सफाई कर्मचारियों की जिंदगी

स्वर्ण सिंह, दीपू, अनिल, बलविंदर ने अपना जीवन गंदगी में ही शुरु किया था, गंदगी साफ करते हुए ही बिताया और आखिर में उनकी मौत भी उसी गंदगी में हो गई...

देशबन्धु
सफाई कर्मचारियों की जिंदगी
Cleaning staff
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स्वर्ण सिंह, दीपू, अनिल, बलविंदर ने अपना जीवन गंदगी में ही शुरु किया था, गंदगी साफ करते हुए ही बिताया और आखिर में उनकी मौत भी उसी गंदगी में हो गई। स्वर्ण सिंह का बेटा जसपाल मौत के मुंह से बच निकला, लेकिन गंदगी के कहर से कब तक बचा रहेगा, किसे मालूम। राष्ट्रपति चुनाव, चीन को सबक सिखाने, पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने, अमरनाथ यात्रा की खबरों में मशगूल देश के अधिकतर लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि यहां किसकी मौत की बात हो रही है। इतने बड़े देश में लोग आए दिन मरते रहते हैं। कोई स्वाभाविक तौर पर मरता है, कोई दुर्घटना में मारा जाता है। सरहद पर मौत हुई तो शहीद कहलाते हैं।

लेकिन उन मौतों को किस श्रेणी में रखा जाए, जो गंदगी साफ करते हुए होती है? इसे प्राकृतिक तो नहींकहा जा सकता। देशसेवा तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि जो मरे, वे कोई स्वच्छता अभियान के सिपाही तो थे नहीं, वे तो मामूली सफाई कर्मचारी थे ! इसे कुछ लोग दुर्घटना की कोटि में रख सकते हैं। लेकिन तब तो दुर्घटना के लिए जिम्मेदार वह होगा, जिसने लापरवाही बरती हो। भारत में ऐसी लापरवाही आम बात हो गई है, क्योंकि सफाई कर्मचारियों की जिंदगी और मौत जिस बजबजाती गंदगी के बीच घटती है, उस ओर बहुत से लोग नाक-भौं सिकोड़कर भी देख नहीं पाते।

देश की राजधानी दिल्ली के दक्षिण में घिटोरनी इलाके में एक हार्वेस्टिंग टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने से उपरोक्त चार सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक पांच कर्मचारी इलाके में टैंक की सफाई करने के लिए नीचे उतरे, टैंक के भीतर वे सभी जहरीली गैस की चपेट में आ गए, जो उनकी मौत का कारण बनी। भारत में इस तरह की मौतें पहले भी बहुत बार हुई हैं। पिछले साल ही बेंगलुरू में गटर की सफाई करते हुए दम घुटने से दो सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई थी, उसके कुछ वक्त पहले मुंबई में नाले की सफाई के दौरान ऐसे ही दो कर्मचारियों की मौत हो गई थी।

सफाई कर्मचारियों के संगठनों का कहना है कि दर्जनों सफाई कर्मचारी सुरक्षा उपकरणों के अभाव में अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। अफसोस इस बात का है कि इन लोगों के जीवन से आम समाज को कोई मतलब नहीं रहता और इनकी मौत से भी किसी के चेहरे पर शिकन नहीं पड़ती। जबकि ये सफाई कर्मचारी अगर एक दिन भी अपना काम छोड़ दें तो सारे समाज की त्यौरी चढ़ जाती है। पिछले साल दिल्ली नगर निगम के सफाई कर्मचारियों ने वेतन की मांग पर कुुछ दिनों तक हड़ताल की थी, तो सारा शहर कूड़े के ढेर में तब्दील हो रहा था। किसी तरह उनकी हड़ताल खत्म हुई और वे काम पर लौटे तो शानदार रिहाइशों में रहने वालों को राहत मिली। लेकिन उसके बाद समाज का वही आत्मकेन्द्रित रवैया सामने आ गया।


सफाई कर्मचारी चुपचाप अपना काम करते रहें, किसी किस्म की मांग या शिकायत न करें, यही ऊंचे तबके के लोगों को पसंद आता है। अभी मध्यप्रदेश के रायसेन में सफाई कर्मचारी चरणबद्ध आंदोलन कर रहे हैं। हो सकता है देश के अन्य इलाकों में भी वेतन वृद्धि, नौकरी में नियमितीकरण आदि को लेकर सफाई कर्मचारियों को शिकायतें होंगी, जिनका निराकरण करना चाहिए। लेकिन इनके साथ-साथ उनके काम करने की परिस्थितियों को बेहतर बनाने की जो कोशिशें होनी चाहिए, भारत में वे लगभग शून्य हैं। दिल्ली में हुई इन चार मौतों से मेनहोल, सीवर और सेफ्टी टैंक सफाई के दौरान सुरक्षा के सवाल एक बार फिर ज्वलंत हो उठे हैं।

सफाई कर्मचारियों के हितों के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग का गठन किया है। आयोग के सेक्रेटरी नारायन दास का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार मेनहोल, सेफ्टी टैंक, सीवर या फिर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग पिट्स की सफाई का काम करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराना जरूरी है। उन्हें इन कार्यों को करने के लिए ऑक्सीजन मास्क, गम-बूट्स, हाथों में पहनने के वॉटरप्रूफ दस्ताने ऑर वॉटरप्रूफ वर्दी उपलब्ध कराना जरूरी है। सुरक्षा उपकरणों के बिना सफाई कर्मचारियों को मेनहोल में उतारना अपराध है और इसके लिए संबंधित कर्मचारियों पर कार्रवाई हो सकती है। नारायण दास के मुताबिक बिना सुरक्षा उपकरणों के मेनहोल या सेफ्टी टैंक सफाई के दौरान किसी कर्मचारी की मौत होती है, तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार उनके परिजनों को 10 लाख रुपये हर्जाना देना पड़ता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में एमसीडी अफसर ऐसा नहीं करते।

हादसे के बाद वे दोष इन कर्मचारियों पर या ठेकेदार पर डाल देते हैं, ताकि हर्जाने से बचा जा सके। इस बयान से यह साफ समझा जा सकता है कि सफाई कर्मचारियों की कार्य करने की परिस्थितियां भारी लापरवाही का शिकार होती हैं, साथ ही सफाई कर्मचारियों को अपने हकों की पूरी जानकारी भी नहीं रहती है, जिसका फायदा अधिकारी या ठेकेदार उठाते हैं। दुनिया के कई देशों में टैंकों या सीवरों में नीचे उतर कर, अथवा हाथ से सफाई की व्यवस्था खत्म हो चुकी है। कई देशों में सफाई कर्मचारियों के बजाय सीवर इंस्पेक्शन कैमरे और टूल्स से सफाई की जाती है। मेनहोल ब्लॉकेज के दौरान सीवर इंस्पेक्शन कैमरे को मेनहोल में उतारा जाता है, ताकि यह पता चल सके कि मेनहोल में कितनी दूरी पर ब्लॉकेज है। उसी दूरी के हिसाब से सफाई उपकरणों से ब्लॉकेज को दूर किया जाता है। यह बेहद आसान प्रक्रिया है, लेकिन इसमें पैसे अधिक खर्च होते हैं, शायद इसी वजह से भारत के नगरीय निकायों में इसे नहींअपनाया जा रहा है। अब यह विचारणीय है कि लोगों की जिंदगी की कीमत अधिक है या सफाई की नयी प्रणालियों को अपनाने की।

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