सच्चर रिपोर्ट के दस साल : गुनाह बेलज्जत

जावेद अनीस 2005 में देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक दशा जानने के लिए जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। ...

देशबन्धु
देशबन्धु

 जावेद अनीस
2005 में देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक दशा जानने के लिए जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। 30 नवंबर, 2006 को कमेटी द्वारा तैयार इस बहुचर्चित रिपोर्ट ‘भारत के मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति?’ को लोकसभा में पेश किया गया था। समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से मुसलमान आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं, सरकारी नौकरियों में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है और बैंक लोन लेने में मुश्किलात का सामना करना पड़ता है, कई मामलों में उनकी स्थिति अनुसूचित जाति-जनजातियों से भी खराब है, फिर वो चाहे शिक्षा, रोजगार का मसला हो या अन्य मानव विकास सूचकांक। सच्चर समिति द्वारा मुस्लिम समुदाय की स्थिति को सुधारने के लिए कई सुझाव भी दिए थे जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में स्कूल, आईटीआई और पॉलिटेक्निक संस्थान खोलना, छात्रवृतियां देना, बैंक शाखाएं खोलना, ऋण सुविधा उपलब्ध कराना, वक्फ संपत्तियों आदि का बेहतर इस्तेमाल, सामान अवसर आयोग, नेशनल डाटा बैंक और असेसमेंट एंड मॉनिटरी अथॉरिटी का गठन आदि। इन सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा अलग से अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का गठन किया गया और ‘अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए प्रधानमंत्री के 15 सूत्री कार्यक्रम’ की शुरुआत की गई थी, इसी तरह से 90 अल्पसंख्यक बहुसंख्यक आबादी वाले जिलों को ‘मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम’ के लिए चुना गया था। लेकिन सिफारिशें ज्यादा थीं और पहल नाकाफी। जो थोड़े-बहुत कदम उठाये भी गये उनका जमीन पर कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिलता है। आज सच्चर रिपोर्ट को जारी हुए दस साल बीत चुके हैं, इस बीच हालात सुधारने के वायदे और दावे तो खूब किये गये लेकिन अभी भी इस समुदाय का सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा और अपने जान-माल की हिफाजत ही बना हुआ है।
सच्चर समिति की रिपोर्ट आने के दस साल बाद भी आज मुसलमानों के हालात में कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिलता है, शिक्षा, नौकरियों और मानव विकास के अन्य सूचकांकों में हालत कमोबेश वैसे ही बने हुए हैं। आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि कुछ मामलों में तो उनकी स्थिति पहले के मुकाबले और भी बदतर हो गई है। 2001 की जनगणना के अनुसार, देश में मुस्लिमों की आबादी 13.43 प्रतिशत थी, जो 2011 की जनगणना में मामूली बढ़ोतरी के साथ 14.2 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। आज भी मुस्लिम समुदाय की आमदनी दूसरे समुदायों से कम है। बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थानों की मदद भी उन तक कम पहुंचती है, उनके बच्चे स्कूलों में कम साल गुजारते हैं और उनमें साक्षरता दर भी कम है। अपनी आबादी के बरक्स वे बेहद थोड़ी मात्रा में सेना या पुलिस बलों में पहुंच पाते हैं।
रोजगार की बात करें तो 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक केवल 33 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के पास रोजगार है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 40 फीसदी है। प्रति व्यक्ति आमदनी के मामले में भी मुस्लिम समुदाय अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों के मुकाबले अभी भी बहुत पिछड़ा है। जून 2013 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) द्वारा ‘भारत के बड़े धार्मिक समूहों में रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति’ नाम से जारी रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न धार्मिक समुदायों में मुसलमानों का जीवन स्तर सबसे नीचे है और वे रोज औसतन महज 32.66 रुपये (प्रति व्यक्ति) में जीवन गुजारते हैं। शहरी इलाकों में सबसे बड़ी संख्या में करीब 46 फीसदी मुसलमान स्व-रोजगार पर निर्भर हैं और यहां केवल 30.4  फीसदी मुसलमान ही वेतनभोगी नौकरियों में हैं, जो दूसरे समूहों के मुकाबले सबसे कम तादाद है। एनएसएसओ के मुताबिक 2004-05 और 2011-12 के बीच मुसलमानों की प्रति माह प्रति व्यक्ति खर्च क्षमता 60 फीसदी बढ़ी है जबकि यह हिंदू आदिवासियों में 69 फीसदी, हिंदू दलितों में 73 फीसदी, हिंदू पिछड़ों में 89 फीसदी और ‘ऊंची जाति के हिंदुओं’ में 122 फीसदी बढ़ी। यह फर्क खासकर शहरी इलाकों में बढ़ता जा रहा है, जहां गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों में मुस्लिम पिछड़ों का अनुपात हिंदू दलितों से बढ़ता जा रहा है।
शिक्षा की बात करें तो वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक भारत के धार्मिक समुदायों में निरक्षरता की दर सबसे ज्यादा मुस्लिमों में (43 प्रतिशत) हैं, सात साल से ज्यादा उम्र की श्रेणी में भी निरक्षरता की दर सबसे ज्यादा मुसलमानों में (42.72 प्रतिशत) ही है। इसी तरह से 2011 जनगणना ही बताते हैं कि मुसलमानों में ग्रेजुएट्स सबसे कम हैं। जहां हिंदुओं में 6 फीसदी ग्रेजुएट हैं, तो मुसलमानों में यह दर केवल 2.8 फीसदी का है। 2014-15 में उच्च शिक्षा पर किए गए अखिल भारतीय सर्वेक्षण के अनुसार, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नामांकित छात्रों में मुसलमानों की हिस्सेदारी केवल 4.4 फीसदी ही है।
इसी तरह से मुसलमानों का केन्द्र व राज्य के सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व अभी भी बहुत कम है। दस साल पहले 2006 में जारी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में बताया गया था कि देश के कुल 3209 आईपीएस अधिकारियों में से केवल 4 प्रतिशत यानी 128 ही मुस्लिम थे। लेकिन दस साल बाद भी हालात देखिए, कुछ भी नहीं बदला है।  2016 में यह आंकड़ा कुल 3754 आईपीएस अधिकारियों में 120 मुस्लिम अधिकारियों का यानी महज 3.19 प्रतिशत ही है। 2006 में 3 प्रतिशत ही मुस्लिम आईएएस थे, 2016 में इसमें .32 की मामूली बढ़त हुई और यह आंकड़ा 3.32 प्रतिशत हो गया, इसी तरह से उस समय पुलिस सेवा में 7.63 प्रतिशत मुस्लिम थे जो साल 2013 में घटकर 6.27 प्रतिशत रह गए हैं।
दरअसल खुद को मुसलमानों की हितैषी बताने का दावा करने वाली सियासी पार्टियों ने मुसलमानों को ‘वोट बैंक’ से ज्यादा कभी कुछ समझा नहीं हैं इसलिए उनकी तरफ से इस समुदाय के उत्थान और विकास के लिए गम्भीर प्रयास नहीं दिखाई देता है। मुस्लिम समुदाय के वास्तविक मुद्दे / समस्याएं कभी उनके एजेंडे में ही नहीं रहे हैं, उनकी सारी कवायद दक्षिणपंथी ताकतों का डर दिखाकर कर मुस्लिम वोट हासिल करने तक ही सीमित रहती है। गौर करने की बात यह है कि साम्प्रदायिकता को लेकर तथाकथित सेक्युलर पार्टियों की लड़ाई न केवल नकली साबित हो रही है बल्कि कभी-कभी इनका दक्षिणपंथी ताकतों के साथ का अघोषित रिश्ता भी नजर आता है, यहां तक कि ये एक-दूसरे को बनाये रखने में मदद करती भी नजर आती हैं ताकि देश के दोनों प्रमुख समुदायों को एक-दूसरे का भय दिखा कर अपनी रोटी सेंकी जाती रहे। इसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि सियासी पार्टियों का जोर या तो इनकी असुरक्षा को भुना कर उन्हें महज एक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने की है या फिर उनके नागरिक अधिकारों को स्थगित करके उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बना देने की है।
किसी भी लोकतांत्रिक देश के विकास का पैमाना है कि वह अपने अल्पसंख्यकों के साथ किस तरह का सलूक करता है, जिस देश का एक बड़ा तबका पिछड़ेपन और असुरक्षा के भावना के साथ जी रहा हो वह इस पैमाने पर खरा नहीं उतर सकता है। हिंदुस्तान की जम्हूरियत की मजबूती के लिए जरूरी है कि अकलियतों में असुरक्षा की भावना को बढ़ाने/भुनाने और ‘तुष्टिकरण’ के आरोपों की राजनीति बंद हो और उनकी समस्याओं को राजनीति के एजेंडे पर लाया जाए, सच्चर और रंगनाथ मिश्र कमेटी जैसी रिपोर्टों की अनुसंशाओं पर खुले दिल से अमल हो, समुदाय में बैठी असुरक्षा की भावना को खत्म करने के लिए मजबूत कानून बने जो सांप्रदायिक घटनाओं पर काबू पाने और दोषियों के विरूद्ध कार्रवाई करने में सक्षम हो। दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय को भी भावनात्मक मुद्दों के बहकावे में आना बंद करना होगा और अपनी वास्तविक समस्यायों को हल करने के लिए राजनीति को एक औजार के तौर पर इस्तेमाल करना सीखना होगा। यह काम म•ाहबी लीडरान से पिंड छुड़ाकर उनकी जगह नये सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व पैदा किये बिना नहीं किया जा सकता है। उन्हें वोट बैंक नहीं बल्कि पोलिटिकल फोर्स बनना होगा।


 

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

देशबन्धु के आलेख