क्या सचमुच प्रधानमंत्री गंगा की तरह पवित्र हैं?

गंगा का पवित्र पानी कम से कम केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को प्रतिदिन पीना चाहिए। संभव हो तो प्रधानमंत्री मोदी के हर प्रशंसक, शैदाई को ‘पवित्र’ गंगा जल का पान करना चाहिए। ...

क्या सचमुच प्रधानमंत्री गंगा की तरह पवित्र हैं?
पुष्परंजन

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गंगा का पवित्र पानी कम से कम केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को प्रतिदिन पीना चाहिए। संभव हो तो प्रधानमंत्री मोदी के हर प्रशंसक, शैदाई को ‘पवित्र’ गंगा जल का पान करना चाहिए। क्योंकि बकौल रवि बाबू, ‘प्रधानमंत्री मोदी गंगा की तरह पवित्र हैं।’ राजनीति में धार्मिक रूपक का इस्तेमाल कर रवि बाबू ने बाकी प्रतिस्पर्धियों से बाजी मार ली है। लेकिन क्या गंगा को वाकई लोगों ने पवित्र रहने दिया है? नमामि गंगे वाले, और इस देश के वैज्ञानिक बेहतर बता सकते हैं कि अरबों रुपये बहा देने के बावजूद ढाई हजार किलोमीटर लंबी गंगा का जल शुद्ध क्यों नहीं हो पाया। क्यों हम बिना फिल्टर, या आरओ प्रशोधन के गंगा जल नहीं पी सकते?

गंगा जल पिलाने की हड़बड़ी तभी होती है, जब आपके किसी परिजन का आखिरी वक्त होता है। उस समय घर में हाहाकार मची होती है, ‘अरे जल्दी से गंगा जल पिलाओ!’ यह इसलिए ताकि मरने वाले की स्वर्ग प्राप्ति सुनिश्चित हो जाए। वरना डॉक्टर किसी स्वस्थ व्यक्ति को गंगा जल पीना तो छोडिय़े, कुल्ला करने तक की सलाह नहीं दे सकता। पवित्र गंगा के अध्यात्मिक महत्व से पूरा हिंदू वाङमय भरा पड़ा है। गंगा को सबसे अधिक अपवित्र, आडंबरी व घनघोर धार्मिक आस्था वाले हिंदुओं ने किया है। पवित्र गंगा में कूड़ा, कबाड़, घातक रसायन, शहर भर का मल-मूत्र, हवन, प्लास्टिक कचरे, तंत्र-मंत्र सामग्री, मूर्तियां, शवों को बहा देने के कृत्य से कोई कहां बा•ा आ रहा है? राजनीति को भी लोगों ने उसी तरह प्रदूषित किया है, जैसे गंगा को किया गया है।

व्यवहार में देश का सबसे सर्वोच्च पद प्रधानमंत्री का है। क्योंकि वह कार्यपालिका का सर्वेसर्वा है। हर भारतीय चाहेगा कि उस पद पर बैठा व्यक्ति बेदाग, निष्पक्ष, सर्वधर्म समभाव वाला, शुभ्र ज्योत्सना पुलकित हृदय वाला हो। अफसोस कि इस देश में ‘पीएमओ’ जैसी संस्था पर भ्रष्टाचार के छींटे पडऩे लगे हैं। बोफोर्स, जैन हवाला कांड, ‘कोल गेट’, और अब ‘सहारा गेट’ ने आरोपों की इस कड़ी को आगे बढ़ाया है। जाने-अनजाने मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जिस हिंदू बिंब का प्रयोग किया है, उसे प्रदूषित राजनीति का पर्याय ही माना जाना चाहिए। पहले अकेले देवकांत बरूआ हुआ करते थे, जो ‘इंदिरा इ•ा इंडिया, इंडिया इ•ा इंदिरा’ नारे के कारण भंड़ैती परंपरा के वाहक बने हुए थे। अब तो भाजपा राजनीति में भंड़ताल करने वालों की गिनती कठिन है।

बनारस में प्रधानमंत्री मोदी की देहभाषा बता रही थी कि वे राहुल गांधी के बयानों से अंदर तक तिलमिलाये हुए हैं। मोदी जी पर यह आरोप कोई नया नहीं था। इस बारे में प्रशांत भूषण और ‘कॉमन कॉज’ की रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में दस्तावेजों की जांच चल रही है। अरविंद केजरीवाल भी इस सवाल को कई मंचों पर उठा चुके हैं। मगर, मेहसाना में पचास-सौ नहीं, पूरा जन सैलाब राहुल गांधी को सुनने उमड़ पड़ा, यह समां शूल की तरह प्रधानमंत्री को चुभ रहा है।

मेहसाना प्रधानमंत्री का गृह जिला है। उनका राजनीतिक शत्रु उनके घर में घुसकर इस तरह चुनौती दे, उन्हें भ्रष्ट कहे, घूस लेने का आरोप लगाये तो दिल और दिमाग में भूकंप आएगा ही। इस ‘दिमागी सूनामी’ ने पीएम मोदी के स्वर को इतना तीखा कर दिया कि काले धन का विरोध करने वाले प्रतिपक्ष के नेताओं की तुलना पॉकिटमार के साथियों से करने लगे। बनारस में ‘प्रबुद्ध समर्थकों’ की खिलखिलाहट और तालियों से उत्साहित प्रधानमंत्री यहां तक कह गये, ‘युवा हैं... अभी भाषण सीख रहे हैं... जब से उन्होंने बोलना सीखा है, और बोलना शुरू किया है....मेरी खुशी का पार नहीं है। 2009 में पता ही नहीं चलता था कि इस पैकेट के अंदर क्या है...। पाकिस्तान जब घुसपैठियों को हिन्दुस्तान भेजता है, तो क्या करता है? वो सीमा पर कवर फायरिंग शुरू कर देता है। मुझे अब समझ में आ रहा है कि हल्ला किसकी भलाई के लिए किया जा रहा है।’

प्रधानमंत्री के इस तंजिया भाषण से क्या अर्थ निकालना चाहिए? क्या इस गंभीर आरोप को हंसी में उड़ाने के सिवा उनके सामने कोई रास्ता नहीं बचता है? हर्षद मेहता की डायरी में 4 नवंबर 1991 को उस समय के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव द्वारा एक करोड़ रुपये घूस देने का जिक्र था। जैन हवाला केस में पीवी नरसिम्हा राव के बेटे पीवी प्रभाकर राव द्वारा तीन करोड़ 55 लाख रुपये लेने का आरोप लगा था, तब क्या तत्कालीन प्रधानमंत्री इसी तरह सार्वजनिक रूप से पीड़ा प्रदर्शन कर रहे थे? या पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोलगेट के आरोपों को लेकर तांडव किया था?
यह ठीक है कि मोदी एक कुशल वक्ता के रूप में देश-दुनिया में स्थापित हो चुके हैं, लेकिन क्या उनमें इतना अहंकार होना चाहिए कि 44 लोकसभा सदस्यों वाली प्रतिपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी में नंबर दो की हैसियत वाले नेता की हंसी उड़ायें? या नोटबंदी के विरोधी नेताओं की तुलना पाकिटमार के साथियों, और अतिवादियों के समर्थकों से कर दें? मोदी जिस राजनीतिक संस्कार का बीज बो रहे हैं, उसका वृक्ष विषैला फल देगा, इस बारे में कम सोचा जा रहा है। 66 साल के मोदी निश्चित रूप से 46 साल के राहुल गांधी से पद, और उम्र में बड़े हैं। मगर राहुल गांधी 2004 में लोकसभा के सदस्य बने थे, और मोदी 2014 में। संसद की राजनीति में राहुल गांधी से मोदी, दस साल जूनियर कहे जा सकते हैं।

यों राहुल गांधी को देशवासियों ने उनके जन्म से पहचानना आरंभ कर दिया था। निश्चित रूप से उसकी वजह इस देश की परिवारवादी, दरबारी राजनीतिक व्यवस्था है। मगर, सच यह है कि गुजरात दंगा नहीं होता, तो नरेंद्र भाई मोदी को बतौर मुख्यमंत्री, देशव्यापी पहचान उतनी ही होती, जितना कि उनके समकक्ष समकालीन साथियों की होती रही है। मोदी जी जब भाजपा के महासचिव थे, तब उनके भाषण को लोग कितनी गंभीरता से सुनते थे, उसका नमूना देखना हो तो यू ट्यूब पर 2009 तक अपलोड उनके वीडियो को अवश्य देखें। खुसूसन, लंदन में गुजराती समाज की एक सभा को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी के वीडियो को देखें, जिसमें उन्हें नज़रअंदाज करते हुए लोग गप्प मारते, औरतें एक-दूसरे के बालों को कंघी करती दिखेंगी। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद एक नेता के शब्दों के मायने बदल जाते हैं। पूरा विश्व उसके शब्दों को ध्यान से सुनता है, उसके शब्दार्थ निकालता है।


2013-14 में सहारा और आदित्य बिड़ला ग्रुप पर इन्कम टैक्स और सेंट्रल विजिलेंस कमीशन की रेड पड़ी थी। उस छापे में बरामद डायरी ही सारे बवाल की जड़ है। प्रशांत भूषण तब तक बड़े अच्छे थे, जब तक इस घूस कांड की लपटें भाजपा नेताओं को नहीं छू रही थीं। दस्तावेजों को यदि सही मानें तो 8 नवंबर 2011 से 17 जून 2013 तक आदित्य बिड़ला ग्रुप की तेरह परियोजनाओं को तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने क्लीयर किया था। इसके एवज में सात करोड़ 80 लाख रुपये के पेमेंट किये गये थे। 2014 के चुनाव में मोदी जिस ‘जयंती टैक्स’ का जिक्र बार-बार मंच पर कर रहे थे, वह यही मामला था। 21 दिसंबर 2013 को मंत्री पद से, और 30 जनवरी 2015 को  कांग्रेस पार्टी से जयंती नटराजन ने इस्तीफा दे दिया था। पार्टी से इस्तीफे से पहले जिस तरह जयंती नटराजन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मिलती रहीं, यह कयास लगता रहा कि वे भाजपा ज्वाइन कर रही हैं। मगर, ऐसा हुआ नहीं।

2015 में प्रशांत भूषण ने इस मामले से संबंधित याचिका कोर्ट में दाखिल की। तब कांग्रेस ऐसा क्यों नहीं कर सकती थी?

इस प्रकरण में आयकर अधिकारी अंकिता पांडे के दस्तखत तीन एक्सेल शीट्स पर पाये गये थे। 23 सितंबर 2013 को एक करोड़ रुपये की इंट्री सीएम दिल्ली के नाम एक्सेल शीट में है। एक्सेल शीट में पांच करोड़ की इंट्री 29 सितंबर 2013 को नीरज वशिष्ट के नाम दिखाई गई, जो इस समय मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यालय में उपसचिव हैं। एक अक्टूबर 2013 को ‘सीएम छत्तीसगढ़ (नन्दी जी)’ के नाम चार करोड़ की इंट्री है। 30 अक्टूबर 2013 को ‘सीएम गुजरात’ के नाम 25 करोड़ की इंट्री जांच दल को प्राप्त दस्तावेजों में मिली है। एक जुलाई 2016 फोरेंसिक लैब टेस्ट में एक्सेल शीट पर आयकर अधिकारी अंकिता पांडे के दस्तखत सही बताये गये हैं।

यों, सहारा-बिड़ला डायरी में जेडी(यू), आरजेडी, सपा, एनसीपी, टीएमसी, बीजेडी, शिवसेना, लोजपा समेत 18 पार्टियों के सौ से अधिक नेताओं के नाम हैं, मगर इसकी सत्यता को लेकर साल भर में तय नहीं हो पाया किन कागजों में हेराफेरी की गई है। इस डायरी में चार मुख्यमंत्री शक के संजाल में हैं, जिनमें दो वर्तमान में अपने पदों पर हैं। चार में से तीन भाजपा के नेता हैं, और एक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का मुख्यमंत्री चेहरा शीला दीक्षित हैं। कायदे से राहुल गांधी को इस लड़ाई को छेडऩे से पहले शीला दीक्षित पर कार्रवाई करनी चाहिए। शीला दीक्षित पर प्रहार हो, तो भाजपा को ‘सहारा-बिड़ला डायरी’ में विरोधी नेताओं द्वारा तथाकथित घूस लेने की बात सही लगती है। यहां तक कि केंद्र में भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों की ‘राजनीतिक बलि’ चढ़ा देने के वास्ते तैयार बैठे हैं। पर जब बात प्रधानमंत्री मोदी पर आती है, तो ‘गु•ारात सीएम’ का संक्षिप्तीकरण ‘गुजरात अल्काली कैमिकल्स’ के रूप में किया जाता है। इस नये ‘अब्रीवीएशन’ के जनक रेडियो व टीवी पत्रकार रहे शुभेन्दु अमिताभ हैं, जो कुछ समय पहले तक आदित्य बिड़ला समूह में ‘ग्रुप एक्जीक्यूटिव प्रेसिडेंट’ बताये जाते थे।

बचपन में हम सबों ने दंत कथा सुनी होगी कि एक दैत्यराज का प्राण पेड़ में छिपे एक कबूतर में हुआ करता था। आज की तारीख में ऐसे छिपे ‘कबूतर’ ही ताकतवर हैं!

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