व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए बड़ा फैसला

नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दिशा में गुरुवार 6 सितम्बर को भारत में एक बड़ा कदम उठाया गया

Supreme court
देशबन्धु
Updated on : 2018-09-07 05:23:15

नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दिशा में गुरुवार 6 सितम्बर को भारत में एक बड़ा कदम उठाया गया। सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार को अपने ऐतिहासिक फैसले में आईपीसी की धारा 377 के उस प्रावधान को रद्द कर दिया, जिसके तहत बालिगों के बीच सहमति से समलैंगिक संबंध भी अपराध था। सीजेआई दीपक मिश्रा ने अपने फैसले में कहा कि व्यक्तिगत पसंद को इजाजत दी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन बताया। कोर्ट ने कहा कि सबको समान अधिकार सुनिश्चित करने की जरूरत है। समाज को पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहिए। संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवर्तन जरूरी है।

जीवन का अधिकार मानवीय अधिकार है। इस अधिकार के बिना बाकी अधिकार औचित्यहीन हैं। कोर्ट ने सहमति से बालिगों के समलैंगिक संबंध हानिकारक नहीं मानते हुए, आईपीसी की धारा 377 को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मौजूदा रूप में सही नहीं बताया। इतना ही नहीं जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने तो अपने फैसले में कहा कि इतने सालों से समान अधिकार से वंचित किए जाने को लेकर समाज को एलजीबीटी समुदाय के सदस्यों और उनके परिजनों से माफी मांगनी चाहिए। आपको बता दें कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के मुताबिक कोई किसी पुरुष, स्त्री या पशुओं से प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध संबंध बनाता है तो यह अपराध होगा। इस अपराध के लिए उसे उम्रकैद या 10 साल तक की कैद के साथ आर्थिक दंड का भागी होना पड़ेगा। इस धारा 377 के खिलाफ पहली बार गैर सरकारी संगठन 'नाज फाउंडेशन' ने आवाज उठाई थी। इस संगठन ने 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी और अदालत ने समान लिंग के दो वयस्कों के बीच यौन संबंधों को अपराध घोषित करने वाले प्रावधान को गैरकानूनी बताया था। 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले को निरस्त कर दिया था। लेकिन अब एक बार फिर उसने अपने ही फैसले को पलटते हुए व्यक्तिगत पसंद और समान अधिकार को तरजीह देने वाला निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि भारत ने एलजीबीटी अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय संधियों पर दस्तखत किए हैं और उसके लिए इन संधियों के प्रति प्रतिबद्ध रहना जरूरी है।

यूं तो इस समुदाय की आधिकारिक गिनती जनगणना में नहीं है, लेकिन 2012 में सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था कि भारत में एलजीबीटी आबादी तकरीबन 2.5 मिलियन यानी 25 लाख है। सवा सौ करोड़ की आबादी में यह संख्या बेहद मामूली है। लेकिन सिर्फ इसलिए इनके अधिकारों की उपेक्षा नहीं हो सकती कि ये बहुत सीमित लोग हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यही प्रतिध्वनित होता है कि उसने तमाम बातों से ऊपर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को रखा है. जिसके लिए आज स्थान बहुत सीमित होता जा रहा है। एलजीबीटी समुदाय को छोड़ दें तब भी सामान्य जनों के लिए भी बहुत से नियम-कायदे नैतिकता के ठेकेदारों ने तय कर दिए हैं। हम कहां जाएं, कहां न जाएं, क्या खाएं, कैसे कपड़े पहने, लड़कियां हैं तो जोर से न हंसे और लड़के हैं तो सबके सामने आंसू न बहाएं, ऐसे कई अजीबोगरीब फरमान समाज में बरसों से चले आ रहे हैं और इन्हें न मानने वाले को अक्सर दंडित या प्रताड़ित होना पड़ता है।

रूढ़िवादिता के कारण न समलैंगिकता को माना गया, न लैंगिक समानता को। सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग भी लैंगिक समानता की धज्जियां उड़ाते नजर आ जाते हैं। हाल में मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के भाजपा विधायकों ने ऐसे बयान दिए हैं। मध्यप्रदेश में शिक्षा मंत्री ने कहा कि गुरु के लिए ताली नहीं बजाओगे, तो अगले जनम में घर-घर ताली बजाना पड़ेगा, यानी उनका इशारा किन्नरों की ओर था। और महाराष्ट्र में विधायक राम कदम ने दही हांडी के कार्यक्रम में उपस्थित लड़कों से कहा कि कोई लड़की तुम्हारा प्रस्ताव ठुकराए तो हम उसे उठवा लेंगे। जब जनप्रतिनिधि इस तरह की सोच रखेंगे और ऐसी भाषा का इस्तेमाल करेंगे तो नागरिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत आजादी और पसंद खतरे में पड़ेगी ही। जस्टिस मल्होत्रा ने समाज को माफी मांगने वाली जो टिप्पणी की है, वह संकुचित सोच वालों के लिए सबक है। उम्मीद की जाना चाहिए कि एलजीबीटी पर सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला है, समाज और देश उसे व्यापक संदर्भों में समझेगा और नैतिकता की ठेकेदारी बंद होगी।

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