माननीय अब तो उठिए, एक नदी डूब गई है!

यह बात समझ से परे है कि कैसे जनता के धन पर अपना जीवन बिताने वाले सरकारी अधिकारी, जिनका कार्य नर्मदा घाट में बांधों व पुनर्वास की निगरानी करना था...

माननीय अब तो उठिए, एक नदी डूब गई है!
Narmada river
चिन्मय मिश्र

यह बात समझ से परे है कि कैसे जनता के धन पर अपना जीवन बिताने वाले सरकारी अधिकारी, जिनका कार्य नर्मदा घाट में बांधों पुनर्वास की निगरानी करना था, वास्तविक परिस्थितियों के ठीक विपरीत रिपोर्ट दे रहे हैं। इनके विशाल जनसमूह के जीवन और भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने के बाद क्या उन्हें चैन की नींद तो दूर की बात है, नींद भी आती होगी? यदि नींद आती है तो अब वे लाइलाज है। प्रदेश के मुख्यमंत्री एक बार भी अपनी 'प्रजाके दुखदर्द देखने और पुनर्वास बस्तियों का मुआयना करने नदी आए कि यह रहने लायक है भी या नहीं। आज नर्मदा नदी के किनारे खत्म हो गए। तालाब किनारों को लील गया।

 

घाट से हाट तक

हाट से घाट तक

आओ-आओ

तूफान के बीच आओ

मत बैठो ऐसे चुपचाप।

-भवानी प्रसाद मिश्र

नर्मदा घाटी में महाराष्ट्र के एक गांव मुखाड़ी, जो कि सरदार सरोवर परियोजना में डूब चुका है, के निवासी रान्या गोन्या पडवी का कहना है, 'हमारी नदी डूब गई है।’ नदी का डूबना अपने आप में एक विस्मयकारी घटना से है। कुछ इसे शायद प्रतीकात्मक टिप्पणी मानकर मामले को थोड़ा हल्का भी बना सकते हैं। परंतु यह एक ठोस सच्चाई है। आधुनिक भाषा में हाईकोर ट्रूथ। नर्मदा नदी डूब गई और दिल्ली से लेकर भड़ूच तक के हमारे सारे माननीय सोते ही रह गए। अब उस मृत नदी के किनारे बसे गांवों-कस्बों को उजाड़कर विशाल शमशान और कब्रिस्तान बनाने की पूरी तैयारी हो गई है। बहुत पहले पता लगा था कि ओंकारेश्वर घाट के पास के पहाड़ों पर ऐसा स्थान है जहां से कूद कर लोग आत्महत्या करते थे। यह एक तरह से स्वयं को नर्मदा नदी में समर्पित कर देने जैसा था। परंतु अब तो स्थिति ठीक विपरीत है। नर्मदा नदी को तालाब में बदलकर भी जब चैन नहीं मिला तो भारत की सबसे उपजाऊ मिट्टी भी उसके साथ नष्ट कर देने का संकल्प ले लिया गया।


सरदार सरोवर जलाशय को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के नवीनतम निर्णय की मनमानी व्याख्या कर मध्यप्रदेश की सरकार तमाम गांवों और कस्बों को बेदखल करने का ठान चुकी है। करीब 40 हजार परिवारों का अभी पुनर्वास ही नहीं हो पाया और वे अपने मूल निवास में ही रह रहे हैं। नर्मदा घाटी में कार्यरत कार्यकर्ता रेहमत बताते हैं कि हजारों बरस पहले इस इलाके में घना जंगल था। इसलिए खुले में रहना बहुत कठिन था। हिंसक जानवरों की बहुतायत जो थी। इसलिए उस जमाने में वे लोग जमीन के नीचे गड्ढे बनाकर रहते थे। इसके प्रमाण नर्मदा नदी के तट के किनारे बसे गांव चिखल्दा और खापरखेड़ा में आज भी मौजूद हैं। लेकिन मौजूदा सरकारें तो नींद में इस कदर मशगूल हैं कि वे इन पुरातत्वीय प्रमाणों को भी सहेजना नहीं चाहती। शायद ऐसा इसलिए कि यदि हमें अपने शानदार अतीत से लगाव हो गया तो आधुनिक विध्वंस (विकास) के खिलाफ माहौल बन सकता है।

निमाड़ में कभी चावल की खेती होती रही यानि पानी की बहुलता और कभी यहां शुतुरमुर्ग दौड़ते रहे अर्थात रेगिस्तानी परिस्थितियां। निमाड़ के लोगों ने इन दोनों विपरीत परिस्थितियों पर विजय पाई। परंतु अब इस जलप्रलय से बचने का मार्ग वह नहीं ढूंढ पा रहे हैं, क्योंकि यह प्राकृतिक नहीं मानव निर्मित आपदा है। सोची-समझी मुसीबत है। अभी पूरी दुनिया हतप्रभ है कि हम छठे महाविनाश की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। उत्तरी ध्रुव का अब तक का सबसे बड़ा टुकड़ा, करीब 5,500 वर्ग कि.मी. का टूट गया है। जलप्लावन का खतरा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। नगर सरदार सरोवर जलाशय के गेट बंद करके जो 240 किलोमीटर लंबी झील बनेगी उसके हुए परिणामों की जवाबदारी कौन लेगा?

भवानी बाबू लिखते हैं, 'कर रहा हूं धान में पैदा जुबान/ बेजुबां जिस दिन होगा घाव एक/ जगेगा उस दिन नया बदलाव एक/ घायलों के राज में होंगे घाव/ सब सहेंगे धूप भोगेंगे छांव/’ आज बांध प्रभावित समुदाय सड़कों पर है। जैसे शमशान में टीन शेड बनते हैं वैसे ही टीन के अस्थायी घर बनाए जा रहे हैं। जबकि कानूनन ऐसा करने का कोई प्रावधान ही नहीं है। यह कोई आकस्मिक सामने आई प्राकृतिक आपदा नहीं है यह तो ऐसी आपदा है जिस पर पिछले 50 वर्षों से विमर्श हो रहा है। ऐसे में पुनर्वास स्थलों का रहने योग्य न बन पाना शासन-प्रशासन के लिए शर्म की बात है। अभी नर्मदा सेवा यात्रा हुई उसके बाद करोड़ों पेड़ लगाए गए। इससे क्या हासिल होगा यदि पूरी पारिस्थितिकी ही बदल दी जाएगी। रान्या यूं ही नहीं कह रहे कि नदी डूब गई है। उनके पास हजारों सालों का लेखा-जोखा है, नर्मदा जी का।

वे उनके जैसे हजारों आदिवासी अपना सब कुछ लुट जाने के बाद, डूब जाने के बाद भी उस नदी जिसे वे मृत मान रहे हैं के पास से हट नहीं रहे हैं। वे जानते हैं कि किसी न किसी रूप में प्रकृति पुन: पुन: पुनर्जन्म लेती है और नर्मदा नदी भी पुन: बढ़ेगी। अमेरिका व अन्य स्थानों पर बांधों को तोड़कर नदियों को मुक्त कराया जा रहा है, लेकिन हमारे यहां अभी भी वही पुरानी सोच बरकरार है। हजारों लोगों को तयशुदा पुनर्वास सरकारों ने नहीं दिया। पूरा तंत्र एक गहरी निद्रा में है। उसकी आंखें खुली जरूर हैं परंतु उन्हें दिख कुछ भी नहीं रहा है। एक अजीब किस्म की विभीषिका की तैयारी नर्मदा घाटी में चल रही है। प्रशासन को समझना होगा कि संविधान ही इस देश को चलाता है। किसी के आदेश या निर्देश इसी के अंतर्गत ही होना चाहिए।

यह बात समझ से परे है कि कैसे जनता के धन पर अपना जीवन बिताने वाले सरकारी अधिकारी, जिनका कार्य नर्मदा घाट में बांधों व पुनर्वास की निगरानी करना था, वास्तविक परिस्थितियों के ठीक विपरीत रिपोर्ट दे रहे हैं। इनके विशाल जनसमूह के जीवन और भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने के बाद क्या उन्हें चैन की नींद तो दूर की बात है, नींद भी आती होगी? यदि नींद आती है तो अब वे लाइलाज है। प्रदेश के मुख्यमंत्री एक बार भी अपनी 'प्रजा’ के दुखदर्द देखने और पुनर्वास बस्तियों का मुआयना करने नदी आए कि यह रहने लायक है भी या नहीं। आज नर्मदा नदी के किनारे खत्म हो गए। तालाब किनारों को लील गया। जबकि इसी नर्मदा जिसे वे रेवा संबोधित करते थे, के तट पर बैठ कर कभी भवानी बाबू ने लिखा था-'और ये किनारे:/ पर्याय हैं गंतव्य के/ इनके कोई लक्षण तो हैं/ राम हों या गौतम हों या गांधी/ विवेकानंद या ईसा/ महावीर/ मार्क्स या मूसा/ लोहिया/ जयप्रकाश/ भाभा/ निराला या/ टैगोर/ या ऐसे ही अनेक और/ ये किनारे ही तो बने बहती रेवा के/’  परंतु यदि वे आज होते तो राज्य के पास बैठकर रेवा का शोकगीत ही लिख रहे होते। आज से करीब 30 वर्ष पहले मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव व नर्मदा योजना प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे सुशीलचंद्र वर्मा ने कहा था- 'जानबूझ कर ठीक से सर्वे नहीं होता। बांध के सरोवर में डूबने वाले इलाकों की ईमानदारी के साथ जानकारी नहीं दी जाती, पूरी कोशिश की जाती है कि मुआवजे के मामले में सरकारें सस्ते में निपट जाएं।’ इसके अलावा भी उन्होंने बहुत कुछ लिखा था।

यह बात ही समझ से परे है कि किसी देश या राज्य की सरकार अपने कमजोर नागरिकों के साथ खड़ी नहीं दिखती। वह लगातार उनमें टकराव बनाए रखती हैं, जिससे कि बात बातचीत तक ही नहीं पहुंचे। यदि जनता से बात करेंगे तो उनकी सच्ची बात मानना भी पड़ सकता है। इसलिए बात ही मत करो। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने इसी चाल को अपनाया है। मगर घाटी के लोग कहते हैं, 'घड़ी राख होने की आए। बुरा इसमें कुछ भी नहीं है/ बुरा यह है कि मन राख होने से घबराए।/मैं खुश हूं वह नहीं हो रहा है/’ घाटी के लोगों को 15 जुलाई का अल्टीमेटम मिल चुका है, अपने घर , खेत, खलिहान सब कुछ छोडऩे का। परंतु वे डटे हैं। लड़ रहे हैं। उनके हाथ सिर्फ मुठ्ठी बांध कर नारा लगाने के लिए उठ रहे हैं।

बदला लेने के लिए नहीं।’ सैकड़ों लोग अनशन पर हैं,परन्तु शासन-प्रशासन पेट पर हाथ रखकर डकार ले रहा है। लोकतंत्र की इतनी अनदेखी तो कभी सोची ही नहीं थी। परन्तु विश्वास पर ही सृष्टि टिकी है। घाटी के लोग इस मानव निर्मित प्रलय से टकराएंगे जरूर और यदि यह प्रलय आ भी गया तो वे एक नया संसार जरूर बनाएंगे। जैसा पिछले प्रलय के बाद भी हुआ था। भवानीबाबू की लिखी ये पंक्तियां जैसे रान्या और साथियों के लिए ही लिखी गई है- 'यह धार नदी का, अब जो टूट गया है। यह घाट नदी का जो अब फूट गया है। वह वहां बैठकर रोज-रोज गाता था। अब यहां बैठना उसका छूट गया है।’

भरोसा रखिए रान्या की तीसरी पीढ़ी फिर उस धार पर जरूर गाएगी।

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