हेग में जीत पर मोदी का मंगलगान !

हरीश साल्वे जब बहस में तमाम तथ्यों को प्रस्तुत कर रहे थे, उसमें मोदी की लीडरशिप क्या कर रही थी? पाकिस्तान इसी अंतरराष्ट्रीय अदालत में 21 जून 2000 को भारत से मुंह की खा चुका है। ...

हेग में जीत पर मोदी का मंगलगान !
हाइलाइट्स
  • पियानो बजाने के शौकीन हरीश साल्वे राजनीति की नई धुन का मजा ले रहे हैं।
  • बड़बोले नेता सुब्रमण्यम स्वामी बघार रहे थे, 'पाकिस्तान नहीं माना तो हमारे पास सैन्य विकल्प हैं।’ पता नहीं डॉ. स्वामी जैसे लोग किस कल्पना लोक में विचरण करने लगते हैं!

पुष्परंजन

गुरुवार को अचानक से गुरुघंटाल चैनलों ने पैंतरा बदला। हेग में पाकिस्तान के पराभव को मोदी के पराक्रम से जोड़ने की जबरदस्त प्रतिस्पर्धा शुरू हुई। अंग्रेज़ी के एक चिल्ला-चिल्ली चैनल की हिडिंबानुमा एंकरनी ने बड़ा सा मुंह खोला- ‘लीगल मिसाइल ऑफ मोदी अगेंस्ट पाकिस्तान!’अपने देश में वीर रस के कवियों और पटकथा लेखकों की ऐसी बिरादरी का प्रादुर्भाव हुआ है, जिन्होंने हर जीत के लिए मोदी का मंगलाचरण करना जरूरी समझ लिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता तक इस विषय पर बुलाये प्रेस ब्रीफिंग में, 'अंडर द लीडरशिप ऑफ मोदी’के गणेशपूजन से बात आरंभ करते हैं। अब कोई पूछे कि हरीश साल्वे जब बहस में तमाम तथ्यों को प्रस्तुत कर रहे थे, उसमें पीएम मोदी की लीडरशिप क्या कर रही थी?

पाकिस्तान इसी अंतरराष्ट्रीय अदालत में 21 जून 2000 को भारत से मुंह की खा चुका है। मगर, उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जय जयकार नहीं हुई थी। 10 अगस्त 1999 को गुजरात के कच्छ में 16 पाक नौसैनिक मारे गये थे। इस्लामाबाद ने छह करोड़ डॉलर के डैमेज के साथ दावा किया कि मार गिराया गया विमान, पाक सीमा में उड़ रहा था। चार दिन की बहस के बाद, 21 जून 2000 को हेग की इसी अदालत में 16 जजों की बेंच में से 14 ने फैसला दिया था कि यह केस सुनवाई के लायक नहीं है, चुनांचे इसे खारिज़ किया जाता है।

पियानो बजाने के शौकीन हरीश साल्वे राजनीति की नई धुन का मजा ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय 'मित्रों’ ने, 'हरीश साल्वे हमारे हैं’ का अभियान छेड़ रखा है। मगर, उन्हें बिलकिस बानो केस का हालिया फैसला याद नहीं, जिसमें हरीश साल्वे पीड़िता के अमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) रह चुके हैं। कायदे से ढोल तो कांग्रेस को पीटना चाहिए था, क्योंकि हरीश साल्वे कांग्रेस के रसूखदार नेता एनकेपी साल्वे के बेटे हैं, जो पहली अप्रैल 2012 को दिवंगत हो चुके थे। मात्र एक रुपया फीस लेने वाले हरीश साल्वे इस देश के सर्वाधिक महंगे वकीलों में से एक हैं, जिनकी एक दिन के वास्ते अदालत में बहस के लिए उतरने की फीस तीस लाख रुपये हैं। हरीश साल्वे सलमान खान का 'हिट एंड रन केसके वकील रहे हैं। मुलायम सिंह यादव, ललित मोदी से लेकर मुकेश अंबानी तक का केस लड़ चुके हैं। हरीश साल्वे ने कुलभूषण जाधव का केस देश के वास्ते लड़ा है, और एक रुपया फीस लेकर वकील बिरादरी को संदेश दिया है वे भी साल में एकाध केस इतनी ही राशि लेकर लड़ें।

हरीश साल्वे के बरक्स जिस वकील खावर कुरैशी को पाकिस्तान ने हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय अदालत (आईसीजे) में उतारा था, उनकी काबिलियत पर सवाल उठना शुरू हो गया है। लंदन स्थित पाकिस्तानी वकील खावर कुरैशी कॉरपोरेट मामलों के वकील हैं, और हेग में केस लड़ने के वास्ते करोड़ों रुपये का बिल पाकिस्तान सरकार को भेज चुके हैं। पाकिस्तान के अवकाश प्राप्त जज शाइकउस्मानी ने कहा कि यह केस ही गलत तरीके से लड़ा गया। अगर, 'आईसीजे’के अधिकार क्षेत्र से बाहर का यह मामला था, तो खावर कुरैशी को बहस के लिए उतरने की जरूरत क्या थी? लंदन में रह रहे बैरिस्टर राशिद असलम पाकिस्तान की रणनीति से काफी खफा हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी वकील खावर कुरैशी ने 40 मिनट का समय जाया किया है। अंतरराष्ट्रीय अदालत (आईसीजे) ने दोनों पक्षों को डेढ़-डेढ़ घंटे का समय दिया था।

बैरिस्टर राशिद असलम ने कहा, 'मुझे तो हैरानी है कि हमारे वकील खावर कुरैशी ने समय का पूरा इस्तेमाल नहीं करके, पचास मिनट में ही बात समाप्त कर दी थी।’ बैरिस्टर असलम ने कहा, 'मेरे ख्याल से इस केस को सही ढंग से पेश ही नहीं किया गया। यदि एक नागरिक पकड़ा जाता है तो उसके समर्थन में विएना कन्वेंशन का अनुच्छेद 5-बी आयद होता है, मगर एक जासूस के मामले में मानवाधिकार का मामला बनता ही नहीं है। पाकिस्तान को आईसीजे में जज की तैनाती का अधिकार था, अफसोस कि उस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया गया।’

पाकिस्तान के पूर्व अटार्नी जनरल इरफान कादिर इस बात से नाराज हैं कि नौसीखियों के हाथ में इस केस को सौंपा गया था। इरफान कादिर कहते हैं, 'जिस खावर कुरैशी को बहस के वास्ते उतारा गया था, उसे क्रिमिनल जस्टिस जैसे विषय का अनुभव ही नहीं है। न ही कुरैशी ने कभी यूके सुप्रीम कोर्ट, या हेग की अदालत में केस लड़ा है। उसकी दलीलों में कोई दम नहीं था। नातजुर्बेकार लीगल टीम के पास तैयारी नहीं थी। पाकिस्तानी न्यायशास्त्र की धज्जियां ऐसे ही लोगों की वजह से उड़ रही है। हमें एक ऐसे समर्पित टीम की जरूरत थी, जो मुल्क के लिए पूरी निष्ठा से उतरती।’

बैरिस्टर डॉ. फारोग ए. नसीम ने कहा कि पाकिस्तान को आईसीजे के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार ही नहीं करना चाहिए था। 17 साल पहले कश्मीर के इश्यू पर भारत ने सुनवाई की सहमति नहीं दी थी, और अंतरराष्ट्रीय अदालत को सुनवाई से पीछे हटना पड़ा, जाधव के मामले में ऐसा हम भी कर सकते थे। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की नेता शेरी रहमान ने कहा कि खावर कुरैशी अंतरराष्ट्रीय अदालत के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देकर ही केस को दूसरी दिशा में ले गये। हमारे वकील को जासूसी वाले आरोप के गिर्द बहस को रखनी चाहिए थी।


 ऐसे बयानों का क्या अर्थ निकालें कि नवाज शरीफ ने जानबूझ कर यह केस हार जाने दिया? नवाज शरीफ और उनके इशारे पर तैनात यह लीगल टीम विवाद के घेरे में फंसती नज़र आ रही है। प्रश्न यह है कि आईसीजे के अध्यक्ष रोनी अब्राहम समेत 11 जजों की जिस टीम ने एक मत से फैसला दिया, उसमें पाकिस्तान के 'ऑल वेदर फ्रेंड’ चीन ने मदद क्यों नहीं की? चीन की ओर से अंतरराष्ट्रीय अदालत में जज श्वे हानछिन पाकिस्तान के पक्ष में अपना अलग मत दे सकते थे। बल्कि, आईसीजे में रूसी न्यायाधीश किरिल जेर्वोजियन चीन की हां में हां मिला सकते थे। मगर, न्याय के मंदिर में बैठे लोग कहीं न कहीं मर्यादा का ख्याल रखते हैं, ऐसा हेग में भी देखा गया।

अंतरराष्ट्रीय अदालत (आईसीजे) की पन्द्रह सदस्यीय ज्यूरी में भारतीय जज दलवीर भंडारी अप्रैल 2012 से हैं। जस्टिस भंडारी ने जाधव सुनवाई के इस पूरे समय खुद को 'लो प्रोफाइल’ में रखा था, ताकि कोई ये न कहे कि भारत ने फैसले को प्रभावित करने के लिए अपने जज के माध्यम से लॉबी की थी। हमारी जगह पाकिस्तान होता तो ऐसी अदालती मर्यादा का पालन शायद नहीं करता। अब तक, पाकिस्तान ने सिर्फ एक ही जज मोहम्मद जफरूल्ला खान को हेग में तैनाती का अवसर दिया है। जज जफरूल्ला खान 1954 से 1961 और फिर 1970 से 73 तक आईसीजे में अपनी सेवाएं दीं। जबकि भारत की ओर से बीएन राव, जस्टिस नागेंद्र सिंह, रघुनंदन स्वरूप पाठक जज रह चुके हैं, और वर्तमान में न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी अंतरराष्ट्रीय अदालत में योगदान दे रहे हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय जजों की साख साबित होती है

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नवाज़ शरीफ अब नये चक्रव्यूह में घिरे नज़र आ रहे हैं। विपक्ष उनसे पूछ रहा है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी से कोई सीक्रेट डील हुई है? 27 अप्रैल 2017 को स्टील उद्योगपति सज्जन जिंदल से नवाज़ शरीफ की मुलाकात और हिल स्टेशन मर्री में सेनाध्यक्ष बाजवा से जिंदल की बातचीत का पूरा ब्योरा अब पाकिस्तान का विपक्ष मांग रहा है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की उपाध्यक्ष शेरी रहमान ने आरोप लगाया कि यह पूरा 'गेम प्लान’ सज्जन जिंदल की सीक्रेट यात्रा के बाद से ही शुरू हुआ है। शेरी रहमान ने कहा कि जाधव का मामला 10 मई से पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी उठाया जा सकता था। मगर उसे जानबूझकर दायें-बायें किया गया। पीएमएल-क्यू के सांसद कामिल अली आगा ने इसे बड़ी कूटनीतिक हार करार दिया है, और उसका ठीकरा नवाज़ शरीफ पर फोड़ा है। सांसद कामिल अली आगा ने कहा कि हेग का यह सारा ड्रामा सज्जन जिंदल से मुलाकात के बाद रचा गया

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 ड्रामा ही सही, पर इसका फौरी फायदा भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हो रहा है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। अभी तीन दिन पहले तक विदेश मंत्रालय के गलियारे में मायूसी थी कि चीन किस तरह भारत के छह पड़ोसी मुल्कों को 'वन बेल्ट वन रोड’(ओबीओआर) परियोजना को आगे बढ़ाने के वास्ते भरोसे में ले चुका है। पेइचिंग में दो दिन के सम्मेलन में 29 शासन प्रमुखों, और 130 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों की शिरकत के बाद चीन वन वेल्ट वन रोड (ओबीओआर) प्रयासों को एक बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में देख रहा था। 16 मई को सम्मेलन के समापन से पहले भारत के छह पड़ोसी देशों ने अधोसंरचना से संबंधित 20 समझौतों पर हस्ताक्षर किये, यह मोदी के लिए मायूसी का सबब था। हेग के फैसले से मोदी सरकार को अपनी विदेश नीति के गुणगान का अवसर मिल गया, इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता।

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मगर, कुलभूषण जाधव का होगा क्या? नवाज़ शरीफ और पाक सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा जिस तरह के दबाव में है, उससे लगता नहीं कि वह हेग के फैसले और अदालती निर्देशों का अनुपालन करेंगे। कुछ इसी तरह का आदेश 1999 में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने अमेरिका को दिया था। बावजूद इसके, लूट और हत्या आरोपी दो जर्मन भाइयों वाल्टर और कार्ल लाग्रांड को अमेरिका के आरिजोना प्रांत में 24 फरवरी 1999 को फांसी दे दी गई। ऐसे और उदाहरण हैं, जिसमें हेग के आदेशों की अवहेलना हुई है। परसों, बड़बोले नेता सुब्रमण्यम स्वामी बघार रहे थे, 'पाकिस्तान नहीं माना तो हमारे पास सैन्य विकल्प हैं। पता नहीं डॉ. स्वामी जैसे लोग किस कल्पना लोक में विचरण करने लगते हैं!

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