होली के रंग, राजनीति के संग

होली की पूर्व बेला पर फिल्म बद्रीनाथ की दुल्हनिया का एक होली गीत आया है, जिसमें चलत मुसाफिर मोह लियो रे, की भी झलक है और रंग बरसे की भी, उसमेंंकबीरा सररर भी है और अंग्रेजी वाला रैप भी।...

देशबन्धु
होली के रंग, राजनीति के संग
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होली की पूर्व बेला पर फिल्म बद्रीनाथ की दुल्हनिया का एक होली गीत आया है, जिसमें चलत मुसाफिर मोह लियो रे, की भी झलक है और रंग बरसे की भी, उसमेंंकबीरा सररर भी है और अंग्रेजी वाला रैप भी। हुरियारों को मस्ती से भर देने वाला यह गीत तरह-तरह के रंगों से भरा है। ठीक वैसे ही, जैसे होली की पूर्व बेला पर आए चुनावी नतीजे कई तरह के रंगों से रंगे हैं। वैसे मोदीजी के मन की बात तो यही थी कि 11 मार्च को केसरिया होली मनाई जाए। उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के लोगों ने उनके मन की बात का मान रखा, लेकिन पंजाब, गोवा और मणिपुर में केसरिया रंग नहींपहुंचा। यूं भाजपा का भी ज्यादा जोर उत्तरप्रदेश पर ही था। बल्कि चुनावी सभाओं की खबरें देख-देख कर यही लगता था कि देश में पांच नहींएक ही राज्य मेंंचुनाव हो रहे हैं। तरह-तरह के बयान, कब्रिस्तान-श्मशान, कसाब, नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, काम बोलता है, कारनामा बोलता है, गधों का प्रचार न करें, बुआ-बबुआ, इन सबसे नया चुनावी साहित्य गढ़ा जा सकता है। हर चुनाव में एकाध-दो किस्से इस तरह के होते हैं, जिन पर टीवी चैनलों को एक-दो दिन चर्चा खींचने का अवसर मिल जाए, लेकिन इस बार तो 24 घंटों के खबरनवीसों का भी दिमाग वैसे ही घूमा हुआ था, जैसे होली में भांग के नशे में घूम जाता है। एक जुमले पर चर्चा का माहौल बनता नहींकि दूसरा हवा में उछलने लगता। तिस पर प्रधानमंत्री का चुनावी अवतार ऐसा कि आज यहां और कल वहां। खबरें देते और विश्लेषण करते, हाथ-पैर, दिल-दिमाग सब थक गए। अच्छा है कि कम से कम उप्र, उत्तराखंड और पंजाब में यह माथापच्ची नहींकरनी पड़ेगी कि सरकारें किसकी बन रही हैं। होली की धूम यहींअधिक होती है और इस मौज में शरीर और दिमाग, दोनों की थकान उतर जाएगी। लेकिन गोवा और मणिपुर में अभी राजनीति के कुछ और रंग देखने बाकी हैं। कांग्रेस ने यहां भाजपा से बाजी मार ली है, लेकिन अभी जीत बाकी है। अब जबकि अमित शाह ने अपना नया एजेंडा घोषित कर दिया है कि अगले छह महीनों में जो विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, उन पर भी जीत दर्ज करना है, साथ ही जिन 120 लोकसभा सीटों पर भाजपा नहींहै, वहां अपनी स्थिति मजबूत करना है, तो यह देखना रोचक होगा कि ऐसे में कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों की रणनीति और राजनीति कैसी होती है। फिलहाल तो कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी परीक्षा गोवा में सरकार बनाने और मणिपुर में सरकार दोहराने की है। भाजपा से अधिक सीटें लाना ही पर्याप्त नहींहै, बल्कि सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों को साथ जोडऩे का कौशल भी दिखाना होगा। भाजपा इस कौशल में उससे अधिक माहिर है, यह चुनाव दर चुनाव जाहिर हो रहा है। गोवा, मणिपुर में कांग्रेस की सरकार बन जाए तो उसकी होली की खुशी तिहरी हो जाएगी। पंजाब में अकेले बहुमत लाकर उसने यह तो बता ही दिया है कि अभी देश कांग्रेस मुक्त नहींहुआ है। हालांकि भारत के नक्शे पर तेजी से केसरिया रंग फैल रहा है, लेकिन किसी भी रंग की खूबसूरती तब और बढ़ जाती है, जब उसके साथ दूसरे रंग भी मिले हों। भारत के संदर्भ में तो यह बात और भी मायने रखती है, क्योंकि यहां की खासियत ही विविधरंगी है। धर्म, भाषा, जाति, संस्कृति और इनके साथ-साथ राजनीति के भी कई रंग हैं।
बद्री की दुल्हनिया और चुनावी नतीजों से निकली बात कहां से कहां फैल गई, जैसे होली के रंग फैल जाते हैं। बहरहाल, चुनावों का एक संस्करण समाप्त हुआ और साल के अंत तक गुजरात, हिमाचल, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा में अगला चुनावी संस्करण प्रारंभ होगा। तब तक जीतने वाले जश्न मनाएं, नए किले फतह करने की तैयारी करें, हारने वाले आत्ममंथन करें कि कमी कहां रह गईं। पर उससे पहले सारे बैर-भाव, कटुता परे रखकर होली का पर्व मना लें, जनतंत्र इससे प्रसन्न होगा।


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