अर्जुन सिंह : न दैन्यम्; न पलायनम्

मोहम्मद यूनुस आज पुण्य स्मरण अर्जुन सिंह एक सहज, सरल इंसान थे; जिनके हृदय में अबोध बालक का मन था। अपनी माटी पर गर्व, अपनों से प्यार और अपनों का साथ। आडम्बर व दिखावे से उनकी वितृष्णा, तिरस्कार की सीमा ...

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अर्जुन सिंह : न दैन्यम्; न पलायनम्
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मोहम्मद यूनुस
आज पुण्य स्मरण

अर्जुन सिंह एक सहज, सरल इंसान थे; जिनके हृदय में अबोध बालक का मन था। अपनी माटी पर गर्व, अपनों से प्यार और अपनों का साथ। आडम्बर व दिखावे से उनकी वितृष्णा, तिरस्कार की सीमा के पार तक चली जाती थी, किंतु सैद्धांतिक विरोध को उन्होंने कभी व्यक्तिगत विरोध नहीं बनने दिया। अपने नैतिक मूल्यों के लिये जीवन पर्यन्त समर्पित व दृढ़ प्रतिज्ञ रहे। अपने सिद्धांतों से समझौता किसी भी मूल्य पर उन्हें स्वीकार नहीें था। अपने पक्ष पर अडिग रहे। राजनैतिक पद-प्रतिष्ठा का मोह पालकर अर्जुन सिंह ने अपनी निष्ठा का बलिदान नहीं किया-क्योंकि उनकी निष्ठा का जन्म सिद्धान्त और आदर्श की कोख से हुआ था। व्यक्ति अपने जीवन मूल्यों की स्थापना स्वयं करता है, और जब उन्हीं मूल्यों की प्रतिबद्धता वह किसी और में देखता है और परख भी लेता है, तो व्यक्ति विशेष से उसका लगाव हो जाता है। अपने स्थापित आदर्शों की टोह में व्यक्ति श्रद्धा की सीढ़ी तक पहुंचकर, वह अपना आदर्श व्यक्तित्व पा लेता है। इसीलिये अर्जुनसिंह के आदर्श बने- वर्तमान भारत के स्वप्नदृष्टा और निर्माता पं. जवाहर लाल नेहरू। राष्ट्रीय गौरव के लिये त्याग और बलिदान तथा भारतीय समाज के उत्थान के लिए दोनों एक ही वैचारिक धरातल पर खड़े थे। तभी तो भावनात्मक लगाव इतने अटूट थे, कि अपने साथियों के ही आघात झेलते हुए श्री सिंह नेहरू परिवार के प्रति अन्त तक निष्ठावान बने रहे।
    जिस माटी से शरीर पाया, जिस सर्वशक्तिमान ने सांसें दीं, अर्जुनसिंह उसके प्रति आजीवन कृतज्ञ और समर्पित रहे। राम भक्त हनुमान का आदर्श उनके  रोम-रोम में बसा था। ‘राम काज कीन्हे बिना मोंहि, कहां विश्राम’ सेवा का मंत्र लिये सामंती परिवेश से बाहर निकल उन्होंने मानवीय संवेदना को सॉंसों में समेटे सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के लिये राजनीति को माध्यम चुना। 1917 में रूसी क्रांति के साथ ही समूचे विश्व में चेतना, जनाक्रोश में बदल रही थी। भारतीय समाज के भी हर क्षेत्र, किसान, मजदूर, बुद्धिजीवी, साहित्यकार यहां तक कि सेठ-साहूकार सभी के अन्दर बदलाव की ज्वाला धधक उठी थी। सत्य और अहिंसा को खादी की मोटी चादर में बापू ने समूचे देश को लपेट लिया था। वहीं, नौजवानों का समूह बापू का नमन करते हुए, राम प्रसाद बिस्मिल -सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है- का तराना मतवाला होकर गा रहा था।
बापू की टीम में जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, राजेन्द्र प्रसाद आदि अनेक महान नेता थे, जो अंग्रेजों की लाठी-गोली खा रहे थे। वहीं बिस्मिल के बलिदानी साथियों में, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव अशफ ाकउल्ला खां जैसे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत की नीव हिला दी थी।
यानी समय परिवर्तन ला रहा था। मौसम जब बदलता है, तो जड़-चेतन दोनों में परिवर्तन का प्रभाव दिखने लगता है। इसी बीच कालचक्र, आने वाले कल के लिये अपना पात्र, स्थान विशेष के अनुरूप चुन लेता है। नव विहान की इस बेला में 5 नवम्बर 1930 को अर्जुन सिंह का जन्म चुरहट राजघराने में हुआ।
    विंध्यप्रदेश में सामंतशाही अपनी चरम पर थी। इस पृष्ठभूमि के कारण, इस क्षेत्र में डॉ. राममनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण व अन्य समाजवादियों की जड़ें , घर-घर में गहरी फैली हुई थीं। सामंती अन्याय, अत्याचार शोषण से लोगों की पीड़ा को अर्जुनसिंह ने बचपन में ही देखा और अनुभव कर लिया था। तभी तो मात्र 10 वर्ष की आयु में दशहरे के दिन उन्होंने राजसी वेशभूषा  पहनने को मना कर दिया था। आगे चलकर समाजवाद ने अर्जुन सिंह को आकर्षित किया। उस समय समाजवादी पार्टी में चन्द्रप्रताप तिवारी का एक बड़ा नाम था। वे सीधी जिले के हनुमानगढ़ गांव के थे। चुरहट और हनुमानगढ़ के बीच की दूरी भी बहुत कम ही नहीं बल्कि हनुमानगढ़, चुरहट इलाके का एक गांव था। चूंकि अर्जुन सिंह के पिताजी ने ही श्री तिवारी की शिक्षा का दायित्व निभाया था, तो  अर्जुन सिंह और चन्द्रप्रताप तिवारी में निकटता स्वाभाविक थी।
अर्जुन सिंह को राजनैतिक डगर पर साथ-साथ चलने का विश्वास दिलाया था तिवारी जी ने। पर 1957 के विधान सभा चुनाव के लिये पार्टी प्रत्याशियों के चयन में षड्यंत्र किया गया। अर्जुन सिंह को यह कहकर कि अभी तो लोग आ रहे हैं, सबके आने पर ही कार्यवाही शुरू होगी और यह भी, कि यहां तो ठीक से बैठने की भी जगह नहीं है। चलिये, पास में ही वन विभाग का रेस्ट हाउस है, वहीं बैठते है। मीटिंग शुरू होने पर केशव सिंह हम लोगों को बुलवा लेंगे। केशव सिंह, चन्द्रप्रताप के अतिविश्वसनीय व्यक्ति थे। शाम तक कोई बुलावा नहीं आने पर अर्जुन सिंह व चन्द्रप्रताप तिवारी, कार्यवाही स्थल पर पहुंचे, तो बताया गया, कि प्रत्याशियों का चयन तो सर्वसम्मति से कर लिया गया है,  आपके (श्री सिंह) नाम का तो प्रस्ताव ही नहीं आया-इसलिये विचार ही नहीं किया गया। अर्जुनसिंह इस राजनैतिक धूर्तता से दु:खी तो अवश्य हुए, पर उन्होंने राजनैतिक षडय़ंत्र का पहला अध्याय भी समझ लिया। संकल्प लेकर दृढ़ता से निर्दलीय विधान सभा का पहला चुनाव लड़े और जीते। कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लडऩे के प्रस्ताव को विनम्रता से अस्वीकार किया। जबकि डॉ.सुशीला नय्यर, जो कांग्रेस की एक बड़ी नेता थीं, स्वयं प्रस्ताव लेकर आयी थीं। अर्जुन सिंह दृढ़प्रतिज्ञ होकर अपनी राजनैतिक राह स्वयं तय कर एकला चल पड़े। उसी दिन उन्होंने संकल्प लिया-विन्ध्य की धरती से समाजवाद का नकाब पहने, दोहरे चरित्र वाले नेताओं को न केवल बेनकाब करेंगे, अपितु विन्ध्य की धरती से समाजवादी पार्टी को समाप्त करेंगे। संकल्प पूरा हुआ और कांग्रेस की नींव को ठोस आधार मिला।
कुॅवर अर्जुन सिंह भारतीय राजनीति के अन्य नेताओं से भी अत्यधिक प्रभावित रहे। विद्यार्थी जीवन में छात्र अर्जुन सिंह की टाई बापू ने इस प्रकार पकड़ी, मानो पूछ रहे हों- यह टाई तो हमारी संस्कृति नहीं, अंग्रेज शासकों का समर्थन है। उसी क्षण टाई को जो उतार फेंका, तो फिर कभी हाथ नहीं लगाया। छात्र जीवन में ही नेता जी सुभाष चंद्र बोस के व्यक्तित्व से भी इतने प्रभावित थे, कि उन्हीं की शैली में जय और जयहिंद बोलते थे।
    1960 में पण्डित जवाहर लाल नेहरू को एक पत्र लिखकर श्री सिंह ने सुझाव रखा कि जनप्रतिनिधियों को अपनी संपत्ति का पूर्ण ब्यौरा विधान सभा के पटल पर रखकर सार्वजनिक करना चाहिये। उन्होंने अपनी संपत्ति का ब्यौरा भी पत्र के साथ संलग्न किया। अर्जुन सिंह ने अपनी राजनैतिक यात्रा जिस विचारधारा, उद्देश्य और मूल्यों के साथ शुरू की थी, उसमें अंत तक कोई विरोधाभास आपको नहीं मिलेगा। विधानसभा, लोकसभा या राज्यसभा कहीं की भी, किसी भी समय की प्रोसीडिंग उठाकर देख लीजिये, उनकी प्रतिबद्धता 1957 से लेकर 2001 तक एक ही है। उनके बोले किसी एक भी वाक्य, लाइन या किसी एक शब्द की मीडिया मनमानी व्याख्या कभी नहीं कर सकता। ऐसा इसलिये हो पाया, क्योंकि उन्होंने शब्दों की मर्यादा व अर्थ को समझा। कहीं भी किसी भी अवसर पर, किसी भी मंच से उनकी भाषा का स्तर एक ही रहता था। यहाँ तक कि चुनाव में भी, देश व समाज की ही बातें किया करते थे।
एम्स में 3-4 मार्च 2011 को रात का जब चौथा चरण शुरू हुआ ही था कि मुझे डॉक्टर ऑन ड्यूटी को तुरंत बुलाना पड़ा। सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर ने चैकअप के बाद कहा इन्हें आईसीयू में जल्दी ले चलिये। एकान्त में डॉक्टर ने निराशा व्यक्त की। इस आघात को मैंने तब अकेले कैसे छिपाने की असफल चेष्टा की होगी-यह वही समझ सकता है, जो इस स्थिति से गुजरा होगा। साहब ने पूछा-क्या कह रही है डॉक्टर साहिबा? मैंने कहा आईसीसीयू में ले चलना है-बोले-चलो, ले चलो। यही थे अंतिम वाक्य उस इंसान के जिसने जीवन भर इंसानियत क्या होती है, उसे जिया और जीना सिखाया। चलो का अर्थ है साथ चलने का- तो मैं 42 वर्षों से उनके साथ चल रहा था-पर उनके आखिरी ‘‘हुकुम’’ को क्या मैं निभा पाया? चल सका तो सिर्फ  आई.सी.सी.यू.तक। वे चले गये-मंै तब अकेला खड़ा रह गया।


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