रहने को घर नहीं, सारा हिन्दुस्तां हमारा!

जिस नेता-नौकरशाह ने रैन बसेरे में आधार कार्ड को अनिवार्य बनाया, उसे दिसंबर-जनवरी की सिर्फ एक रात सड़क पर गुजारने को बाध्य करना चाहिए...

पुष्परंजन
रहने को घर नहीं, सारा हिन्दुस्तां हमारा!
Not to stay home
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  जिस नेता-नौकरशाह ने रैन बसेरे में आधार कार्ड को अनिवार्य बनाया, उसे दिसंबर-जनवरी की सिर्फ एक रात सड़क पर गुजारने को बाध्य करना चाहिए, ताकि तुगलकी फरमान जारी करने का परिणाम समझ में आए। ताज्जुब है कि इस अमानवीय आदेश की वजह से हुई 44 मौतों पर मानवाधिकार आयोग चुप है। दिल्ली के किसी एक खेल स्टेडियम को मात्र दो महीने के लिए लावारिस लोगों के अस्थाई ठिकाने में बदल दिया जाता, तो इतनी बड़ी संख्या में मौत नहीं होती।

प्रधानमंत्री निवास से मात्र साढ़े पांच किलोमीटर दूर है वह जगह, जहां खुले में सैकड़ों लोग सोते हैं। आधार कार्ड है, तो रैन बसेरा में इंट्री होगी, वरना खुले आसमान में सोइये। आधार कार्ड नहीं रहने पर जब राशन का अन्न नहीं मिलता, तो रैन बसेरा कहां से मिलेगा? टीन की छत, और टेंट वाला रैन बसेरा! मेट्रो का 'सब-वे' रात को रैन बसेरा बन जाता है। सुबह मेट्रो रेल सेवा शुरू होने से पहले जगह $खाली करनी पड़ती है। एम्स में इलाज के लिए आये इन अभागों पर विदेश से आये किसी शासन प्रमुख की नजर न पड़ जाए, इसलिए इस जगह को वीवीआईपी रूट से बाहर रखा गया है। प्रधानमंत्री कभी भूले-भटके एम्स का रू$ख करते हैं, तो पुलिस बाहर बोरिया-बिस्तर डाले लोगों को खदेड़ कर जगह चकाचक करने में लग जाती है। दिल्ली के लुटियन से रैन बसेरों को दूर रखा गया है, यहां का श्रेष्ठी वर्ग, सत्ता संचालन करने वाले, कूटनीतिक देश की दुर्दशा क्यों देखें? 

बेघरों के लिए घर, एक ऐसा अफसाना है, जिसे अंजाम तक लाना मुमकिन नहीं हुआ। 2011 के जनगणना के समय 17 लाख लोग इस देश में बेघर थे। 2018 में भी इसी संख्या से रूबरू होना पड़ रहा है। आंकड़ों में रत्ती भर भी फर्क नहीं आया। 1 जून 2015 को 'प्रधानमंत्री आवास योजना' की घोषणा हुई थी। इस पर 439.22 अरब रुपये $खर्च करना तय हुआ था। इतने पैसे से शहरी गरीबों के लिए छह लाख 83 हजार 724 फ्लैट तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह घर उन 'लोअर इनकम ग्रुप' के गरीबों के लिए है, जिनकी सालाना आय तीन से छह लाख के बीच है। 

अब कोई ये बता दे कि ये जो सड़क के किनारे सोने वाले लोग हैं, ये तीन से छह लाख सालाना आय वाले हैं? इसका मतलब यह होता है कि महीने में जिसकी कमाई 25 हजार से लेकर 50 हजार के बीच है, वह प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत बन रहे फ्लैटों के लिए आवेदन कर सकता है। इस योजना को बनाने वाले अधिकारी संभवत: इस सच से अवगत नहीं हैं कि जो लोग 25 से 50 हजार महीने का कमा रहे हैं, वो शहर से थोड़ा हटकर प्लाट लेकर अपने सिर पर आशियाने का जुगाड़ जैसे-तैसे कर रहे हैं। जून 2015 से हम-आप देख रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी हर चार-छह महीने पर गाहे-बगाहे नारा लगा देते हैं, '2022 तक हम सबको घर दे देंगे।' 2022 तक प्रधानमंत्री  आवास योजना के तहत घर कितने बनेंगे? 6 लाख, 83 हजार, 724। और बेघरों की संख्या है 17 लाख। तो, सबको घर ये कैसे दे देंगे? इस गणित को कोई समझा दे। इस देश में सपने में जीने वालों की कमी नहीं है, बस सुनहरे सपने दिखाने वाला नेता होना चाहिए। 

प्रधानमंत्री आवास योजना के जानकारी दी गई कि सौ शहरों में 4 जनवरी 2015 को शुरू हुआ काम 3 जनवरी 2017 को समाप्त हो जाएगा। दूसरे चरण में 200 शहरों में 4 जनवरी 2017 को आरंभ हुआ कार्य, 3 जनवरी 2019 को समाप्त होगा। और देश के बचे हुए शहरों में तीसरे चरण का काम 4 जनवरी 2019 को शुरू होगा, तथा 3 जनवरी 2022 को सबको घर मिल जाएगा। 9 जुलाई 2017 को कन्याकुमारी से एक $खबर आई कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने एक हजार 314 घर आबंटित कर दिये गये हैं। अभी हर जगह इसकी जिज्ञासा है कि पहले चरण में कितने घर देश के 100 शहरों में बनाये गये, कितने बेघरों को प्रधानमंत्री की वजह से छत नसीब हो गया। बीजेपी सरकार का जो प्रचार तंत्र है, इसकी जानकारी अब तक नहीं दे पाया है कि पहले चरण के नतीp क्या निकले। 

इस देश के वित्त मंत्री अपनी उपलब्धियों का बखान करने के लिए सबसे अधिक वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों का सहारा लेते हैं। उसी वर्ल्ड बैंक का कहना है कि देश के 23.6 प्रतिशत, यानी 27 करोड़ सात लाख लोग $गरीबी रेखा से नीचे वाले हैं। विश्व बैंक ने $गरीबी रेखा का जो पैमाना तय किया है, उसके अंतर्गत वैसे लोग हैं, जो सवा डॉलर रोज, अर्थात अस्सी रुपये से अधिक की $खरीद नहीं कर सकते हैं। हिसाब कीजिए तो ऐसे लोगों की सालाना कमाई 50-60 हजार रुपये को पार नहीं करती। रोज-रोज आबोदाना का जुगाड़ करने वाले ऐसे लोग, क्या आशियाना की कल्पना कर सकते हैं? विश्व बैंक के आंकड़े, और भारत सरकार की जनगणना के बीच बेघरों की जो संख्या है, वह सच की पर नहीं दिखती। ऐसे दरिद्र नारायणों को जब ठीक से खाने को नसीब नहीं है, तो '2022 में सबके लिए घर' वाला नारा, 'थोथा चना, बाजे घणा' नहीं लगता?

 जो पीएम आवास योजना में पैसे जमा कर जिन्होंने घर ले लिया, उससे देश के सारे बेघरों को राहत मिल गई, ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसी हफ्ते दिल्ली में खुले आसमान के नीचे ठंड से अकड़कर 44 लोग मर गये। अपनी प्रशासनिक विफलता व $गलतियों पर मिट्टी डालने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री और लेफ्टिनेंट गवर्नर एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहे हैं। तीन दिन पहले की $खबर थी कि उत्तर प्रदेश में ठंड की वजह से चौबीस घंटे के भीतर 40 लोग मर गये। 2017 के आखर और 2018 के आरंभ में ठंड से अकड़कर 143 लोग यूपी में सिधार गये। नेता चाहे किसी पार्टी का हो, या नौकरशाह किसी शासन में, लावारिस मौतों पर सबकी प्रतिक्रिया एक सी होती है। 


देश में खाया-पीया, अघाया एक क्लास है, जो 'बिग बॉस' के यहां से बेघर हुए अर्शी खान, आकाश डडलानी को लेकर दिनभर किटी पार्टी और क्लबों में बहस करेगा। मगर, दिल्ली में 44, और यूपी में 143 बेघर लोग ठंड से अकड़कर मर गये, यह उनकी संवेदना को दस्तक नहीं देता। यों, यह बिग बॉस का घर भी अजीब शै है। टीवी शॉप ऑपेरा ऐसे ही अघाये, आवारा, लड़ाके चेहरों को चुनता है, जो वास्तविक जीवन में कहीं से बेघर नहीं हैं। इस शो में शामिल हस्तियां जितनी गाली-गलौज, नंगई प्रस्तुत करते हैं, देश उन्हें खूब ध्यान से देखता है। युवा पीढ़ी के लिए तो बिग बॉस का घर तो एक ड्रीम होम है, और उसमें भाग लेने वाले 'बेघर' उनके 'आइकॉन'। 

बेघर के बारे में सोचने का हमारा ढब भी देखते-देखते बदल गया। बेढब हो गये हम लोग, हमारी राजनीति, और समाज। सचमुच के बेघर हर साल कितने मरते हैं, यह जानना सामान्य ज्ञान बढ़ाने जैसा है। 'कोल्ड और एक्सपोजर' से हर साल हिन्दुस्तान में 781 लोग मरते हैं, यह आंकड़ा 'ओजीडी प्लेटफार्म' से प्राप्त हुआ है। 'ओजीडी' बोले तो, 'ओपन गवर्नमेंट डाटा'! 'ओजीडी' के अनुसार, 2001 से 2014 के बीच इस देश में 10 हजार 933 लोग ठंड और लू लगने से मर गये। इस सरकारी डाटा की मानें, तो पुरुष, महिलाओं की अपेक्षा पांच गुना अधिक ठंड-लू से मरते हैं। आंकड़े के अनुसार 10 वर्षों में शीतलहर और लू से मरने वालों में 9 हजार 152 पुरुष, और 1 हजार 780 महिलाएं थीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकारें बेघर लोगों की सुरक्षा का इंतजाम करे, ताकि कड़कड़ती ठंड में लोग सड़क किनारे, सुनसान जगहों पर अकड़ कर न मरें। सुप्रीम कोर्ट को इसका अंदाजा नहीं था कि रैन बसेरों के कर्मचारी बिना आधार कार्ड के लोगों को घुसने नहीं देंगे।  इस अमानवीय अपराध के लिए किसे जिम्मेदार ठहराना चाहिए?

2016 की खबर थी कि दिल्ली सरकार ने 261 ठिकानों पर 21 हजार 444 लोगों के लिए रात काटने की जगह मुहैया कराई थी। लगभग दो करोड़ की आबादी वाले दिल्ली शहर में जो एनजीओ सड़कों पर रात काटने वालों की संख्या का आकलन करते हैं, उनके अनुसार ऐसे लोग 60 से 80 हजार के बीच होंगे। यह संख्या अनुमान से अधिक भी हो सकती है। पर यह तो पक्की बात है कि सरकारी इंतजाम से तीन गुने अधिक लोग इस शहर में हैं, जिनके पास सिर छिपाने को जगह नहीं है। ऊपर से ऐसे लोगों को शरण देने से पहले आधार कार्ड की मांग होती है। 

शेल्टर होम में जिस नेता-नौकरशाह ने आधार कार्ड को अनिवार्य बनाया, उसे दिसंबर-जनवरी की सिर्फ एक रात सड़क पर गुजारने को बाध्य करना चाहिए, ताकि तुगलकी फरमान जारी करने का परिणाम समझ में आए। ताज्जुब है कि इस अमानवीय आदेश की वजह से हुई मौतों पर मानवाधिकार आयोग चुप है। दिल्ली के किसी एक खेल स्टेडियम को मात्र दो महीने (दिसंबर और जनवरी तक) लावारिस पड़े लोगों के अस्थाई ठिकाने में बदल दिया जाता, तो इतनी बड़ी संख्या में मौत नहीं होती। हो सकता है इन पंक्तियों को पढ़कर किसी को यह आइडिया पसंद न आये, और कहे कि क्या इन कंगलों के वास्ते स्टेडियम पर करोड़ों रुपये खर्च किये गये? 

कई बार यह सवाल मन में आता है कि जितनी बड़ी संख्या में देश के महानगरों, गांव-कस्बों में मंदिर, मस्जाद व दूसरे धर्मस्थलों का निर्माण हुआ है, धर्मशाला और सराय बनने क्यों बंद हो गये? दिल्ली में सराय काले खां, सराय रोहिल्ला, बेर सराय,  सराय, लाडो सराय, कटवारिया सराय, युसूफ सराय जैसे नामचीन इला$कों का चप्पा-चप्पा घूम लीजिए, एक भी सराय नहीं मिलेगा। प्याऊ भी उसी तरह इतिहास के पन्नों में खो गये। अक्षरधाम मंदिर निर्माण पर अरबों रुपये $खर्च हुए मगर, सरकार ने अनुमति देते समय यह शर्त नहीं रखी कि आप बेघरों के लिए एक अस्थाई रैन बसेरा बनाएंगे। ऐसा किया जा सकता था। बेघरों की $खैर-$खबर लेने, कभी-कभार खाना लेकर आने वाले लोगों को देखकर लगता है, कुछेक लोगों-संगठनों में संवेदना बची है। एम्स जैसी जगहों पर ऐसे लोगों को खाना और कंबल बांटते देखकर लगता है, इन्हें सलाम करूं!pushpr1@rediffmail.com

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