आतंकवाद का सच

भारत पिछले आठ सालों से लगातार कह रहा है कि मुंबई पर 26 नवंबर को हुए आतंकी हमले में पाकिस्तान का हाथ है, अब उसी बात की पुष्टि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार महमूद अली दुर्रानी ...

देशबन्धु
आतंकवाद का सच
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भारत पिछले आठ सालों से लगातार कह रहा है कि मुंबई पर 26 नवंबर को हुए आतंकी हमले में पाकिस्तान का हाथ है, अब उसी बात की पुष्टि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार महमूद अली दुर्रानी ने सार्वजनिक तौर पर की है। 19वीं एशियाई सुरक्षा कांफ्रेंस में श्री दुर्रानी ने बताया कि 26/11 मुंबई हमला सीमा पार आतंकवाद का क्लासिक उदाहरण है। इसके अलावा हाफिज सईद पर श्री दुर्रानी ने कहा कि उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। मुंबई हमलों में अजमल कसाब एकमात्र आतंकवादी था, जिसे जिंदा पकड़ा गया था, उससे पूछताछ में यही साबित हुआ था कि पूरा हमला सीमापार से प्रायोजित और नियोजित था। इसके बाद अमरीका में कैद डेविड कोलमैन हेडली ने भी इसी आशय का बयान वीडियो कांफ्रेंसिंग से पूछताछ में दिया था। और अब महमूद अली दुर्रानी का भारत में ही दिया गया यह बयान पाकिस्तान के खिलाफ तीसरा बड़ा सबूत है। यूं तो भारत ने हमेशा पुख्ता प्रमाणों के साथ अपनी बात रखी, लेकिन पाकिस्तान ने कभी असल गुनहगारों को पकडऩे या उन पर कार्रवाई करने में कोई दिलचस्पी नहींदिखाई। संबंध खत्म होने के खतरे के बावजूद पाकिस्तान ने आतंकवाद से मिलकर लडऩे की प्रतिबद्धता निभाने में ईमानदारी नहींदिखाई। नतीजा यह हुआ कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की कड़वाहट बढ़ती गई। हालांकि पाकिस्तान खुद लगातार आतंकवाद का शिकार हो रहा है। दुनिया में उसकी साख इस वजह से गिर चुकी है। लेकिन फिर भी सेना और आईएसआई के दबाव में वहां की सरकार स्वतंत्र निर्णय नहींले पा रही। पिछले दिनों मुंबई हमलों के साजिशकर्ता हाफिज सईद को उसने नजरबंद किया है, लेकिन इसके पीछे भी उसका स्वार्थ नजर आ रहा है। और जैसा कि श्री दुर्रानी ने कहा कि हाफिज सईद की कोई उपयोगिता नहींहै, उससे जाहिर है कि जैसा कभी ओसामा बिन लादेन अमरीका के लिए उपयोगी था, वैसे ही सईद पाकिस्तान के लिए रहा होगा। उपयोगिता खत्म होने पर ओसामा बिन लादेन को मार दिया गया, जबकि हाफिज सईद का भविष्य अभी पाकिस्तान के हाथों है।
महमूद अली दुर्रानी 11 मई 2008 से 10 जनवरी 2009 तक पाकिस्तान के एनएसए थे, यानी यह वही समय था जब मुंबई पर हमला हुआ और उसके बाद दोनों देशों के बीच संबंध खत्म होने की कगार पर पहुंच गए। एनएसए अपने देश में चल रही गतिविधियों से अनजान हो, ऐसा तो मुमकिन नहींलगता। फिर उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का साथ क्यों नहींदिया? जो बात उन्होंने अब स्वीकार की है, उसके लिए भारत से सबूत मांगे जा रहे थे, तब वे चुप क्यों थे? और अब ऐसा क्या हो गया है कि उन्होंने अपने देश के लिए इतनी बड़ी बात कह दी है। क्या यह सब किसी रणनीति के तहत हो रहा है? या अचानक उन्हें कुछ आत्मज्ञान जैसा प्राप्त हुआ है जिसके कारण वे सच बोल रहे हैं? क्या उनका बयान पाकिस्तान की आधिकारिक स्वीकारोक्ति मानी जाएगी या पाकिस्तान इसे श्री दुर्रानी का निजी बयान कहकर पल्ला झाड़ सकता है? श्री दुर्रानी सेवानिवृत्त हैं, तो क्या उनका यह बयान अधिकृत तौर पर दर्ज होगा या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसकी कोई उपयोगिता ही नहींहोगी? ऐसे कई सवाल हैं, जिस पर भारत को विचार करने की जरूरत है। कसाब को तो सजा ए मौत दे दी गई, लेकिन वह इस पूरे खेल का एक मोहरा ही था। असल चालें जो चल रहे हैं, वो आतंकवादी अब भी सजा से बचे हुए हैं और भारत समेत दुनिया के तमाम आतंक पीडि़त देशों के लिए यह बड़ी चिंता का विषय है। एक वक्त था जब ओसामा बिन लादेन आतंकवाद का सबसे बड़ा चेहरा था। वो समुद्र की अतल गहराइयों में दफ्न हो गया लेकिन आतंकवाद पहले से कहींभयावह रूप में दुनिया को डरा रहा है। महमूद अली दुर्रानी का बयान इस बात की पुष्टि करता है कि आतंकवाद महज आतंकवादी कहलाने वाले लोगों की देन नहींहै, इसमें निर्वाचित सरकारें, प्रशासन, सेना सब कहींन कहींभागीदार होते हैं। अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए आतंकवाद का खेल दुनिया में रचने वाले कब, किस मुखौटे में छिपे हैं, इसे पहचानना ही आज की सबसे बड़ी चुनौती है।


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