असहिष्णुता का मकडज़ाल

भारत में अनादिकाल से असहमतियों व विचार भिन्नताओं की परंपरा को संजोकर रखा गया है। ऐसा किसी मजबूरी में नहीं हुआ, यह तो यहां के समाज की विशिष्टता रही है...

असहिष्णुता का मकडज़ाल
Intolerance
चिन्मय मिश्र

भारत में अनादिकाल से असहमतियों विचार भिन्नताओं की परंपरा को संजोकर रखा गया है। ऐसा किसी मजबूरी में नहीं हुआ, यह तो यहां के समाज की विशिष्टता रही है। पुरातन चार्वाक परंपरा से लेकर आधुनिक माक्र्सवाद की नास्तिकता यहां हमेशा से स्वीकार्य रही और उसे मान्यता भी मिली। सामाजिक स्तर पर एकदम विपरीत आचरण वाले हिन्दू मुसलमान अभी तक साथ-साथ इसलिए रहते आए हैं, क्योंकि इन समुदायों ने कभी समुदाय के स्तर पर दूसरे को कमतर नहीं आंका था। परंतु अब 'हमऔर 'वेमें बंट चुके हैं जबकि वास्तविकता तो यह है कि दोनों ही हम हैं और दोनों ही वे भी हैं तो आखिर हम सिद्ध क्या करना चाहते हैं।

 

'परंपरा का राजनीतिकरण अनेक समस्याओं को जन्म देता है। यह प्रक्रिया 'हम’ और 'वे’ की दूरी बढ़ाती है, सहज, सह-अस्तित्व में विसंगतियां पैदा करती है, और अपसंस्कृतियों के उदय का कारण बनती हैं। कई सौ वर्षों के पड़ोसी कुछ ही वर्षों में बेगाने हो जाते हैं; जो कल तक एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी थे, वे कुछ ही दिनों में दुश्मन बन जाते हैं। अविवेकी इतिहास दृष्टि, विकृत जातीय भावना और झूठी धर्मान्धता हजारों वर्ष पुराने संतुलन को गड़बड़ा देते हैं।

-श्यामाचरण दुबे

पिछले दो-तीन बरसों से हम देख रहे हैं कि असहमति की किसी भी आवाज को बलपूर्वक या अन्य हथकंडे अपना कर कमोबेश मौन किए जाने को सार्वजनिक रूप से धिक्कारा जाना ओझल हो गया है। इन्दौर में कन्हैया कुमार के व्याख्यान के विरोध में की गई गैरवाजिब हरकतें साफ दर्शा रही हैं कि हमारा समाज अविवेकी असहिष्णु मुठ्ठी भर समुदाय के समक्ष स्वयं ही आत्मसमर्पण को इच्छुक हो गया है। समाज की रीढ़ दिनोंदिन अधिक लचीली होती जा रही है और झुकने के बाद वह लंबे समय तक सीधी नहीं होती और यदि होती भी है तो उसे स्प्रिंग के गुड्डे की तरह पुन: झूलने में किसी तरह की कोई नैतिक हिचकिचाहट नहीं है। कन्हैया कुमार ने क्या कहा और क्या नहीं यह महत्वहीन है, सवाल यह उठता है कि आपने उसका जवाब किस तरह से दिया है।

भारत में अनादिकाल से असहमतियों व विचार भिन्नताओं की परंपरा को संजोकर रखा गया है। ऐसा किसी मजबूरी में नहीं हुआ, यह तो यहां के समाज की विशिष्टता रही है। पुरातन चार्वाक परंपरा से लेकर आधुनिक माक्र्सवाद की नास्तिकता यहां हमेशा से स्वीकार्य रही और उसे मान्यता भी मिली। सामाजिक स्तर पर एकदम विपरीत आचरण वाले हिन्दू व मुसलमान अभी तक साथ-साथ इसलिए रहते आए हैं, क्योंकि इन समुदायों ने कभी समुदाय के स्तर पर दूसरे को कमतर नहीं आंका था। परंतु अब 'हम’ और 'वे’ में बंट चुके हैं जबकि वास्तविकता तो यह है कि दोनों ही हम हैं और दोनों ही वे भी हैं तो आखिर हम सिद्ध क्या करना चाहते हैं।

पीरजादा कासिम लिखते हैं, 'अपने खिलाफ फैसला खुद ही लिखा है आपने/ हाथ भी मल रहे हैं आप, आप बड़े अजीब हैं/’ एक अजीब किस्म का दिखावटी उच्चताबोध जो वास्तव में ग्लानिबोध होता जा रहा है। अपनी वैचारिक कमतरी का जवाब पत्थर नहीं हो सकता। सोचिए यदि कश्मीर में पत्थरबाजी राष्ट्रद्रोह है तो इंदौर में वह राष्ट्रवाद में कैसे परिवर्तित हो सकती है! यदि ऐसा मानेंगे तो यह भी मानना पड़ेगा कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है क्योंकि दोनों स्थानों के नैतिक व कानूनी पैमाने अलग-अलग हैं, कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी कहते हैं, 'तर्क दो/ लात तो गधे भी मारते हैं।’ इसलिए कन्हैया कुमार के तर्कों का जवाब पत्थर नहीं हो सकते और मेधा पाटकर के तर्कों का जवाब जेल नहीं हो सकती। चंडीगढ़ की वर्णिका कुंडु पर कथित हमले का जवाब उसका चरित्रहनन नहीं हो सकता। किसी न्यायिक फैसले से असहमति और उसकी समीक्षा का जवाब न्यायालय द्वारा मान-हानि का मुकदमा दायर कर देना नहीं हो सकता। अपनी गलतियों को छिपाने के लिए वर्तमान सरकार का जवाब पिछली सरकार की कमियां गिनाने से नहीं दिया जा सकता। किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं पर किए गए प्रश्नों का जवाब उनकी अपनी अक्षमता नहीं हो सकता। परंतु आज हमें प्रश्न के उत्तर नहीं मिलते बल्कि बदले में प्रतिप्रश्न ही मिलते हैं। सवाल उठाने वालों से ही तिरस्कारपूर्वक उत्तर बताने का आग्रह करने वाली प्रवृत्ति से मुक्ति पाना भी आवश्यक है।


भारत ने फासिस्ट व तानाशाही प्रवृत्तियां अब घर और बाहर दोनों ही जगहों पर नए सिरे से स्थापित होती चली जा रही हैं और हम खुली आंखों से मक्खी निगल रहे हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रमुख  दार्शनिक जान स्टुअर्ट मिल लिखते हैं, 'राजनीतिक तानाशाही के विरुद्ध कहे जाने वाला ऐसा कोई शब्द नहीं है, जो परिवार की तानाशाही पर लागू न होना हो। हर तानाशाह राजा अपनी खिड़की पर बैठकर अत्याचार से पीड़ित अपनी प्रजा की कराहों का मजा नहीं लेता, न ही उनसे उनका अंतिम चीथड़ा भी छीनकर उन्हें सड़क पर ठंड से कांपने के लिए छोड़ देता है।’ वह मुगलेआज़म फिल्म का संवाद है ना, कि 'अनारकली सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और हम (अकबर) तुम्हें जीने नहीं देंगे।’ लेकिन अंतत: होता वही है जो 'हम’ चाहते हैं। अन्याय अधिकांशत: 'हम’ की ओर से ही प्रश्रय पाता है।

कन्हैया कुमार या उन जैसे और हम जैसे तमाम लोगों की समस्या यह है कि हम पूरे समय प्रतिक्रिया देने में लगे रहते हैं। जबकि आवश्यकता है 'क्रिया’ करने की। हम कैसा भविष्य बनाना चाहते हैं, उसका खाका कैसा होगा? उसमें किस तरह की व्यवस्थाएं होंगी? आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक तानाबाना कैसा होगा। क्या हम न्याय ही नहीं, बल्कि न्याय की नैतिकता को स्थापित करने का प्रयास करेंगे तो किस तरह? परंतु हमारा सारा समय कुतर्कों का जवाब देने और स्वयं को ही सही सिद्ध करवाने में बीता जा रहा है। हम सब दिल्ली को ही अपनी राजधानी बनाए रखना चाहते हैं, कालीहांडी को नहीं। दिल्ली सल्तनत को नकारे बिना किसी समाधान पर पहुंचना असंभव है। क्योंकि दिल्ली अब एक शहर के तौर पर नहीं बल्कि विचार के तौर पर भी स्थापित हो गया है और इन दोनों की जड़ें या मूल में शोषणवादी प्रवृत्ति ही है, तो इससे कैसे निजात पाएं। स्टुअर्ट मिल यह भी कहते हैं कि 'ग्रीस और रोम में दासों द्वारा अपने मालिक से दगा करने की अपेक्षा उसके अत्याचार से मर जाना एक आम तथ्य था।’

हमें प्रतिकार के अपने उपकरणों को नए सिरे से तैयार करना होगा। तकनीक ने हमारी जिस गर्दन को हमेशा झुके रहने पर बाध्य कर दिया है उसे उसके आतंक से मुक्त कर चारों ओर देखने की प्रवृत्ति को पुन: विकसित होने देने के प्रयत्न करने होंगे। केरल में जिस प्रकार की राजनीतिक हिंसा का दौर चल रहा है और उसके ठीक विपरीत जम्मू-कश्मीर में भी जैसी राजनीतिक हिंसा पनप रही है उनमें व्याप्त समानताओं और भिन्नताओं को समझने की कोशिश करना होगी। छत्तीसगढ़ नव मध्यप्रदेश में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना होगा। उत्तरप्रदेश में गूलर के (अपशकुनी)पेड़ों को कटने से बचाना होगा। शानियों के शान से इस देश को बचाना होगा और आम भारतीय के शान व प्रतिभा का सम्मान करना सीखना होगा। काजी नजरुल इस्लाम के शब्दों में कहें तो,

यह कैसा उन्माद है,

मैं पागल हूं,

मैंने सहसा अपने को पहचान लिया है,

मेरे सारे बंधन खुल गए हैं।

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