जम्मू-कश्मीर : सिर्फ वार्ताकार नियुक्त करने से क्या होगा?

कहने की जरूरत नहीं है कि गुजरात में जहां भाजपा को आने वाले चुनाव में बहुत गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है और 'विकास पुरुष' की नरेंद्र मोदी की छवि की चमक धुंधली पड़ चुकी है...

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जम्मू-कश्मीर : सिर्फ वार्ताकार नियुक्त करने से क्या होगा?
Jammu and Kashmir
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- राजेंद्र शर्मा

कहने की जरूरत नहीं है कि गुजरात में जहां भाजपा को आने वाले चुनाव में बहुत गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है और 'विकास पुरुष' की नरेंद्र मोदी की छवि की चमक धुंधली पड़ चुकी है, संघ-भाजपा जोड़ी बढ़ते पैमाने पर सांप्रदायिक चेहरे को चमकाने वाले अपने जाने-पहचाने मुद्दों को निकाल रही है। इसकी शुरूआत तो तभी हो गयी थी जब योगी आदित्यनाथ को गुजरात में प्रचार के लिए उतारा गया था, जहां उन्होंने 'लव जेहाद' जैसे मुद्दों को उठाया था। बहरहाल, नारायण रूपाणी ने अपने बयान से इस सांप्रदायिक स्वर को ऑफीशियल बना दिया है। अब बस यही देखना बाकी है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी भी चुनाव की बढ़ती गर्मी के बीच सीधे खुद भी यह सुर लगाएंगे या भाजपा के प्रचार के जाने-पहचाने श्रम विभाजन का ही पालन किया जाएगा, जहां उनसे नीचे वाले नेता ही भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा चमकाएंगे।

जैसे-जैसे सर्दियां आ रही हैं, जम्मू-कश्मीर को लेकर बहसों में गर्मी आ रही है। केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए गए विशेष वार्ताकार, दिनेश्वर शर्मा ने, पिछले ही हफ्ते वार्ताकार की हैसियत से जम्मू-कश्मीर का पहला दौरा किया है। अपने पहले ही दौरे के क्रम में दिनेश्वर शर्मा ने, जो खुफिया ब्यूरो (आइबी) के प्रमुख रह चुके हैं और कश्मीर के मामलों में काफी अनुभवी माने जाते हैं, करीब 85 प्रतिनिधिमंडलों से बात-चीत की है। कहने की जरूरत नहीं है कि 2016 की गर्मियों में हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से कश्मीर की घाटी में बिगड़े हालात और इन हालात से निपटने में भाजपा-पीडीपी की गठजोड़ सरकार की पूर्ण विफलता तथा केंद्र सरकार व केंद्रीय बलों द्वारा इसे महज कानून व व्यवस्था की समस्या में घटा दिए जाने और बढ़ते पैमाने दमन के औजारों से ही उससे निपटने की कोशिश करने की पृष्ठïभूमि में, केंद्र सरकार के वार्ताकार नियुक्त करने के निर्णय पर, व्यापक रूप से राहत महसूस की गयी है। केंद्र सरकार के इस कदम में, सिर्फ रक्षा बलों के भरोसे कश्मीर की समस्या से निपटने की कोशिश करने के मोदी सरकार के अब तक रुख में बदलाव का संकेत पढ़कर, जम्मू-कश्मीर में प्राय: सभी राजनीतिक ताकतों ने इस पहल का स्वागत किया है। हां! अलगाववादियों ने जरूर खुलकर इसका अनुमोदन नहीं किया है, हालांकि उन्होंने नकारात्मक रुख भी नहीं अपनाया है और एक तरह से 'देखें क्या होता है' का रुख अपनाया है। 

दूसरी ओर, खुद सत्ताधारी भाजपा जरूर अपनी ही केंद्र सरकार की इस पहल पर वास्तविक दुविधा में नजर आती है और कम से कम इसके महत्व को घटाकर दिखाने की कोशिशों में लगी रही है। यह संयोग ही नहीं है कि केंद्र के विशेष वार्ताकार की नियुक्ति की केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा घोषणा किए जाने के कुछ ही घंटों के बाद, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री, जितेंद्र सिंह ने, जो खुद जम्मू-कश्मीर से जुड़े हुए हैं, जम्मू में एक आयोजन में 'वार्ताकार की नियुक्ति' को कत्तई महत्वहीन तथा मामूली निर्णय ठहराने की कोशिश की थी और इसे कश्मीर के मामले में मोदी सरकार की सोच में किसी भी बदलाव का संकेत मानने से साफ तौर पर इंकार किया था। और तो और उन्होंने तो यह मानने से भी इंकार किया था कि दिनेश्वर शर्मा को वाकई वार्ताकार नियुक्त किया गया है! उनकी दलील थी कि उनकी नियुक्ति की घोषणा में तो 'वार्ताकार'(इटरलोक्यूटर) शब्द कहीं है ही नहीं। जाहिर है कि जितेंद्र सिंह की यह सारी कसरत, सत्ताधारी पार्टी के जम्मू के हिंदू समर्थन आधार को ही संतुष्टï करने के लिए थी। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें, मोदी सरकार की इस पहल के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत छुपे हुए हैं।

कश्मीर के मामले में बातचीत की मामूली से मामूली पहल भी, मोदी सरकार तथा सत्ताधारी संघ-भाजपा को आसानी से हजम न होना एक ऐसी सचाई है, जो विशेष वार्ताकार की नियुक्ति से कोई बदल नहीं गयी है। बेशक, सरकार के विशेष वार्ताकार की नियुक्ति के निर्णय तक पहुंचने से पहले, इसी पगबाधा के चलते मोदी सरकार ने कश्मीर के हालात में सुधार के उस मौके को गंवा दिया था, जो पिछले साल के आखिर में सांसदों के एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के जम्मू-कश्मीर के दौरे से खुला था, जिसका नेतृत्व खुद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कर रहे थे। हालांकि, अलगाववादी हुर्रियत के प्रमुख नेता इस प्रतिनिधिमंडल से औपचारिक मुलाकात से दूर रहे थे, फिर भी इस प्रतिनिधिमंडल ने लौटकर, सर्वसम्मति से जो सिफारिशें की थीं, उनका कश्मीर में व्यापक रूप से स्वागत हुआ था और उनसे आम कश्मीरियों तक भारतीय शासन की आवाज पहुंचने का कुछ रास्ता बनता था। इन सिफारिशों में, फौरन विश्वास-निर्माण के कदम, जैसे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ छर्रेवाली बंदूकों का इस्तेमाल बंद करने से लेकर, रोजगार के अवसर पैदा करना तक शामिल थे। इसके अलावा 'सभी हितधारकों' के साथ, राजनीतिक संवाद फौरन शुरू करने का रास्ता दिखाया गया था। लेकिन, खुद गृहमंत्री की अध्यक्षता में उक्त सिफारिशें किए जाने के बावजूद, केंद्र सरकार ने इस मामले में रत्तीभर कार्रवाई नहीं की। इसी का नतीजा है कि करीब दस अमूल्य महीने गंवाने तथा इस दौर में कश्मीरियों का अलगाव और पुख्ता होने के बाद, अब वार्ताकार की नियुक्ति से सरकार को नये सिरे से शुरूआत करनी पड़ी है। 


दुर्भाग्य से मोदी सरकार कोई अब भी उक्त पगबाधा से उबर नहीं गयी है। वास्तव में मामला इससे ठीक उल्टा ही लगता है। यह सिर्फ संयोग ही नहीं है कि गुजरात में धुंआधार चुनाव प्रचार के बीच, राज्य के भाजपायी मुख्यमंत्री नारायण रूपाणी को अचानक इसका ऐलान करना जरूरी लगा है कि कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा-370 का खत्म किया जाना, संघ-भाजपा का सपना है। वास्तव में भाजपायी मुख्यमंत्री ने इसके साथ अयोध्या में राम मंदिर और देश में समान नागरिक कानून के मुद्दों का और जोड़ दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि गुजरात में जहां भाजपा को आने वाले चुनाव में बहुत गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है और 'विकास पुरुष' की नरेंद्र मोदी की छवि की चमक धुंधली पड़ चुकी है, संघ-भाजपा जोड़ी बढ़ते पैमाने पर सांप्रदायिक चेहरे को चमकाने वाले अपने जाने-पहचाने मुद्दों को निकाल रही है। इसकी शुरूआत तो तभी हो गयी थी जब योगी आदित्यनाथ को गुजरात में प्रचार के लिए उतारा गया था, जहां उन्होंने 'लव जेहाद' जैसे मुद्दों को उठाया था।

बहरहाल, नारायण रूपाणी ने अपने बयान से इस सांप्रदायिक स्वर को ऑफीशियल बना दिया है। अब बस यही देखना बाकी है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी भी चुनाव की बढ़ती गर्मी के बीच सीधे खुद भी यह सुर लगाएंगे या भाजपा के प्रचार के जाने-पहचाने श्रम विभाजन का ही पालन किया जाएगा, जहां उनसे नीचे वाले नेता ही भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा चमकाएंगे। इस सबके लिए कश्मीर के साथ 'सख्ती' की मुद्रा की ही मांग होगी। यह कश्मीर के मामले में किसी भी वास्तविक प्रगति को और मुश्किल बनाएगा।

इसके बावजूद, अगर मोदी सरकार ने विशेष वार्ताकार की नियुक्ति का कदम उठाया है, तो ऐसा सिर्फ इस वजह से नहीं है कि उसकी समझ में आ गया है कि उसकी कथित 'सख्ती' की नीति, कश्मीरी जनता के अलगाव को ही बढ़ा रही है और इस तरह कश्मीर की समस्या को और असाध्य ही बना रही है। यह कदम इस वजह से तो हर्गिज नहीं उठाया गया है कि पिछले साल भर से ज्यादा के घटनाविकास ने जम्मू-कश्मीर की पीडीपी-भाजपा गठजोड़ सरकार की प्रतिष्ठïा को रसातल में पहुंचा दिया है और विशेष रूप से कश्मीर में उसकी कुछ प्रतिष्ठïा बहाल करने के लिए, सिर्फ सख्ती की मुद्रा से कुछ पीछे हटने की जरूरत थी। इसके पीछे तो किसी जमाने का कुख्यात 'विदेशी हाथ' ही लगता है! पिछले ही दिनों यह खबर आयी थी कि गृहमंत्री के विशेष वार्ताकार की नियुक्ति की घोषणा करने से कुछ ही हफ्ते पहले, अमरीकी दूतावास के एक वरिष्ठï अधिकारी ने इसका पता लगाने के लिए जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था कि वहां बातचीत शुरू करने की कैसी संभावनाएं हैं। यह पूरी कसरत, अमरीकी विदेश सचिव के भारत के दौरे की तैयारी के हिस्से के तौर पर की जा रही थी। यह सिर्फ संयोग ही नहीं हो सकता है कि अमरीकी विदेश सचिव या मंत्री के अपनी पहली भारत यात्रा पर पहुंचने से एक दिन पहले ही, विशेष वार्ताकार की नियुक्ति की घोषणा की गयी थी। यह पहल, मनीला में आसियान शिखर सम्मेलन के मौके पर अमरीकी राष्टï्रपति ट्रम्प के साथ मुलाकात के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमरीका के साथ मिलकर एशिया को नेतृत्व मुहैया कराने की शेखी के साथ बिल्कुल फिट बैठती है।

जाहिर है कि इस सब को देखते हुए, दिनेश्वर शर्मा के विशेष वार्ताकार नियुक्त किए जाने भर से जम्मू-कश्मीर की समस्या के समाधान की दिशा में किसी खास प्रगति की उम्मीद होना मुश्किल है। यह मुश्किल इसलिए और भी ज्यादा है कि इससे पहले भी, खासतौर पर 2001 के बाद से समय-समय पर इस मुद्दे के लिए विशेष वार्ताकारों तथा कमेटियों को नियुक्त किया जाता रहा है, लेकिन पिछली सरकारों ने भी उनकी सिफारिशों/ निष्कर्षों पर शायद ही कोई वास्तविक कार्रवाई की थी। यह पहली (वाजपेयी की) एनडीए सरकार के बारे में भी सच है और पिछली यूपीए सरकार के बारे में भी। फिर मोदी सरकार से इससे बेहतर की उम्मीद कैसे की जा सकती है जबकि उसने अब तक तो पाकिस्तान तथा कश्मीर, दोनों के प्रति 'सख्ती' की अपनी मुद्रा को ही, सांप्रदायिक-राष्टï्रवादी गोलबंदी का अपना हथियार बनाए रखा है। यह दूसरी बात है कि इसके वावजूद, वार्ताकार की नियुक्ति की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि यह चाहे-अनचाहे ठीक उक्त नीति के काम न करने को ही कबूल करना है।                                                                    

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