नोटबंदी के ढोल की खुलती पोल

राजेंद्र शर्मा नये साल की शुरूआत नरेंद्र मोदी की नोटबंदी के ढोल की पोल खुलने से हुई है। ...

नोटबंदी के ढोल की खुलती पोल
राजेंद्र शर्मा

राजेंद्र शर्मा
नये साल की शुरूआत नरेंद्र मोदी की नोटबंदी के ढोल की पोल खुलने से हुई है। बेशक, प्रधानमंत्री के इस पूरी तरह से मनमाने फैसले से जनता को और खासतौर पर गरीब मेहनतकशों को हो रही तकलीफें तो पहले ही दिन से नजर आ रही थीं। देश भर में बैंकों तथा एटीएमों के सामने नोट बदलने से लेकर, जमा कराने/ निकालने तक के लिए लगी लाइनें, सबसे मुखर रूप से इन तकलीफों की कहानी कह रही थीं। लेकिन, इससे भी ज्यादा बुरी मार खेती समेत समूचे असंगठित क्षेत्र पर पड़ रही थी, जिससे इस देश के 85 फीसद मेहनतकशों को रोजी-रोटी जुड़ी है। मुख्यत: नकदी पर और अनेक हिस्सों में तो सिर्फ नकदी पर चलने वाले इस क्षेत्र की नोटबंदी ने कमर ही तोडक़र रख दी। इस क्षेत्र की तकलीफों की दृश्यता बेशक बैंकों के सामने लगी अंतहीन लाइनों से कम थी। फिर भी, नोटबंदी के पहले हफ्ते के बाद से ही किसानों तथा अन्य छोटे-छोटे कामों में लगे लोगों की मुश्किलें सामने आनी शुरू हो चुकी थीं और नोटबंदी के चमत्कारी नतीजे दिखाने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा मांगी गई पचास दिन की अवधि के आखिर तक आते-आते, गरीब मेहतनकशों की ये तकलीफें, एक स्वीकृत तथ्य बन चुकी थीं। इसी के दबाव में नरेंद्र मोदी के इस ‘साहसपूर्ण कदम’ के ढिंढोरचियों को भी ‘कुछ समय के लिए कुछ तकलीफ’ के रूपकों को छोडक़र, कैंसर के इलाज के साइड इफैक्ट्स जैसे रूपकों का सहारा लेना पड़ रहा था। बहरहाल, साल के आखिर में पचास दिन की अवधि पूरी होने के एक हफ्ते अंदर-अंदर, कम से कम तीन और स्तरों पर नोटबंदी के ढोल की पोल खुल चली थी।
इनमें पहला स्तर तो खासतौर पर कालेधन पर वार के उपाय के रूप में नोटबंदी की कारगरता की पोल खुलने का ही है। बेशक, 10 दिसंबर तक जब पांच सौ तथा हजार रुपए के बंदशुदा नोटों में 12 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा बैंकों में लौट आए थे, तभी यह साफ हो गया था कि इस कथित ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से, इन नोटों के 20 फीसद या उससे भी ज्यादा यानी कम से कम 3 लाख करोड़ रुपए के नोटों के ‘रद्दी’ हो जाने और इस तरह कालेधन का एक बड़ा हिस्सा नष्टï हो जाने के जो सपने दिखाए जा रहे थे, सच नहीं होने वाले थे। परोक्ष रूप से इसी सच्चाई को स्वीकार करते हुए, सरकार तथा रिजर्व बैंक ने दिसंबर के पहले हफ्ते के बाद से, आधिकारिक रूप से इसकी जानकारी देना ही बंद कर दिया है कि अब तक बंदशुदा नोटों में कितनी राशि बैंकिंग व्यवस्था में वापस पहुंच चुकी है। इसलिए, माक्र्सवादी नेता, सीताराम येचुरी व्यंग्य से यह कहते हैं तो बहुत गलत नहीं कहते कि कहीं अंत में, रिजर्व बैंक के मुताबिक नोटबंदी के ऐलान के दिन पांच सौ और हजार रुपए के जितने नोट चलन में थे, उससे ज्यादा नोट बैंकों में लौटकर न आ जाएं। अगर ऐसा हुआ तो नोटबंदी न सिर्फ कालेधन को सफेद करने का काम कर रही होगी बल्कि जाली नोटों को वैध मुद्रा बनाने का भी काम कर रही होगी!
ऐसा उल्टा पडऩे वाला यह कदम क्या प्रधानमंत्री और उनके गिने-चुने विश्वासपात्रों के ही दिमाग का फितूर नहीं था? बेशक, 8 नवंबर के नोटबंदी के ऐलान से लेकर, ऐसा कदम उठाने का साहस दिखाने के लिए प्रधानमंत्री की सार्वजनिक प्रशस्तियों तक, इस फैसले पर नरेंद्र मोदी और सिर्फ नरेंद्र मोदी की छाप शुरू से ही साफ थी। प्रधानमंत्री ने भी इस कार्रवाई का पिता होने का बार-बार सार्वजनिक रूप से दावा किया था। इसके बावजूद, संस्थागत मजबूरियां सीधे इसे मोदी सरकार के फैसले के रूप में चलाने से आड़े आती थीं। मुद्रा से संबंधित सभी फैसले लेने का अधिकार, सिर्फ और सिर्फ रिजर्व बैंक के बोर्ड के पास है। संसद के पिछले सत्र में विपक्ष द्वारा इस मामले में रिजर्व बैंक की स्वायत्तता के ध्वस्त किए जाने का मुद्दा उठाए जाने की पृष्ठïभूमि में, मोदी सरकार ने यह कहना शुरू कर दिया था कि नोटबंदी का फैसला रिजर्व बैंक ने ही लिया था, सरकार ने तो उस पर अपनी सहमति की मोहर लगाई थी। केंद्रीय विद्युत, कोयला आदि मंत्री, पीयूष गोयल ने तो राज्यसभा में बाकायदा यह दावा भी किया था कि, ‘रिजर्व बैंक के बोर्ड ने यह निर्णय लिया। इसको सरकार के पास भेजा और सरकार ने इस निर्णय की सराहना करते हुए, कैबिनेट ने इसे मंजूरी दी कि पांच सौ और हजार के पुराने नोटों को रद्द किया जाए, नये नोट आएं।’
बहरहाल, अब वित्त संबंधी संसदीय समिति के सामने अपने बयान में रिजर्व बैंक ने स्पष्टï किया है कि नोटबंदी से सिर्फ एक दिन पहले, 7 नवंबर को सरकार ने ही उसे निर्देश दिया था कि जाली नोट, आतंकवादी फाइनेसिंग तथा कालेधन की तिहरी समस्या से निपटने के लिए, रिजर्व बैंक का बोर्ड पांच सौ और हजार रुपए के नोटों को रद्द करने पर विचार करे। बेशक, रिजर्व बैंक ने भी तत्परता से बोर्ड की बैठक बुलाकर, अगले ही दिन नोटबंदी के लिए मंजूरी दे दी, जिसकी सरकार प्रतीक्षा कर रही थी। इसके फौरन बाद कैबिनेट की ऐसी विचित्र बैठक में इस पर मोहर लगा दी गई, जिसके कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं बताते हैं। और पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रधानमंत्री ने टेलीविजन पर नोटबंदी का ऐलान कर दिया। रिजर्व बैंक का उक्त नोट यह भी दिखाता है कि न तो उसके ख्याल से ज्यादा मूल्य के नोटों का उक्त तीनों समस्याओं से कोई सीधा संबंध था-वर्ना वह और ज्यादा मूल्य के नोटों की सिफारिश न करता, जिनमें से दो हजार रुपए के नोट की सिफारिश तो मौजूदा सरकार ने स्वीकार भी कर ली थी-और न नोटबंदी के जरिए 84 फीसद मुद्रा को हटा लिए जाने से पैदा होने वाले हालात से निपटने की कोई वास्तविक तैयारी थी। उसने तो सिर्फ सरकार के निर्देश का पालन किया था। अचरज नहीं कि सरकार पर रिजर्व बैंक की स्वायत्तता  को ध्वस्त करने के आरोप लग रहे हैं और मोदी सरकार द्वारा रघुराम राजन से छुट्टïी पाकर केंद्रीय बैंक के गवर्नर के पद पर लाए गए उर्जित पटेल पर, केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता ध्वस्त होने देने के आरोप लग रहे हैं।
नोटबंदी के ढोल की पोल खुलने का तीसरा महत्वपूर्ण स्तर, इस कदम से असंगठित क्षेत्र का बुरी तरह से कबाड़ा होने के पहले ही सामने आ चुके सच के ऊपर से, धीरे-धीरे अब संगठित क्षेत्र की भी तबाही का सच सामने आने का है। नोटबंदी के बाद, दिसंबर 2016 में ऑटोमोबाइल्स की बिक्री में 16 साल की सबसे भारी गिरावट दर्ज होने और दोपहिया वाहनों की बिक्री, पिछले साल के दिसंबर के मुकाबले पूरे 22 फीसद नीचे खिसक जाने और निर्माण व आवासन के कारोबार के घटकर आधा ही रह जाने की खबरें आने के फौरन बाद, महत्वपूर्ण ढांचागत क्षेत्रों में द्वारा ऋण उठाए जाने में नोटबंदी के बाद से, बढ़ोतरी के बजाय गिरावट ही दर्ज होने की खबर आई है। बाद वाली खबर इसलिए और भी विध्वंसक है कि मौजूदा सरकार, अर्थव्यवस्था में नयी जान डालने के लिए, ढांचागत क्षेत्र में निवेश बढऩे के ही खासतौर पर भरोसे बैठी रही है। बेशक, अब खुद अरुण जेटली ने भी नोटबंदी से वृद्घि दर में कुछ कमी होने की सच्चाई स्वीकार करना शुरू कर दिया है। लेकिन, ऐसा लग रहा है कि नोटबंदी की मार से असंगठित तथा संगठित, समूची अर्थव्यवस्था ही चरमरा गई है।
और अंत में अर्थव्यवस्था को डिजिटल बनाने के ‘यज्ञ’ की पोल तब खुल गई, जब तमिलनाडु के पेट्रोल पंप मालिकों ने के्रडिट/डेबिट कार्ड से पेट्रोल भरने से इंकार करना शुरू कर दिया और इस मुद्दे पर हड़ताल का ऐलान कर दिया। हुआ यह था कि नोटबंदी की अवधि तक इंतजार करने के बाद, बैंकों ने कार्ड भुगतानों की कीमत वसूलने का फैसला किया था। यह कीमत सीधे ग्राहकों से वसूलना चूंकि ‘डिजिटल’ लेन-देन को हतोत्साहित ही कर सकता था, जो सरकार को मंजूर नहीं होता, उन्होंने तेल बेचने वालों से यह कीमत वसूलने का फैसला लिया था। यह जाहिर है कि तेल विक्रेताओं को मंजूर नहीं था। बेशक, पेट्रोल पंप विक्रेताओं की हड़ताल की धमकी के बाद, सरकार ने बैंकों का उक्त कीमत वसूलना फिलहाल रुकवा दिया है। लेकिन, असली नुक्ता यह है कि डिजिटल लेन-देन की भी अपनी कीमत होती है और यह कीमत घुमा-फिराकर अंतत: जनता पर ही डाली जानी है। साफ है कि यह कोई राष्टï्र की शुद्घि यज्ञ नहीं, बल्कि वास्तव में बहुराष्टï्रीय कंपनियों के मुनाफे बढ़ाने का ही यज्ञ है।


 

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