मेधा पाटकर : सत्याग्रह का स्वप्न लोक

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पूरी दुनिया के सामने यह आदर्श रखा कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद गांधी के सपने को, उनके विचार को, आज भी साकार किया जा सकता है...

मेधा पाटकर : सत्याग्रह का स्वप्न लोक
Satyagraha
चिन्मय मिश्र

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पूरी दुनिया के सामने यह आदर्श रखा कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद गांधी के सपने को, उनके विचार को, आज भी साकार किया जा सकता है। वे कहते थे, 'सत्याग्रह को हमने सत्य का बल बताया है। जो सत्य का सेवन करे वह सत्य का बल कैसे दिखा सकता है? इसलिए सत्य की तो सदा आवश्यकता होगी ही। कितना भी नुकसान होता हो, तो भी सत्य का पालन नहीं छोड़ा जा सकता। सत्य किसी को सताना नहीं होता, इसलिए सत्याग्रही की कोई गुप्त सेना नहीं हो सकती।... भी एक खुला संगठन है। मेधा पाटकर ने पिछले करीब साढ़े तीन दशकों में एक कथित अनपढ़ गंवार कहे जाने वाले समुदाय में इतनी ऊर्जा का संचार कर दिया कि उसने पूरी दुनिया के सामने आधुनिक विकास की अमानवीय विचारधारा को उधेड़ कर रख दिया।

 

समुद्र है तो बादल है,

बादल है तो पानी है,

पानी है तो नदी है,

नदी है तो बची हुई है मेधा पाटकर।

-एकान्त श्रीवास्तव


मेधा पाटकर एक बार पुन: अनिश्चितकालीन उपवास पर हैं, अनशन पर हैं। वजह है- नदी, समाज, पर्यावरण को बचाना और शासन-प्रशासन के अनीति कर व मिथ्या प्रचार का अहिंसक तरीके से जवाब देना। वे महात्मा गांधी के उस कथन को चरितार्थ कर रही हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि आज़ादी के बाद के संघर्ष और भी कठिन होंगे क्योंकि तब हमारे सामने कोई विदेशी शासक नहीं वरन चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार होगी। सरकार सर्वोच्च न्यायालय में शपथ पत्र पर यह लिख कर दे चुकी थी कि अब पुनर्वास का काम पूरा हो चुका है और डूब क्षेत्र में कोई भी निवास नहीं कर रहा है। जबकि आज की स्थिति में करीब 40,000 परिवार इन इलाकों में रह रहे हैं और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की ओट में बिना पूरी औपचारिकताएं करे इन्हें बलात बेदखल करने की पुरजोर तैयारी हो चुकी है। हजारों की संख्या में पुलिस बल नर्मदा घाटी में पहुंच चुका है। परंतु इस सबसे बेखौफ निमाड़ की जनता शांतिपूर्ण प्रतिकार में लगी हुई है।

एकांत आगे लिखते हैं, 'नदी है तो घर है/ उनके किनारे बसे हुए/ घर हैं तो गांव हैं/गांव हैं मगर डूबान पर/ डूबान में एक द्वीप है/स्वप्न का/ झिलमिल/ मेधा पाटकर। पिछले 32 वर्षों से उन्होंने प्रभावितों के सपनों को संजोया। तभी तो दुनिया में पहली बार विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन का मुआवजामिला। गुजरात व महाराष्ट्र में 17,000 से अधिक परिवारों को जिनमें अधिकांश मध्यप्रदेश के थे, को जमीन के बदले जमीन मिली। सिर्फ मध्यप्रदेश ही एकमात्र राज्य है जहां सर्वाधिक प्रभावित रहते हैं, लेकिन यह प्रदेश सौ से भी कम प्रभावितों को जमीन के बदले जमीन दे पाया। आज मेधा जी के साथ 12 अन्य प्रभावित भी 27 जुलाई से अनशन पर बैठे हैं और जीवन-मरण के बीच झूल रहे हैं। लेकिन प्रदेश सरकार अभी तक बातचीत की पहल को तैयार नहीं हैं। यह नर्मदा बचाओ आंदोलन का चमत्कार ही है कि अपने 32 बरसों के अनवरत संघर्ष में यह आंदोलन एक बार भी हिंसक नहीं हुआ। यही इसके नेतृत्व को असाधारण सम्मानजनक भी बना देता है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पूरी दुनिया के सामने यह आदर्श रखा कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद गांधी के सपने को, उनके विचार को, आज भी साकार किया जा सकता है। वे कहते थे, 'सत्याग्रह को हमने सत्य का बल बताया है। जो सत्य का सेवन करे वह सत्य का बल कैसे दिखा सकता है? इसलिए सत्य की तो सदा आवश्यकता होगी ही। कितना भी नुकसान होता हो, तो भी सत्य का पालन नहीं छोड़ा जा सकता। सत्य किसी को सताना नहीं होता, इसलिए सत्याग्रही की कोई गुप्त सेना नहीं हो सकती।’ न.ब.आ. भी एक खुला संगठन है। मेधा पाटकर ने पिछले करीब साढ़े तीन दशकों में एक कथित अनपढ़ व गंवार कहे जाने वाले समुदाय में इतनी ऊर्जा का संचार कर दिया कि उसने पूरी दुनिया के सामने आधुनिक विकास की अमानवीय विचारधारा को उधेड़ कर रख दिया।

कविता आगे कहती है, 'वह जंगल की हरियाली है/ चिडिय़ों का गीत/ फूलों के रंग और गंध के लिए लड़ती/ जड़ों की अदम्य इच्छा है वह।’ मेधा पाटकर और नर्मदा बचाओ आंदोलन का एकाकार या पयार्यवाची हो जाना उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि भर नहीं है। यह छोटे स्तर पर ठीक वैसा ही है जैसा कि महात्मा गांधी व भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक  हो जाना या मान लिया जाना। ऐसा सायास नहीं होता बल्कि अनायास ही घटित हो जाता है। यह उन लोगों को अपने विश्वास में ला पाई, जिनकी भाषा और बोली वह नहीं जानती थीं। उनके साथ देश भर के ऐसे तमाम युवा व अन्य आयु वर्ग के लोग भी आए, जो शैक्षणिक योग्यता में उनसे कहीं आगे थे। नर्मदा घाटी के अनगिनत बच्चों की दीदी व ताई ने जीवन शालाओं के माध्यम से विद्यालयीन शिक्षा को आदिवासी क्षेत्रों में नई पहचान व नए परिष्कार से स्थापित किया। वे साहस की प्रतिकृति हैं। बापू ने कहा है, 'अभय के बिना तो सत्याग्रही की गाड़ी एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती।

उसे सब प्रकार और सभी बातों में निर्भय होना चाहिए। धन-दौलत, झूठा मान-अपमान, नेह-नाता, राजदरबार, चोट-मृत्यु-सब के भय से मुक्त हो जाए तभी सत्याग्रह का पालन हो सकता है।’ बापू सत्याग्रही का एक और विशिष्ट गुण बताते थे, वह यह कि उसे भिखारी बनना होगा। मेधा बहन इन सारे प्रतिमानों पर खरी उतरती है। किसी तरह का भय उनमें नज़र नहीं आता, बल्कि यदि वे समीप हों तो सत्य भी वह ऊर्जा हममें भी प्रवेश करती है। बांध प्रभावितों के हित के लिए उन्होंने लाठियां खाईं, उनके बाल नोंच लिए गए। तमाम बार जेल गईं, इसके बावजूद उन पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ कभी कठोर शब्दों तक प्रयोग वे नहीं करतीं। घाटी के संघर्ष को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से मदद ली जिनकी निष्ठा पर कोई संदेह न हो। यानी साध्य के लिए साधन की पवित्रता भी उनके लिए एक अनिवार्यता है।

एकांत आगे लिखते हैं, 'वह नर्मदा की आंख हैं/ जल से भरी हुई/ जहां अनेक किश्तियां डूबने से बची हुई हैं।’ चिखल्दा में जहां पर वह अनशन पर बैठी हैं, वह स्थान जैसे एक ऊर्जा क्षेत्र में बदल गया है। सैकड़ों हजारों निमाड़वासी वहां पर आकर नई ऊर्जा पाते हैं और दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष में जुट जाते हैं। मध्यप्रदेश सरकार रोज नए लालच दे रही हैं। लेकिन पूरा निमाड़ इसके लालच में नहीं आया। इससे शासन व प्रशासन के वे तमाम दावे स्वमेव झूठे साबित हो गए कि पुनर्वास का कार्य पूरा हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला दोनों ही पक्षों पर बाध्यकारी है, परंतु शासन-प्रशासन तोड़-मरोड़कर उसकी व्याख्या कर रहा है। इसी को उजागर करने के लिए मेधा बहन और अन्य साथी आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनके सत्य के नाम से सारा तंत्र झुलस रहा है, इसीलिए वह उनसे आंख मिलाकर बात नहीं करना चाहता।

प्रदेश के मुखिया नगरपालिका चुनाव में व्यस्त हैं और देश के मुखिया गुजरात के राज्यसभा चुनाव में। गुजरात सरदार सरोवर बांध का जश्न मनाने को उत्सुक है जबकि पड़ोस के मध्यप्रदेश में 40,000 परिवार व 3 लाख मवेशी अपने मुकाम से बेदखल हो रहे हैं। क्या यह भारतीय लोकतंत्र की पहचान बनेगी? इस घटाटोप में भी उनमें कहीं से नैराश्य नहीं दिखता। वह और नर्मदा घाटी जानते हैं कि सत्य क्या है और वह किसकी ओर है। आज वे कदाचित पराजित नज़र आते हों, लेकिन वह सत्य की इस लड़ाई को जीत चुके हैं, क्योंकि बड़े बांधों की व्यर्थता को सारा विश्व स्वीकार कर चुका है। कविता की अंतिम पंक्तियां हैं, 'सत्ता के सीने में तनी हुई बंदूक है/धरती की मांग का/ दिप-दिप सिंदूर है मेधा पाटकर।’ हम भाग्यशाली हैं कि हमें गांधी के विचार की सर्वथा सिद्ध करने वाली इस असाधारण व्यक्तित्व का साथ मिला है।

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