उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम : एक टिप्पणी

एल.एस. हरदेनिया : मैंइस बात से कतई सहमत नहीं हूं कि उत्तरप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत, पूरी तरह से उसकी हिन्दुत्व विचारधारा की जीत है। कुछ हद तक यह कहा जा सकता है ...

एल.एस. हरदेनिया

एल.एस. हरदेनिया
मैंइस बात से कतई सहमत नहीं हूं कि उत्तरप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जीत, पूरी तरह से उसकी हिन्दुत्व विचारधारा की जीत है। कुछ हद तक यह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व की अपील ने थोड़ा-बहुत असर किया है परंतु केवल उसे ही जीत का सम्पूर्ण श्रेय देना उचित प्रतीत नहीं होता है। यदि उत्तरप्रदेश की जनता हिन्दुत्व को ही वोट करती तो बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद भारतीय जनता पार्टी के हाथों में सत्ता सौंपती परंतु ऐसा नहीं हुआ और कल्याण सिंह, जिनके मुख्यमंत्रित्वकाल में बाबरी मस्जिद का ध्वंस किया गया था, के हाथ से सत्ता छिन गई। न सिर्फ उत्तरप्रदेश वरन बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद जिन भी राज्यों में चुनाव हुए वहां  भारतीय जनता पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा।  जैसे मध्यप्रदेश में 1993 में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस पुन: सत्ता में आ गई।
सच पूछा जाए तो उत्तरप्रदेश के मतदाताओं ने भ्रष्ट क्षेत्रीय पार्टियों को शिकस्त दी है। कारण यह है कि उत्तरप्रदेश के लोग पिछले कई वर्षों से लगभग अराजकता की स्थितियों में रह रहे थे। पिछले कुछ वर्षों में उत्तरप्रदेश में जातिवाद की ताकत में कई गुना इ•ााफा हुआ है। वहां कानून और व्यवस्था नाम की चीज बची ही नहीं थी। इस संदर्भ में मैं एक अनुभव सुनाना चाहूंगा। कुछ वर्षों पहले वाराणसी  स्टेशन पर मैं ट्रेन का इंत•ाार कर रहा था। उसी दरम्यान मैंने देखा कि एक युवक तेज गति से मोटरसाइकिल चलाते हुए प्लेटफार्म पर घुसा और जोर से हार्न बजाते हुए निकल गया। वहां पर पुलिस का एक सिपाही खड़ा हुआ था।  मैंने उससे कहा कि इस युवक को रोको। उसने मुझे जवाब दिया कि क्या आप वाराणसी के रहने वाले नहीं हैं? इस पर मैंने उससे पूछा कि मेरी इस मांग से वाराणसी में रहने और नहीं रहने का क्या संबंध है?  उसका उत्तर था कि हमारे उत्तरप्रदेश में तो ऐसा दिन-रात होता  रहता है और किसी उत्तरप्रदेश के निवासी को ऐसी हरकतों के विरोध में आपत्ति दर्ज करने का साहस तक नहीं होता है।  पंजाब के चुनाव में अकाली दल की हार के कुछ दिन पहले एक जाने-माने पुलिस अधिकारी केपीएस गिल ने एक लेख लिखा था। इस लेख में उन्होंने कहा था कि पंजाब में अकाली दल के विधायकों और पार्षदों की मर्जी के बिना न तो थानेदारों की नियुक्ति होती थी और न ही उनसे पूछे बिना थानों में एफआईआर लिखी जाती थी। अर्थात बिना अकाली दल की मर्जी के पंजाब में कुछ नहीं होता था।  इसी का खामियाजा अकाली दल को भुगतना पड़ा। लगभग वैसी ही स्थिति उत्तरप्रदेश में थी।
समाजवादी पार्टी के शासन में संपूर्ण सत्ता यादवों के हाथ में थी।  हर जगह यादवों का हस्तक्षेप था- चाहे थाना हो, कचहरी हो, स्कूल हों, कॉलेज हों, हर जगह यादवों का राज चलता था। न सिर्फ शासकीय काम में हस्तक्षेप होता था वरन भ्रष्टाचार भी वहां आकाश की ऊंचाईयां छूने लगा था। अखिलेश ने भले ही अपने मुख्यमंत्रित्व के आखरी समय में चीजों को ठीक करने का प्रयास किया परंतु वह संदेश नीचे तक नहीं पहुंच पाया और उसी दौरान समाजवादी पार्टी में ही यादवों का संघर्ष प्रारंभ हो गया, जिससे उबरने का मौका अखिलेश को नहीं मिला और एक अत्यधिक बिखरी अनुशासनहीन पार्टी की मशीनरी के सहारे उन्हें चुनाव लडऩा पड़ा। आखिर में उन्होंने कांग्रेस का सहारा भी लिया परंतु उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की प्रतिष्ठा तो पहले ही धूमिल हो चुकी थी। नतीजे में पिछली विधानसभा में कांग्रेस की 22 सीटें थीं जो घटकर इस चुनाव में सात रह गईं।
पिछले दिनों उत्तरप्रदेश में अनेक सांप्रदायिक दंगे हुए। अखलाक नाम के एक मुसलमान की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि यह संदेह  था कि उसके घर में गोमांस रखा हुआ है। इसी तरह, अनेक स्थानों पर छोटे-बड़े दंगों में भारी नुकसान हुआ, जानोमाल की हानि हुई परंतु समाजवादी पार्टी दंगा पीडि़तों को राहत नहीं दिला सकी, उनकी रक्षा नहीं कर सकी। एक जमाने में मुलायम सिंह को मौलाना मुलायम कहा जाता था अर्थात उन्हें मुसलमानों का सबसे बड़ा संरक्षक माना जाता था। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने पूरी ताकत से बाबरी मस्जिद का ध्वंस नहीं होने दिया। लोग उत्तरप्रदेश नहीं पहुंच पाएं इसलिए उन्होंने चंबल नदी के पुल पर दीवार खड़ी कर दी। आज वही मौलाना मुलायम सिंह मुसलमानों के रक्षक होने की अपनी छवि सदा के लिए खो चुके हैं। इसलिए मुसलमानों ने भी उनका साथ नहीं दिया, जैसी कि उनकी अपेक्षा थी। जहां तक मायावती का सवाल है मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी ब्राह्मणों, बनियों और क्षत्रियों को गाली देते नहीं थकती थीं परंतु उसी मायावती ने सत्ता में आने के लिए ब्राह्मणों, बनियों और क्षत्रियों का सहारा लिया और अपने मुख्यमंत्रित्व काल में दलितों की बुनियादी समस्याओं के प्रति कतई ध्यान नहीं दिया। इसलिए दलितों ने भी उन्हें लगभग नकार दिया। अभी इस चुनाव में मायावती ने भारी संख्या में मुसलमानों को उम्मीदवार बनाया परंतु उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ा।
मैंने बहुत पहले हिटलर की आत्मकथा ‘मीन केम्फ’ (मेरा संघर्ष) पढ़ी थी।  इस किताब की भूमिका में हिटलर लिखते हैं, ‘मैं जानता हूं कि लिखित शब्दों से लोगों के दिल को नहीं जीता जा सकता। जितना असर बोले हुए शब्द का होता है उतना असर लिखे शब्दों का नहीं होता। दुनिया के जितने बड़े आंदोलन हुए हैं उनमें जीत का श्रेय ऐसे लोगों को जाता है जिनकी वक्तृत्व कला पर असाधारण पकड़ हो, लेखकों को नहीं’। लगता है नरेन्द्र मोदी ने हिटलर की इस बात को आत्मसात किया और उन्होंने प्रभावशाली भाषण देने की कला सीख ली है। उनके भाषण बुद्धिजीवियों को प्रभावित नहीं करते परंतु उन तक अवश्य पहुंचते हैं जो रिक्शा चलाते हैं, सब्जियां बेचते हैं, जो रोज कमाकर खाते हैं। मोदी ऐसी भाषा में बोलते हैं कि इस तरह कि लोगों को समझ आए। आज हमारे देश में उनसे बेहतर प्रभावशाली भाषण देने वाला कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है। इसका भरपूर लाभ भाजपा भी ले रही है और वे स्वयं भी ले रहे हैं। चुनाव के पहले इस बात की पूरी संभावना थी कि वाराणसी के आसपास की छह सीटें भाजपा नहीं जीत पाएगी परंतु वाराणसी में लगातार तीन दिन रहकर और सभाएं करके उन्होंने तख्ता पलट दिया और सारी सीटें भाजपा के हाथों में आ गईं।
उत्तरप्रदेश में यह तस्वीर बनी थी कि वहां मुकाबला सांप्रदायिक भाजपा और धर्मनिरपेक्ष सपा-कांग्रेस  गठबंधन के बीच है। परंतु यहां यह स्मरण रखना आवश्यक है कि जो अपने को धर्मनिरपेक्ष मानते हैं, धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं उन्हें सांप्रदायिक व्यक्तियों से ज्यादा ईमानदार, सक्षम और परिश्रमी होना चाहिए। तभी वे सांप्रदायिक ताकतों को शिकस्त दे पाएंगे। परंतु हो इसके ठीक विपरीत रहा था। अनेक ऐसे नेता और संगठन, जो धर्मनिरपेक्षता के पैरोकार समझे जाते हैं वे भ्रष्टाचार, अक्षमता आदि के प्रतीक भी हैं।
हमारे देश की चुनाव प्रणाली में पोलिंग बूथ मैनेजमेंट का बहुत महत्व है। भाजपा ने इस पर  महारत हासिल कर ली है।  बताया गया है कि उत्तरप्रदेश में लोकसभा चुनाव के बाद से ही बूथ मैनेजमेंट की तैयारी प्रारंभ हो गई  थी और अमित शाह इसके प्रति विशेष ध्यान दे रहे थे। बताया गया है कि भाजपा ने 88,000 बूथ समितियां गठित की थीं और इन समितियों का अध्यक्ष ऐसे व्यक्तियों को बनाया गया था जिनकी भाजपा की विचारधारा में पूरी आस्था हो। इन समितियों के अध्यक्षों ने अपने साथ सैंकड़ों लोगों को जोड़ा। चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान इन समितियों ने पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम किया। इसकी तुलना में दूसरी पार्टियों का बूथ मैनेजमेंट कमजोर था। यह भी उनकी जीत का एक महत्वपूर्ण कारण है। फिर अनेक टिप्पणीकार और अनेक समाचारपत्र उत्तरप्रदेश की जीत का श्रेय अकेले नरेन्द्र मोदी को दे रहे हैं, जो मेरी दृष्टि में स्थिति का सही मूल्यांकन नहीं है।  नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता ने भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका तो अदा की है परंतु सिर्फ वही उत्तरप्रदेश की असाधारण विजय के लिए उत्तरदायी है, यह कहना ठीक नहीं होगा। यदि नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व से चुनाव का फैसला होना था तो पंजाब में अकाली दल और भाजपा के मोर्चे की हार नहीं होनी थी और इसी तरह गोवा और मणिपुर में भी उसे उतना ही बहुमत मिलना था जितना उत्तरप्रदेश में मिला।  यह कहा जा सकता है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा ने नरेन्द्र मोदी की वक्तृत्व कला और लोकप्रियता का भरसक उपयोग किया और उसके कारण भी उसे भारी जीत हासिल हो सकी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं)


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