बस देश को बना दिया 'सेल्फीस्तान’

सेल्फी से मौत के मामले में भारत पूरी दुनियां में टॉप पर है। पाकिस्तान दूसरे, और अमेरिका तीसरे नंबर पर है...

पुष्परंजन
बस देश को बना दिया
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सेल्फी से मौत के मामले में भारत पूरी दुनियां में टॉप पर है। पाकिस्तान दूसरे, और अमेरिका तीसरे नंबर पर है। सेल्फी के लिए, सरकार को कुछ नहीं करना पड़ा, बस मोदी जी को 'सेल्फीयातेदेखा, और पूरा देश नकल के इस महा मैराथन में शामिल हो गया। 3 अक्टूबर 2014 से प्रधानमंत्री मोदी 'मन की बातके ज़रिये निरंतर प्रवचन देते रहे हैं। मगर, क्या आपने किसी 'एपिसोडमें प्रधानमंत्री मोदी द्वारा यह कहते सुना कि जोखिम वाली जगहों पर देशवासी सेल्फी लेने की आदत को कृपया बंद करें।

बाज़ दफा हम देखते हैं कि दुर्घटना में घायल तड़प रहा है, कुछ लोग सेल्फी बनाने में लगे रहते हैं। गौरक्षकों की पिटाई से बजाय बेकसूर को बचाने के, देश के वीर जवान दे-दनादन सेल्फी बनाने में लगे हुए दिख जाते हैं। होटल में पित्ज़ा कुतर रहे हैं तो सेल्फी, मंदिर में भगवान की पूजा की थाली एक हाथ में है, दूसरा हाथ सेल्फी बना रहा होता है। स्मार्ट फोन बेच रही कंपनियों को नहीं चाहिए कि 'सेल्फी दुर्घटनाओंको लेकर चेतावनी जारी करें?

 

पिछले साल जून में महाबलीपुरम पहुंचने के बाद मेरे लिए जिज्ञासा और कौतुहल का विषय दो ऐसे मंदिर थे, जो समंदर में गर्क हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वैज्ञानिक जी. तिरूमूर्ति ने निष्कर्ष दिया था कि 13वीं सदी में आई एक सुनामी के समय पल्लव राजाओं द्वारा निर्मित यह मंदिर और उसके आसपास की बसावट समुद्र में समा गयी। उसके गिर्द वोट से चक्कर लगाइये, तो समंदर में गर्क मंदिरों के बुर्ज दिखते हैं। सातवीं सदी के इस अलौकिक दृश्य को देखने के लोभ में मैं वोट पर सवार हो गया। वोट वाले ने सुनिश्चित कर रखा था कि नौका पर सवार सभी नौ लोगों को 'लाइफ जैकेट’ मिल जाएंगे। मगर, बीच समंदर में जाने के बाद पता चला कि उसने सबको धोखे में रखा था, 'लाइफ जैकेट’ दो ही थे। खैर, हमारी नौका समंदर में समा चुके उस मंदिर के चारों ओर चक्कर लगाने लगी, और हमारे साथ 18 से 25 साल के जो नौजवान थे, खड़े होकर सेल्फी बनाने लगे। लहरों में हमारी नाव पत्ते की तरह कांप रही थी, और हममें से दो-तीन लोग कलेजा थामे इस एडवेंचर को देख रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया, उन युवाओं को इस सेल्फी सरकस के लिए डांटना शुरू किया, और वोट वाले को किनारे ले चलने को कहा। खैर, उन्हें होश आया कि वे कर क्या रहे थे। हम किनारे आ गये, और उस दिन हमारी जलसमाधि होते-होते रह गई।

अभी पांच दिन पहले नागपुर में आठ युवाओं की जलसमाधि सेल्फी के कारण हुई है। रविवार का दिन था। वोट पर सवार ये युवा वेना डैम पर मस्ती कर रहे थे। फिर, सेल्फी के जरिये फेसबुक पर लाइव शो दिखाने में लग गये, यह उनकी अंतिम जोखिम भरी यात्रा थी। ये जीवनभर के लिए उन्हें दुख दे गये, जिनके अरमान उनसे जुड़े थे। इस घटना से कोई चालीस दिन पहले, 1 मई को खबर आई थी कि पुणे के पास उजानी डैम में एक नाव पलट गई, जिस पर सवार चार डॉक्टरों की डूबने से मौत हो गई। ये लोग भी सेल्फी बना रहे थे, बैलेंस बिगड़ा और वोट पलट गई। नौका पर सवार बाकी पांच डॉक्टर और नाविक तैरकर निकल आये, मगर ये अपने चार साथियों को नहीं बचा पाये। इसी के प्रकारांतर, पुणे के पास लोनावाला के पवाना डैम पर दो युवा सेल्फी बनाते हुए उसकी धारा में समा गये। इस तरह की घटनाएं, हमारे लिए सिर्फ खबर बनकर रह गई हैं, इससे हम सबक नहीं लेते।

यह सर्वेक्षण का विषय है कि देश भर के कितने बांध, पुल, ताल-तलैयों के आगे चेतावनी वाले बोर्ड लगे हैं। और ऐसी जोखिम वाली जगहों की निगरानी में कितने लोग लगे होते हैं। दो-तीन दशक पहले हम सब देखा करते थे कि पुल और रेलवे स्टेशनों पर 'तस्वीर लेना मना है’, के बोर्ड लगे होते थे। उसकी वजह किसी आतंकी वारदात करने वालों से उस जगह की हिफाजत करनी होती थी। अब वैसे बोर्ड भी जंग लग के 'सरकारी ज़िम्मेदारी’ की तरह झड़-गल गये। जापान के रेलवे स्टेशनों पर, जोखिम वाली जगहों पर ऐसे स्टीकर दिखते हैं, जहां सेल्फी न लेने की चेतावनी लिखी होती है। अमेरिका और यूरोपीय देशों में भी सेल्फी संबंधी चेतावनी के बोर्ड, स्टीकर दिखते हैं। रूस में 'सेल्फ सेल्फी कैंपेन’ जुलाई 2015 में लांच किया गया था, जिसका मकसद सेल्फी लेते समय ऊटपटांग हरकतों को रोकना था।

मगर, भारत में जब तक सेल्फी दुर्घटनाओं से कुछ सौ लोग मर न जाएं, कोई जांच समिति सिफारिश न कर दे, संसद के प्रश्नकाल में सवाल न पूछे जाएं, तब तक ऐसी चेतावनी वाली चिप्पी चस्पां करने की आवश्यकता सरकार महसूस नहीं करती। यों, 20 जून को मुरादाबाद रेलवे स्टेशन पर एक चेतावनी को देखकर लोगों को अच्छा लगा जिसमें लिखा गया था कि जो लोग यहां सेल्फी लेते पाये गये, उन्हें तीन साल की जेल होगी। काश! पूरे देश के रेलवे स्टेशनों व अन्य जोखिम वाली जगहों पर ऐसी चेतावनी, और उस पर अमल करने के अभियान को सरकार आरंभ कर पाती।


इसके उलट, 'सेल्फी’ इस देश का नया तराना जैसा नमूदार हुआ है। सेल्फी को प्रधानमंत्री मोदी ने जबसे पसंद किया, पूरे मुल्क में बच्चे से लेकर बूढ़ों तक की 'राइट च्वाइस बेबी’ बन गई। या, यों कहें कि शपथ के बाद मोदी के हिन्दुस्तान को 'सेल्फीस्तान’ बनने में ज़्यादा देर नहीं लगी। जबकि स्वच्छ भारत अभियान को अपनाने के वास्ते सरकार को कितने करोड़ फूंकने पड़ रहे हैं। शिल्पा शेट्टी गंदगी फैलाने वालों को टीवी पर हड़का रही हैं। सदी के महानायक तक की सांस फूलने लगी, मगर कूड़ा पसंद लोग सुधरे नहीं। सेल्फी के लिए, सरकार को कुछ नहीं करना पड़ा, बस मोदी जी को 'सेल्फीयाते’ देखा, और पूरा देश नकल के इस महा मैराथन में शामिल हो गया।

3 अक्टूबर 2014 से प्रधानमंत्री मोदी 'मन की बात’ के ज़रिये निरंतर प्रवचन देते रहे हैं। मगर, क्या आपने किसी 'एपिसोडमें प्रधानमंत्री मोदी द्वारा यह कहते सुना कि जोखिम वाली जगहों पर देशवासी सेल्फी लेने की आदत को कृपया बंद करें। प्रधानमंत्री, इस तरह की अपील करें भी तो कैसे? 2014, मोदी जी की शपथ का यादगार साल है, तो उसके साथ उसे 'इयर ऑफ सेल्फी’ के रूप में भी पूरी दुनिया में मनाया गया था। मगर, उसके दुष्परिणाम दो साल के भीतर कितने डरावने होंगे, उस पर कम लोगों ने सोचा होगा। 2015 में सेल्फी की वजह से भारत में हुई 27 मौतों के बारे में वाशिंगटन पोस्ट ने जानकारी दी थी। यह संख्या अचानक से बढ़ी, और अगस्त 2016 तक भारत में लगभग 70 लोग जोखिम वाली जगहों पर सेल्फी बनाते समय मौत के मुंह में जा चुके थे।

एक सर्वे 'कार्नेगी मेलोन यूनिवर्सिटी’ और 'इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट ऑफ इंर्फामेशन दिल्ली’ ने साझे तौर पर किया था। नवंबर 2016 में प्रकाशित इस सर्वे रिपोर्ट में जानकारी दी गई कि 2014 के मध्य से अक्टूबर 2016 तक पूरी दुनिया में जोखिम वाली जगहों पर सेल्फी बनाने के क्रम में 127 लोग मारे गये, जिसमें सिर्फ भारत में मरने वालों की संख्या 76 थी। इस अवधि में पाकिस्तान में नौ, अमेरिका में आठ, रूस में छह लोग काल के गाल में समा गये थे। सेल्फी से मौत के मामले में पाकिस्तान दूसरे, और अमेरिका तीसरे नंबर पर है। सर्वे में यह भी साफ हुआ कि सेल्फी दुर्घटना में मरने वालों में युवतियों की संख्या मात्र 20 से 25 प्रतिशत रही है। यह जानना भी 'जेंडर’ के हिसाब से दिलचस्प है। मृतकों के इस ब्योरे पर एक ब्लॉगबाज़ की नज़र पड़ी, तो उसने सेल्फी का नाम 'किलफी’ रख दिया! 'इरी इंश्योरेंस ग्रुप’ जैसी चंद संस्थाएं सेल्फी लेते समय हुई मौतों का आंकड़ा इको कर रही हैं, वे भी इससे इंकार नहीं कर रहीं कि भारत पूरी दुनिया में सेल्फी जनित अकाल मृत्यु के मामले में अग्रिम देश बन चुका है।

भारत में मरने वालों में ज़्यादातर सोलह से 27 साल के युवा रहे हैं। वही युवा, जिनकी जवानी पर देश के प्रधानमंत्री गर्व करते हैं, और विश्व नेताओं के समक्ष भाषण देते समय उनके हवाले से विनिवेश की अपील करते हैं। 2014 में अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ ट्रांस्पोर्टेंशन ने जानकारी दी थी कि वाहन चलाते समय सेल्फी लेने के क्रम में एक साल के भीतर 33 हज़ार लोग घायल हुए हैं। भारत में सेल्फी की वजह से घायलों की संख्या कितनी रही है, उसका आधिकारिक ब्योरा मिलना अभी बाकी है।

सवाल यह है कि क्या सेल्फी के इस नशे ने पूरी पीढ़ी के एक बड़े हिस्से को लापरवाह, संवेदनाशून्य बना दिया है? इस विषय पर मंथन, या संगोष्ठी का आयोजन क्यों नहीं होना चाहिए? बाज़ दफा हम देखते हैं कि दुर्घटना में घायल तड़प रहा है, कुछ लोग सेल्फी बनाने में लगे रहते हैं। आजकल तो गौरक्षक पिटाई कर रहे होते हैं, बजाय बेकसूर को बचाने के, देश के वीर जवान दे-दनादन सेल्फी बनाने में लगे हुए दिख जाते हैं। होटल में पित्ज़ा कुतर रहे हैं तो सेल्फी, मंदिर में भगवान की पूजा की थाली एक हाथ में है, दूसरा हाथ सेल्फी बना रहा होता है। सुबह की नित्यक्रिया से लेकर रात को बिस्तर जाने तक सेल्फी ही सेल्फी। बॉस दिख जाएं, कोई पहचानवाली दिख जाए, या छुटभैया नेता-अभिनेता सामने आ जाए, लो जी बन गई सेल्फी! और जब से फेसबुक लाइव हुआ है, सेल्फी रिपोर्टिंग की तो भरमार हो गई है। नागपुर के वेना डैम पर 'सेल्फी लाइव’ ने ही आठ युवाओं की जान ले ली।

सवाल यह है कि जो कंपनियां बेहतरीन सेल्फी बनाने का दावा ठोंकती हुई, अपने स्मार्टफोन बेच रही हैं, क्या उन्हें नहीं चाहिए कि इसे लेकर चेतावनी जारी करें? कंपनियों को तो बस माल बेचना है, कोई मरे या जिये, इससे क्या फर्क पड़ता है! मगर, जिस रफ्तार में सेल्फी नामक महामारी का भारत में विस्तार हुआ है, उसे प्रोमोट करने में मोबाइल कंपनियां सबसे आगे रही हैं। आप गूगल सर्च पर 'बेस्ट सेल्फी फोन कैमरा’ डाल कर देखिये। लेनोवो से लेकर ओप्पो, सैमसंग, पैनासोनिक, सोनी, वीवो जैसी सैकड़ों कंपनियां बाज़ार में बेस्ट ऑफर के साथ पेशे खिदमत हैं। उनके फोन में फ्रंट कैमरे का फीचर सबसे बेहतरीन सेल्फी बनाने के वास्ते ही तो है। मगर, इन्हें विकसित और बेहतर बनाने की होड़ में लगी विभिन्न कंपनियों के 'आर एंड डी’ वाले कभी सोचते हैं, कि बेस्ट सेल्फी वाले स्मार्ट फोन नहीं, वे एक नशा युवा पीढ़ी को बेच रहे हैं!

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