि नोटबंदी के करीब पचास दिन के अनुभव से स्पष्टï है, जिसका अंत कालेधन के ऐसे मालिकों को जो अब तक अपने पुराने बंदशुदा नोट बदलवा नहीं पाए हैं, अपना कालाधन फिफ्टी-फिफ्टी के आधार पर सफेद करने का एक और मौका दिए जाने पर हो रहा है, यह शुद्घ जुमलेबाजी का मामला है। कालेधन के ही संबंध में नरेंद्र मोदी की ऐसी ही जुमलेबाजी यह देश पहले भी देख चुका है। नोटबंदी का अगर कोई सच है, तो वह है गरीब जनता की तबाही। सारे आसार इसी के हैं कि बैंकों के सामने लंबी लाइनों समेत, आम आदमी की सारी तकलीफें नोटबंदी के पचास दिन पूरे होने के बाद भी जारी रहने वाली हैं। इसमें कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था पर पड़ी चोट का असर भी शामिल है, जो आने वाले काफी अर्से तक चलने जा रहा है। खैर! नरेंद्र मोदी की अमीरविरोधी लफ्फाजी का अंत, जेटली के आने वाले बजट की खुल्लमखुल्ला अमीरपरस्ती पर ही होना था। आखिरकार, सौ बार बोलकर किसी झूठ को सच बनाने की कोशिश इसीलिए तो की जाती है कि उसकी आड़ में, सच को झुठलाया जा सके। और सच यही है कि नरेंद्र मोदी की सरकार, इस देश में आई अब तक की सबसे ज्यादा अमीरपरस्त सरकार है।


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