निराशा को नींद मान बैठे हैं जगाने वाले!

कृष्ण प्रताप सिंह : अब तो कोई भी चुनाव हो, लोगों को अवधी के अपने वक्त के लोकप्रिय कवि रफीक सादानी की ये पक्तियां जरूर याद आती हैं। ...

देशबन्धु

 कृष्ण प्रताप सिंह
जब नगीचे चुनाव आवत है,
भात मांगौ, पोलाव आवत है।’

अब तो कोई भी चुनाव हो, लोगों को अवधी के अपने वक्त के लोकप्रिय कवि रफीक सादानी की ये पक्तियां जरूर याद आती हैं। यह और बात है कि जब से भूमंडलीकरण व्यापा है, देश प्रबंधन के तर्क से चलाया जाने लगा है, राजनीति में पैसे व पहुंच आदि के दूसरी तरह के सिक्के चलने लगे हैं और वोट मांगे नहीं, माहौल बनाकर या डील करके, लिए जाने लगे हैं, भात मांगने और पुलाव आने का यह सिलसिला टूट-सा गया है। शायद इसलिए कि अब मतदाता भी ‘बदल’ गये हैं। इस कदर कि कोई उन्हें चालाक कहे या अहसानफरामोश, कई बार वे पुलाव भी गटक जाते हैं और वोट भी नहीं देते।
आपको याद होगा, पिछले दिनों सम्पन्न हुए गोवा विधानसभा के चुनाव में प्रचार कर रहे एक पार्टी के सुप्रीमो ने, जो एक अन्य राज्य के मुख्यमंत्री भी हैं, मतदाताओं से खुल्लमखुल्ला अपील कर डाली थी कि उनकी प्रतिद्वंद्वी पार्टियां पैसे या प्रलोभन देने आएं तो मतदाता खुशी-खुशी ले लें, मगर वोट उन्हें न दें। चुनाव आयोग द्वारा इसे चुनाव की आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताकर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दे दिये जाने के बावजूद इन सुप्रीमो ने अपनी अपील को संशोधित करने से मना कर दिया और पूछते रहे कि वह ऐसा कैसे कह सकते हैं कि मतदाता उन्हीं पार्टियों को वोट दें, जो उन्हें प्रलोभन या पैसे दें।
बहरहाल, पोलाव न आने का गिला यह सोचकर कम किया जा सकता है कि पिज्जा, बर्गर, चाउमीन और हॉटडाग जैसे फास्टफूडों के जमाने में वैसे भी उसका पुराना क्रेज नहीं रह गया है। फिर ऐसा भी नहीं है कि पोलाव नहीं आता तो कुछ भी नहीं आता। अब चुनाव आते हैं तो मतदाताओं को जगाने वाले आ जाते हैं। कहते हुए-‘जागो, मतदाता जागो!’  हां, वे उन मतदाताओं को भी जगाते हैं, जो पिछली बार वोट देने के बाद से ही ‘दुखिया दास कबीर’ की तरह ‘जागै अरु रोवै’ की बीमारी से पीडि़त होते हैं। वैसे ही, जैसे उपभोक्तावाद के नाम पर उपभोक्ताओं को ठगने वाले नाना प्रकार के बहुराष्ट्रीय औजारों, कहना चाहिए हथियारों, की बेरोक-टोक ईजाद व इस्तेमाल के बीच एक सरकारी विभाग के विज्ञापनों की कैचलाइन है-‘जागो, ग्राहक जागो!’
बहुत संभव है कि जागे हुए मतदाताओं को जगाने में जी-जान लगाने वालेे महानुभावों की मूल प्रेरणा यह विज्ञापन ही हो और वे हमारे ‘लोकतंत्र’ द्वारा सजाये गये चुनाव के बा•ाार में उनको पार्टी या प्रत्याशी नामधारी दुकानों/दुकानदारों का ग्राहक मानकर ही उनसे यह सलूक करते हों। वरना इस बात की क्या तुक है कि जागे हुए मतदाता जिन्हें चुनकर भेजें, वे खुद तो, विपक्ष में हों या सरकार में। वैसे भी आज की राजनीति में विपक्ष जैसा कुछ बचा नहीं है। कुंभकर्ण बन जायें और नींद ही नींद में पांच साल गुजार दें, फिर चुनाव आयोग चुनाव का कार्यक्रम घोषित कर दें तो वे और उनके गुर्गे मूंछें  ऐंठकर घोषित करने लगें कि हम नहीं, मतदाता सोये हुए हैं। फिर उन्हें झिंझोडऩे और जगाने लग जायें।
चुनाव आयोग की सहमति या उसके कहने पर ही सही, इन सोये हुओं द्वारा जाग रहे लोगों को जगाने का यह तमाशा इन दिनों उत्तर प्रदेश में मंजर-ए-आम पर है। इसके लिए और तो और, अबोध स्कूली बच्चों तक का इस्तेमाल किया जा रहा है। उनकी रैलियां निकाली जा रही हैं और कहा जा रहा है उनमें कि वे जाएं, अपने सोये हुए बड़ों को जगाएं और उनको उनका मतदान का पवित्र कर्तव्य याद दिलायें। अब आप चाहें तो कहें कि कैसा जमाना आ गया है यह, जिसमें बच्चे बड़ों को जगा और कर्तव्य याद दिला रहे हैं। आपके इस ताज्जुब के लिए भी ढेर सारी गुंजाइश यहां है ही कि ये बच्चे इतने सयाने कब से हो गये? अभी कल तक तो इनकी मांएं कोई ऐसी सुबह नहीं जानती थीं, जब उन्हें जगाकर स्कूल भेजने में हलाकान होकर न रह गई हों! अभी तो बड़ों का फर्ज माना जाता था कि वे बच्चों की पीठ पर प्राय: लदे रहने वाले बस्तों का बोझ घटाने का कोई उपाय सोचें। यह क्या कि बस्ते के साथ उन पर बड़ों को जगाने और उनसे मतदान कराने का बोझ भी लादा जा रहा है? क्या वाकई अब इस देश में बच्चे बड़े ही पैदा होने लगे? किस टीवी चैनल का कमाल है यह?
जाहिर है कि बच्चों का यह इस्तेमाल किसी विडम्बना से कम नहीं है और इसे किसी भी तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता। ‘आज के बच्चे, कल के नागरिक’ वाले तर्क से भी नहीं। लेकिन क्या कीजिएगा, जैसे थैलीशाहों ने हमारे लोकतंत्र को अपने हिसाब से ढाल लिया है, मतदाताओं को जगाने वालों के पास कई ‘अनुकूलित तर्क’ हैं और जो तर्क अनुकूलित नहीं हो सकते, उनसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। आप उनसे कहें कि वे भी इस तथ्य की ज्यादा नहीं तो थोड़ी बहुत शर्म महसूस करें कि देश में लोकतंत्र कुछ लोगों द्वारा सारी उपलब्धियों को ऊपर ही ऊपर लोक लेने के तंत्र में बदलता जा रहा है तो वे चट कह देंगे कि इसका सारा जिम्मा उन नामुराद मतदाताओं का ही है, जो जागते नहीं और वोट देने पोलिंग बूथ तक नहीं जाते। अब यह बताना तो अनावश्यक ही है कि आजकल जो भी खुद को लोकतंत्र का सिपहसालार कहते हैं, उनमें ‘लोगों में जागरूकता की कमी’ वाले इसी तर्क की आड़ में शरण लेने का फैशन है। इसी तर्क का विस्तार करते हुए वे कहते हैं कि मतदान को मतदाताओं का अनिवार्य कर्तव्य बना देना चाहिए और वे इसका पालन न करें तो उन्हें दंडित करना चाहिए।
हम कहते हैं कि जरूर करना चाहिए, लेकिन वे यह भी तो बतायें कि तब मतदाताओं से झूठे-सच्चे वायदे करके न निभाने वाले दलों और विधायकों/सांसदों के साथ क्या सलूक करना चाहिए? और जिनको मतदाताओं की निराशा में भी उनकी नींद ही न•ार आती है, उनके मोतियाबिन्द का कौन-सा इलाज करना चाहिए? मतदाता बार-बार सरकारें उलट-पलटकर भी वांछित परिवर्तन को तरसते रहें और नेताओं के ‘छल, दंभ, द्वेष, पाखंड और झूठ’ से जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र व भाषा आदि के नाम पर बंटे-बिखरे रहते-रहते हतोत्साह हो जायें, तो क्या इसका ठीकरा भी उनके ही सिर पर फोड़ा जाना चाहिए?
उनकी जानकारी के लिए : अब तो सर्वोच्च न्यायालय ने भी कह दिया है कि अगर मतदाता वोट नहीं देते तो उनको सरकार को दोष देने और उससे सवाल करने का हक नहीं है। ऐसे में क्या यह ज्यादा अच्छा नहीं होगा कि मतदाताओं को जगाने का उपक्रम कर रहे लोग सरकारों के पास जाकर कहें कि जो वोट नहीं देते, उनकी छोड़ें, उन्हीं मतदाताओं के दोष देने व सवाल करने के अधिकार को सच्चे मन से मान्यता दे दें जो वोट देते हैं। इतने भर से ही लोगों में मतदान की ऐसी चाह उत्पन्न हो जायेगी कि मतदाता जागरुकता अभियानों की जरूरत ही नहीं रह जायेगी। क्योंकि तब मतदाता ‘कोउ नृप होहि हमैं का हानी’ कहने की हालत में नहीं रह जायेंगे। सवाल है कि क्या वे ऐसा कहने के लिए सरकारों के पास जायेंगे? जायेंगे तो तब, जब जगाते-जगाते खुद सो जाने की ट्रेजडी से बच पायेंगे। चुनाव हो जाने दीजिए, वे भी सोते हुए ही न•ार आयेंगे। हां, सोते हुए भी अपने स्वार्थों की पहरेदारी से बाज नहीं आयेंगे।


 

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