इंडिया मीन्स बिजनेस

इंडिया मीन्स बिजनेस, इस नए लुभावने नारे के साथ हाथ जोड़े प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक बड़ा सा पोस्टर दावोस शहर की एक इमारत पर चस्पा है...

देशबन्धु
इंडिया मीन्स बिजनेस
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इंडिया मीन्स बिजनेस, इस नए लुभावने नारे के साथ हाथ जोड़े प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक बड़ा सा पोस्टर दावोस शहर की एक इमारत पर चस्पा है। कहा जाता है कि सुंदरता देखने वाले की नजर में होती है। यह बात इस पोस्टर के संदर्भ में भी कही जा सकती है कि लोग इसे देखकर, प्रधानमंत्री की मुख मुद्रा देखकर तय करें कि इस नारे को देने के पीछे उनकी मंशा क्या है? जब 90 के दशक में आर्थिक उदारीकरण ने भारत में दस्तक दी थी तो भारत यानी इंडिया को किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान की तरह तब के नेताओं ने दुनिया के सामने पेश किया था।

देश को राजनीति की जगह अर्थनीति से चलाने की तरकीब ने जोर पकड़ा और यह समझाया गया कि किसी कंपनी के सीईओ की तरह देश के प्रधानमंत्रियों को काम करना चाहिए। बस, तभी से भारत विश्व के आर्थिक मंचों पर शिरकत करने में अपना गौरव समझने लगा। इस गौरव को नई ऊंचाइयों पर ले जाते हुए हमारे प्रधानसेवक या कहें सीईओ मोदीजी भी स्विट्जरलैंड के दावोस शहर पहुंचे हैं। यहां वे वर्ल्ड इकानामिक फोरम की 48वीं बैठक में अन्य वैश्विक नेताओं और लगभग 2 हजार कंपनियों के सीईओज के साथ बातचीत करेंगे। उन्हें देश की नई आर्थिक संभावनाओं के बारे में बताएंगे। विदेशी कंपनियों को निवेश का न्यौता देंगे। दुनिया को बताएंगे कि उनकी सरकार ने काले धन को रोकने के लिए नोटबंदी का क्रांतिकारी कदम उठाया। जीएसटी लागू कर व्यापार को आसान करने की कोशिश की। जो बातें वे बिल्कुल नहीं बताएंगे, उनके बारे में आम भारतीय जानता है कि नोटबंदी के बाद उसे कितनी तकलीफ हुई।

जीएसटी का फैसला इस तरह लिया गया कि उसे बार-बार सुधारना पड़ रहा है। मोदीजी यह भी नहीं बतलाएंगे कि उनके कार्यकाल में 2015-16 में भारत की जीडीपी 7.9 प्रतिशत थी, फिर 2016-17 में घटकर 7.1 प्रतिशत हुई और इस वित्तीय वर्ष में 6.52 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया जा रहा है। देश को आर्थिक मोर्चे पर सरकारी नीतियों के कारण कहां-कहां हानि हुई, अगर यह सच दुनिया के सामने आए तो विदेशी व्यापारी यहां क्यों आएंगे। यूं भी दावोस में बर्फबारी के कारण सुहावना मौसम और नजारा है, तो बातें भी अच्छी-अच्छी, प्यारी-प्यारी होनी चाहिए। तो एक अच्छी बात इंटरनैशनल मॉनिट्री फंड की रिपोर्ट में सामने आई है कि 2018 में 7.4 फीसदी की विकास दर से भारत सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था होगी। इधर प्राइसवॉटरहाउसकूपर्स के सर्वे में यह बात सामने आई है कि निवेशकों के लिए भारत दुनिया की पांचवीं सबसे आकर्षक जगह है। पीडब्ल्यूसी का मानना है कि सरकार ने बुनियादी ढांचा, मैन्युफैक्चरिंग और कौशल निर्माण के क्षेत्रों से जुड़ी चिंताओं को समाधान किया है। अब ये चिंताएं कौन थींऔर उनका कैसा समाधान निकला, इस बारे में आम जनता को क्या बताना। बड़े लोगों के बीच वैसे भी छोटे दखल नहीं देते। 

खैर..एक अच्छी खबर यह भी है कि इस वित्त वर्ष की पहली छमाही में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 17 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 2016-17 में पहली बार एफडीआई 60 बिलियन डॉलर यानी करीब 4000 अरब रुपये से ज्यादा रहा। रिजर्व बैंक की भी एक रिपोर्ट सामने आई है कि भारत में एफडीआई का सबसे बड़ा स्रोत देश मॉरीशस है। यानी यहां से सबसे ज्यादा निवेश देश में हो रहा है। वैसे यह बात थोड़ी चौंकाती भी है क्योंकि मॉरीशस को टैक्स हैवन भी माना जाता है, जहां से हवाला के जरिए भारत के काले धन को सफेद करने में आसानी होती है। बहरहाल, जब इतने अरबों रुपए विदेशों से भारत में आ रहे हैं, तो फिर भी युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिल रहा, महंगाई क्यों बढ़ रही है, इतने रुपए आखिर किसके पास जा रहे हैं? इन सवालों का जवाब भी दावोस की बैठक के पहले सामने आया है।


 इंटरनैशनल राइट्स ग्रुप ऑक्सफैम के सर्वे में यह खुलासा हुआ है कि पिछले साल भारत में जितनी संपत्ति का निर्माण हुआ, उसका 73 प्रतिशत हिस्सा देश के 1 प्रतिशत धनाढ्य लोगों के पास गया। पिछले साल के सर्वे में भारत की सबसे धनी 1 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल 58 प्रतिशत संपत्ति होने की बात कही गई थी। इस साल इस 1 प्रतिशत आबादी की संपत्ति 20.9 प्रतिशत बढ़ी।

रिवॉर्ड वर्क, नॉट वेल्थ के नाम से जारी रिपोर्ट में ऑक्सफैम ने यह उजागर किया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था ने कैसे धनाढ्यों के समूह को अकूत संपत्ति प्रदान की जबकि लाखों-करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे होने के कारण सरकारी योजनाओं के सहारे जीने का संघर्ष कर रहे हैं। हैरानी की बात नहीं है कि इंडिया मीन्स बिजनेस का नारा बुलंद करते हुए मोदीजी दावोस में अपने साथ जो व्यापारिक प्रतिनिधि मंडल ले गए हैं, उसमें ये 1 प्रतिशत वाले लोग ही शामिल हैं। बाकी 99 प्रतिशत जनता को अभी यह समझ ही नहीं पा रही कि उसके देश का मतलब व्यापार कैसे हो गया? क्या अब भारत माता की जै की जगह व्यापार की जै बोलेंगे?

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