भाषाई अराजकता का अंतरराष्ट्रीय दौर

भारत की विदेश मंत्री के सं.रा.संघ में दिए गए भाषण की चहुंओर चर्चा है। कांग्रेस उसमें से अपने लिए कुछ खोज रही है, भाजपा तो खैर इसे वाकपटुता का चरम निरूपित कर रही है...

चिन्मय मिश्र
भाषाई अराजकता का अंतरराष्ट्रीय दौर
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चिन्मय मिश्र

भारत की विदेश मंत्री के सं.रा.संघ में दिए गए भाषण की चहुंओर चर्चा है। कांग्रेस उसमें से अपने लिए कुछ खोज रही है, भाजपा तो खैर इसे वाकपटुता का चरम निरूपित कर रही है। परंतु जब हम ठंडे दिमाग से सोचेंगे तो शायद हां, शायद समझ में आए कि सं.रा. संघ की इस बैठक के वास्तविक उद्देश्य क्या हैं। क्या हम ऐसी भाषा का प्रयोग कर पाने में असहजता महसूस करते हैं, जिससे कि तनाव कम या खत्म हो?

क्या लफ़्जों के मायने अब कुछ नहीं रह गए हैं? क्या लोगों को कोई भरोसा नहीं रह गया है? यह जरूर पागलपन की निशानी है और हमारे महान नेता जो हमारी तकदीर का फैसला करते हैं, खतरनाक हो रहे हैं। वह सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, वे पागल रोगी हैं, उन्हें घमंड हो गया है, वे अपनी ताकत के नशे में हैं। वे छोटी-छोटी बातों पर अड़े हुए हैं। वे सही तरीके से सोचने और सही काम करने के बजाय सारी दुनिया पर कहर बरसाने और उसे तबाह करने पर तुल गए हैं।

(पं. जवाहर लाल नेहरू,  1 जुलाई 1948)

संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा की बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति ने उत्तर कोरिया के तानाशाह के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने पलटकर जिस शब्दावली में जवाब दिया। अमेरिका के राजनयिकों ने उसका प्रत्युत्तर दिया, जिसमें बाद में स्वयं राष्ट्रपति भी शामिल हो गए थे। दूसरी तरफ उत्तरी कोरिया ने उस प्रत्युत्तर का पुन: प्रत्युत्तर दिया और प्रत्युत्तरों की यह शृंखला निर्बाध जारी है। हम अपने गिरेबान में झांके तो, इसी सत्र में पाकिस्तान ने कुछ कहा। हमने पलटकर उसे ललकारा व दुत्कारा। उसने पुन: बात को आगे बढ़ाया। भारत ने अपने आधिकारिक भाषण में बेहद आक्रामक तरीके से पाकिस्तान को उधेड़ा। पाकिस्तान ने कुछ गलतबयानी करते हुए, अधिक तल्खी से जवाब दिया। हमारी युवा राजनयिक और अधिक तल्खी से भर कर फूट पड़ीं। नतीजा? महज अखबारों और न्यू•ा चैनलों की चांदी। दुनिया के सबसे पुराने ही नहीं सबसे सशक्त लोकतंत्र कहे जाने वाले देश, अमेरिका और इस वक्त दुनिया में सबसे खतरनाक व वीभत्स तानाशाही कहे जाने वाले उत्तरी कोरिया की भाषा क्या एक सी होगी? प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप से सैनिक तानाशाही और धार्मिक कट्टरवाद से संचालित पाकिस्तान और दुनिया का सबसे बड़ा ही नहीं बल्कि सर्वाधिक स्पंदित लोकतंत्र, एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र जहां गांधी जैसा विचारक और नेहरू जैसा वैश्विक राजनयिक हुआ है, दोनों एक ही तरह की वितृष्णा भरी भाषा प्रश्न, उत्तर, प्रत्युत्तर और पुन: प्रत्युत्तर देते रहेंगे?

डॉ. रामविलास शर्मा अपनी पुस्तक 'भाषा और समाज' की शुरुआती पंक्ति में लिखते हैं, 'प्राणिजगत में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जो भाषा का व्यवहार करता है। इसका कारण क्या है?'  सं.रा.संघ का गठन विश्व में शांति, सहयोग, भाईचारा स्थापित करने, राष्ट्रों के बीच प्रतिस्पर्धा और ऊंच-नीच समाप्त करने के लिए हुआ है। पिछले ही वर्ष टिकाऊ विकास लक्ष्यों की घोषणा हुई है। इससे पहले सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को न पूरा कर पाने में विश्व के नेताओं को कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं हो रही। शांति के मंच पर खड़े होकर युद्ध की घोषणा करने से ज्यादा अनुचित व अमानवीय कुछ भी नहीं हो सकता।  इंग्लैंड के प्रसिद्ध शरीर विज्ञानी वी.ई. नीगस ने अपनी पुस्तक 'द कम्पैरेटिव एनाटॉमी एंड फिजियोलाजी आफ लेरिन्क्स' (बोलने की क्षमता) में लिखा है, 'बहुत से पशु ऐसी ध्वनियां करते हैं, जिनसे भाषा का विशद भंडार बन सके। लेकिन उनमें बुद्धि नहीं होती है कि वे इस क्षमता से लाभ उठाएं जैसा कि मनुष्य उठाता है।' तो क्या हम मानते हैं कि हम भाषा का लाभ उठा पा रहे हैं? या इसके ठीक विपरीत इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। अमेरिका का उत्तरी कोरिया और वेनेजुएला में तख्तापलट की सीधी धमकी देना और जवाब में उत्तरी कोरिया का अमेरिका को नष्ट कर देने की दुस्साहस भरी घोषणा, को क्या भाषागत संस्कार के नजरिए से मानवीय कहा जा सकता है?


भारत की विदेश मंत्री के सं.रा.संघ में दिए गए भाषण की चहुंओर चर्चा है। कांग्रेस उसमें से अपने लिए कुछ खोज रही है, भाजपा तो खैर इसे वाकपटुता का चरम निरूपित कर रही है। परंतु जब हम ठंडे दिमाग से सोचेंगे तो शायद हां, शायद समझ में आए कि सं.रा. संघ की इस बैठक के वास्तविक उद्देश्य क्या हैं। क्या हम ऐसी भाषा का प्रयोग कर पाने में असहजता महसूस करते हैं, जिससे कि तनाव कम या खत्म हो? शांति स्थापित करने को वैश्विक नेतृत्व संभवत: अपने हित में नहीं मानता वह सदैव तनावग्रस्त विश्व में ही अपना भविष्य देख पाता है। ऐसा ही वातावरण द्वितीय विश्वयुद्ध के समय भी बनाया गया था। इस युद्ध की समाप्ति के बाद पं. नेहरू ने लिखा था, 'यह बड़े ताज्जुब और शर्म की बात है, कि ये लोग ऐसे मौके पर पागल हो गए हैं, जबकि दुनिया अपने उस लक्ष्य को पाने के काफी नजदीक थी, सदियों से जिसे चाहा जा रहा था और जिसका सपना देखा जा रहा था। दुनिया के हर मुल्क में रहने वाले लोगों के लिए शांति, सहयोग और खुशहाली उनकी पहुंच में है। लेकिन शायद ईश्वर को इंसान की तकदीर से डाह होने लगी थी और उसने उसे पागल कर दिया।' उनके कथन के 71 वर्ष बाद इतिहास पुन: स्वयं को दोहरा रहा है। पिछले एक दशक में लगने लगा था कि विश्व में शांति को लेकर नई पहल के सुखद परिणाम सामने आएंगे, लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में परिस्थितियों ने एकाएक नई राह पकड़ ली। आतंकवाद के खिलाफ जंग के नाम पर शुरु हुआ यह बवंडर अब आमने-सामने के युद्ध का सैलाब बन जाने की फिराक में है।

अमेरिकी राष्ट्रपति, उत्तरी कोरिया के तानाशाह पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष और प्रधानमंत्री,भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री क्या इन परिस्थितियों का विश्लेषण या अंतिम परिणाम को लेकर अभी अबूझ अनभिज्ञता से क्या सिद्ध करना चाहते हैं? यदि हमारे-आपके जैसे साधारण बुद्धि के लोग परिस्थितियों का विश्लेषण कर रहे हैं और संभाव्य परिणिति को लेकर कमोबेश सुनिश्चित हैं तो हमारा नेतृत्व हमसे सीधी व सपाट बात क्यों नहीं करता, वह अपने पूरे मंतव्य अपने देश की जनता के सामने प्रस्तुत क्यों नहीं करता? लगातार ऐसा वातावरण क्यों कायम रखा जा रहा है, जिसमें अपनी विश्वास और तालमेल नष्ट होता चला जाए और स्थायी तनाव की परिस्थितियां निर्मित हो जाएं? दूसरे महायुद्ध के नासूरों की लंबी फेहरिस्त में कोरिया प्रायद्वीप भी है। कोरिया के बंटवारे से उत्पन्न परिस्थितियों और वैश्विक महाशक्तियों की आपसी खींचतान ने इस नासूर में मवाद पैदा कर दिया है।

दक्षिण कोरिया के कवि यून सॅक जूंग की कविता है, 'दुनिया का नक्शा' इसमें एक बच्चे के उद्गार हैं, उसे गृहकार्य के तौर पर दुनिया का नक्शा बनाकर लाने को कहा गया है। वह रात भर कोशिश करता रहा, लेकिन नक्शा नहीं बना। अंत में वह कह उठता है, 'न तुम्हारा देश, न मेरा देश/ तुम्हारा राज, मेरा राज/ न होकर ऐसा यदि/ होती सारी दुनिया एक देश/ तब होता कितना आसान/बना पाना उसका नक्शा।' परंतु हमारी राजनीतिक महत्वाकांक्षा तो किसी ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है, जहां पर कि उसे शांति के नाम से बेचैनी होने लगती है। सं.रा. संघ की सेनाएं यदि अफ्रीका में पिछले 50 वर्षों से शांति स्थापित नहीं कर पा रही है तो क्या महासभा में इस पर विचार नहीं होना चाहिए। क्या महासभा में सबसे अधिक ध्यान भूख, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, पर्यावरण जैसे तमाम विषयों पर नहीं दिया जाना चाहिए? जबकि वास्तविकता इसके ठीक उलट है। ये मुद्दे महज खानापूर्ति के लिए ही प्रयोग में लाए जाते हैं।

इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति के भाषण के बाद एकाएक जार्ज बुश के भाषण के बाद वेनेजुएला के राष्ट्रपति शावेज की महासभा में कही टिप्पणी याद हो आई कि (बुश के भाषण के बाद) बारूद की महक अभी तक गई नहीं है, उसी सभागृह में भरी है। एक दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद बारुद की बदबू न केवल बरकरार है बल्कि दुर्गंध और भी सड़ांध मारने लगी है और इसमें अन्य कई देशों के नाबदान भी मिलते जा रहे हैं। इस सबसे बचना होगा और सबसे पहले अपनी भाषा और वाणी पर विश्व नेताओं को नियंत्रण करना होगा। पंडित नेहरू  जैसे महान राजनयिकों की कमी को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। अंत में डिस्कवरी ऑफ इंडिया की कुछ पंक्तियों पर गौर करें, 'ताज्जुब होता है कि कट्टर देशभक्ति की भावना के बावजूद हममें किस तरह अंतरराष्ट्रीयता की भावना आ गई। किसी भी गुलाम मुल्क के किसी भी राष्ट्रीय आंदोलन में यह भावना नहीं आ सकी और इन मुल्कों के राष्ट्रीय आंदोलनों में आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से दूर रहने की भावना काम करती रही।Ó भारत की खोज को व्यर्थ न होने दें।

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