धर्मनिरपेक्षता की हिफाजत में न्यायपालिका

सुभाष गाताड़े : सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय पीठ ने बहुमत के आधार पर दिए अपने फैसले में साफ कहा है कि ‘धर्म, सम्प्रदाय और जाति के आधार पर वोट नहीं मांगे जा सकते।...

सुभाष गाताड़े

सुभाष गाताड़े
सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय पीठ ने बहुमत के आधार पर दिए अपने फैसले में साफ कहा है कि ‘धर्म, सम्प्रदाय और जाति के आधार पर वोट नहीं मांगे जा सकते। उसके मुताबिक अगर ऐसे सबूत मिले कि किसी नेता ने धार्मिक भावनाओं के आधार पर वोट मांगे हैं तो उसके चुनाव को निरस्त किया जाएगा। पीठ के प्रमुख और सुप्रीम कोर्ट के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने साफ किया है कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह एक ‘धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया’ होनी चाहिए। एक ऐसे समय में जबकि देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव मुहाने पर हैं, अदालत के इस फैसले ने धर्म के आधार पर वोटों की सियासत करने वाले संगठनों, तंजीमों के लिए नई चुनौतियां पेश की हैं।
ध्यान रहे कि सर्वोच्च न्यायालय धार्मिक नेताओं एवं प्रत्याशियों के बीच के आपसी सांठगांठ और रिप्रेजेन्टेशन ऑफ पीपुल एक्ट की धारा 123/3/ के अन्तर्गत उसकी वैधता की समीक्षा कर रहा था। उपरोक्त धारा साफ-साफकहती है कि भारत के नागरिकों के बीच धर्म, नस्ल, जाति, सम्प्रदाय या भाषा के आधार पर आपसी विद्वेष की भावना को बढ़ावा देने की कोशिश करना या चुनाव में खड़े प्रत्याशियों द्वारा स्वयं या अपने प्रतिनिधियों द्वारा चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए ऐसे विवाद को हवा देना एक ‘भ्रष्ट आचरण’ है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को बढ़ावा देने लिया गया प्रस्तुत फैसला एक तरह से हाल के समयों में विभिन्न अदालतों द्वारा ऐसे मसलों पर लिए गए फैसलों की याद ताजा करता है। मिसाल के तौर पर पिछले दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि ‘सार्वजनिक हित’ के लिए किसी धार्मिक संस्थान की जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है। और इस सम्बन्ध में उसने चर्च ऑफ नार्थ इंडिया को तथा नेशनल हाईवे अथारिटी आफ इंडिया को यह निर्देश दिया था कि वह मिलजुल कर बैठे तथा छह लेन के रोड के निर्माण के लिए किसी चर्च के ‘स्थानांतरण या हटाने’ की प्रणाली क्या हो इस पर आपस में बात करे। मालूम हो कि आगरा और इटावा को आपस में जोडऩे वाले बाईपास के निर्माण के लिए फिरोजाबाद जिले में हासिल की गई चर्च की जमीन के नोटिफिकेशन को चर्च ने चुनौती दी थी और उसे अपने धार्मिक अधिकारों का हनन घोषित किया था। अदालत ने साफ कहा कि नेशनल हाईवेज एक्ट 1956 के प्रावधानों का हवाला देते हुए एक बार जब जमीन का अधिग्रहण किया गया हो तो याचिकाकर्ता को कुछ राहत नहीं दी जा सकती।
इस सन्दर्भ में मुुंबई हाईकोर्ट द्वारा नवी मुंबई इलाकों में प्रार्थनास्थलों पर- मंदिरों, मस्जिदों में-बिना अनुमति लगाए गए लाउडस्पीकर के बहाने डाली गई याचिका को लेकर दिए फैसले को देखें जब उसने साफ किया कि रात दस बजे से सुबह छह बजे तक प्रार्थनास्थलों से लाउडस्पीकर का प्रयोग वर्जित रहेगा, चाहे अजान का वक्त हो या आरती का। जनहितयाचिका को लेकर चली बहस में कुछ वक्त़ पहले न्यायमूर्ति कानडे और न्यायमूर्ति पीडी कोड़े की द्विसदस्यीय पीठ ने कहा था कि ‘गैरकानूनी ढंग से लगाए गए लाउडस्पीकर तुरन्त हटाने चाहिएं, भले ही वह ‘गणेशोत्सव, नवरात्रि या मस्जिदों पर लगे हों-भले ही मामला किसी भी धर्म, जाति या समुदाय का हो।’ उसने आम नागरिकों को आह्वान किया था कि वह ‘ध्वनि प्रदूषण’ के खिलाफ एकजुट हों। अदालत ने जोर दिया था कि गणेशोत्सव और नवरात्रि जैसे उत्सवों में जबरदस्त शोर होता है।’ वे ध्वनि प्रदूषण का निरन्तर स्रोत होते हैं। गणेशोत्सव के दिनों में खासकर आखरी पांच दिनों में सोना मुश्किल होता है जिससे मरीजों या बुजुर्गों को अधिक परेशानी होती है।’ बात रेखांकित करने वाली है कि नवी मुंबई के एक निवासी ने उपरोक्त जनहित याचिका अदालत में दाखिल की थी, जब सूचना का अधिकार के तहत उसने एकत्रित की जानकारी में यह तथ्य सामने आया था कि उस इलाके में स्थित 49 में से 45 मस्जिदों ने लाउडस्पीकर लगाने के लिए कोई अनुमति नहीं ली है। अदालत ने आदेश दिया कि मुंबई और नवी मुंबई की जिन मस्जिदों ने बिना अनुमति लिए लाउडस्पीकर लगाए हैं, उन्हें हटाया जाए।
प्रार्थनास्थलों में लाउडस्पीकर का प्रयोग या धार्मिक आयोजनों में ध्वनि संवद्र्धक तमाम यंत्रों का प्रयोग, जो अक्सर विभिन्न समुदायों में आपसी तनाव की सबब बनता रहा है, उस सन्दर्भ में हम राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन ताहिर महमूद के एक आलेख पर गौर कर सकते हैं े जिसमें उन्होंने अदालतों द्वारा समय-समय पर लिए ऐेसे ही अन्य फैसलों की चर्चा की है। (‘लाउडस्पीकर प्रोवोकेशन’, इंडियन एक्सप्रेस 9 अगस्त 2014) उदाहरण के लिए ‘चर्च ऑफ गॉड (फुल गास्पेल) इन इंडिया वर्सेस केकेआर मैजेस्टिक कालोनी वेलफेयर एसोसिएशन एण्ड अदर्स, 1999, नामक मामले में दक्षिण के पेण्टकोस्टल चर्च द्वारा लड़े गए एक मुकदमे का वह विशेष जिक्र करते हैं। उनके मुताबिक यूं तो चर्च के अन्दर लाउडस्पीकर लगाने की परम्परा नहीं है, मगर जब दक्षिण के उपरोक्त चर्च ने उसका इस्तेमाल शुरू किया तो पड़ोसी ने अदालत की शरण ली। निचली अदालत में हार मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, वहां पर भी चर्च को मात खानी पड़ी।
अदालत के शब्द थे: ‘निर्विवाद ढंग से कहा जा सकता है कि कोई धर्म यह शिक्षा नहीं देता है कि दूसरों की शान्ति भंग करके प्रार्थना की जाए, न वह यह कहता है कि लाउडस्पीकरों या ढोल बजाने के जरिए इस काम को किया जाए...। एक सभ्य समाज में, धर्म के नाम पर, ऐसी गतिविधियों को इजाजत नहीं दी जा सकतीं जो बूढ़े या विकलांग लोगों, छात्रों या ऐसे बच्चों को बाधित करती हों जो सुबह या दिन में सो रहे हों या ऐसे लोग जो अपने अन्य काम कर रहे हों।’ एक ऐसे समय में जबकि बात-बात पर आस्था की दुहाई देते हुए समाज जीवन में कलह पैदा करने की कोशिश की जा रही हो, उस पृष्ठभूमि में यह सभी फैसले सुकून प्रदान करने वाले हैं।
अन्त में हम थोड़े पुराने मालूम पड़ते एक अन्य फैसले से प्रस्तुत चर्चा का समापन कर सकते हैं जिसमें सर्वोच्च न्यायालय की त्रिसदस्यीय पीठ ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक जिले से एक स्त्री के कथित धर्मांतरण के मसले को लेकर- जिसे लेकर पूरा इलाका सरगर्म था- दायर याचिका पर गौर कर सकते हैं। याचिकाकर्ता संस्था ने अदालत से गुजारिश की थी कि इस घटना की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का गठन किया जाए। मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढा, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और रोहिन्टन नरीमन की इस पीठ को कहना पड़ा कि बिना किसी ठोस सबूतों या दस्तावेजों के आरोप लगाने से देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर असर पड़ सकता है। सन्दर्भित मामले के प्रति गंभीरता को रेखांकित करते हुए उसे यह रेखांकित करना पड़ा कि याचिका के जरिए जो मामले को रंग दिया जा रहा है, उसके प्रति वह चिंतित हैं। उन्हें यह निेर्देश भी देना पड़ा कि ऐसा कोई काम न हो या ऐसे वैमनस्य के बोल न बोले जाएं जो अमन में खलल पैदा करें। भारत जैसे एक बहुधर्मीय, बहुसंस्कृति वाले समाज में राज्य के संचालन में या सामाजिक जीवन में आए दिन धर्म को घसीटने की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई उपरोक्त चेतावनी, एक तरह से उन तमाम अन्य अदालती आदेशों के अनुरूप रही है जिसमें उन्होंने बार-बार धर्मनिरपेक्षता के मूल्य पर टिके संविधान की हिफाजत की है। अदालतों ने बार-बार अपनी बात कही है, प्रश्न है कि क्या शेष नागरिक समाज आस्थाओं के अपने अपने घेट्टो से बाहर आकर इन पर गौर करेगा?


 

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