किसान आत्महत्याओं के इस नए दौर में

चिन्मय मिश्र : गांधी जी के इस प्रश्न का उत्तर भारत सरकार व राज्य सरकारें तो नहीं दे पाईं लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एन सी आर बी) ने सप्रमाण दे दिया है।...

चिन्मय मिश्र

चिन्मय मिश्र
कई साल हुए मैंने एक कविता पढ़ी थी, जिसमें किसान को दुनिया का पिता कहा गया है। अगर परमात्मा देने वाला है,
तो किसान उसका हाथ है। हम पर किसान का जो ऋण है, उसे चुकाने के लिए हम क्या करने वाले हैं?’’

-महात्मा गांधी
गांधी जी के इस प्रश्न का उत्तर भारत सरकार व राज्य सरकारें तो नहीं दे पाईं लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एन सी आर बी) ने सप्रमाण दे दिया है। ब्यूरो ने बताया कि सन् 2015 में कुल 8007 किसानों ने आत्महत्या की है जो कि सन् 2014 में किसानों द्वारा की कई कुल आत्महत्याओं से 42 प्रतिशत अधिक हैं। सन् 2014 में 5650 किसानों ने आत्महत्या की थी। यहां इस तथ्य पर गौर करना भी अनिवार्य है कि इन आंकड़ों में वह किसान शामिल नहीं हैं जो कि अपने पिता या पति के नाम पर चढ़े खेतों में काम करते/करती हैं। इन आंकड़ो वे कृषि श्रमिक भी नहीं आए हैं जिन्होंने आत्महत्या की हैं। वैसे यह राहत की बात है कि उनकी संख्या में कमी आई है। सन् 2014 में 6710 कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की थी और सन् 2015 में 4595 ने।
विचारणीय तथ्य यह है कि कुल 8007 आत्महत्याओं में से 6431 आत्महत्याएं 7 राज्यों यथा महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में हुई हैं। बकाया 1576 बाकी देश में। सर्वाधिक 4291 महाराष्ट्र के खाते में हैं। यदि सन् 1995 से गणना करें तो हम पाते है अब तक करीब 3.18 (तीन लाख अठारह हजार) से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। परंतु सरकार और समाज के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही है। किसान यदि परमात्मा का हाथ है तो उसके हाथ में फॉसी का फंदा और कीटनाशकों की बोतलें क्यों और कैसे पहुंच रहीं हैं? अपने खेत में लगे पेड़ की छाह में बैठने वाला किसान उसी पेड़ पर लटक कर जान देने को क्यों मजबूर है? सरकार तो यह दावा कर ही सकती है कि यदि इतनी आत्महत्याएं हुई हैं तो फिर बवंडर क्यों नहीं मच रहा? वैसे नोटबंदी को लेकर कुछ इसी तरह के तर्क दिए जा रहे हैं।
  हममें से जो लोग थोड़ा बहुत भी भारतीय इतिहास, संस्कृति, समाज, अर्थशास्त्र के बारे में जानते हैं उन्होंने इस बात का पूर्ण भान है कि भारतीय किसान कभी भी न तो बहुत अमीर रहे हैं और न ही पूर्ण ऋणमुक्त। प्रेमचंद की कहानियों से इसकी सार्थक पुष्टि भी की जा सकती है। तो फिर ऐसा क्या हो गया कि भारतीय किसान समुदाय को आत्महत्या करने का ‘‘दौरा’’ सा पड़ गया? प्रसिद्ध पत्रकार पी. साइनाथ ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र में लिखा था कि, किसान आत्महत्याएं किसी कानून आदि की वजह से नहीं बल्कि शासन की नीतियों की वजह से हो रही हैं। प्रधानमंत्री अवश्य बदल गए लेकिन नीतियां नहीं बदलीं। वही नीतियां जारी हैं और उसके परिणामस्वरूप किसान आत्महत्याएं भी। जैसे जैसे किसान समुदाय को यह विश्वास होता जा रहा है कि कृषि संबंधित नीतियां नहीं बदलेंगी वैसे वैसे आत्महत्याओं का आकड़ा भी बढ़ता जा रहा है। यानी नाउम्मीदी का बढ़ता नैराश्य इन दर्दनाक हादसों को लगातार बढ़ाता जा रहा है।
गौरतलब है सन् 1950 से लेकर सन् 1990 तक भारत में कृषि उत्पादन लगातार बढ़ रहा था और यह जनसंख्या की वृद्धि दर से भी अधिक था। सन् 1980 में कृषि विकास दर 4 प्रतिशत से भी अधिक थी। उदारीकरण के बाद इसमें दो तिहाई तक की कमी आई है। यहां इस तथ्य पर भी ध्यान देना होगा कि सन् 1990 के दशक में वैश्वीकरण की शुरुआत हुई और हमे खाद्यान्न का पुन: आयात प्रारंभ करना पड़ गया। सन् 1991 में ढ़ांचागत समायोजन कार्यक्रम के नाम से उदारीकरण को ठोस रूप से क्रियान्वित करने की प्रक्रिया जोर शोर से प्रारंभ हो गई। विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन के आदेशों और दिशार्निदेशों का आज्ञाकारी सेवक की तरह पालन व क्रियान्वयन शुरु हो गया। इन्हीं के तहत नई आयात व निर्यात नीतियां बनी। परिणामस्वरूप खाद्यान्नों और अन्य कई कृषि उत्पादों के बिना रोकटोक आयात की अनुमति भी मिलती चली गई। इसने भारतीय कृषि के आधार को ही छिन्न-भिन्न कर डाला। कृषि पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा। नई उदारवादी नीतियों के तहत सरकारों ने कृषि निवेश से कमोवेश अपने को बाहर निकालना प्रारंभ कर दिया। नतीजतन नव उदारवाद के आधिकाारिक अवतरण के महज 4 साल बाद से यानी सन् 1995 से किसान आत्महत्याओं का जो दौर प्रारंभ हुआ वह 22 साल बाद भी न केवल बदस्तूर जारी है बल्कि अस्थायी उतार के बाद एक बार पुन: छलांग मार रहा है। सन् 2015 के आंकड़े इसी कड़वी सच्चाई की गवाही दे रहे हैं।
इस बीच अतुल्य भारत और शाइनिंग इंडिया जैसे तमाम उपक्रम भी किसी काम न आए। सरकारों ने स्थितियों से निपटने में जब स्वयं को असमर्थ पाया तो बड़े पैमाने पर शहरीकरण का जुमला और झुनझुना हमें पकड़ा दिया। इसके पीछे सीधा सा कारण यही था कि वे किसी भी सूरत में भारतीय कृषि का उद्धार करना ही नहीं चाहते। भू-क्षरण की वजह से कृषि उत्पादकता लगातार घट रही है परंतु रासायनिक खाद व कीटनाशकों का प्रयोग कम नहीं किया गया। उधर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीजों का बाजार किसान और किसानी दोनों को बर्बाद कर रहा है। जानते बूझते हुए भी सबकुछ न केवल यथावत जारी रखा गया बल्कि इसे और बढ़ावा दिया जाने लगा। प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि अब सामान्य यूरिया के स्थान पर नीमयुक्त यूरिया आ गया है। परंतु मूल रासायनिक गुण तो एक से ही हैं। किसानों की सब्सिडी छीन कर कंपनियों को हस्तांतरित करने का पैमाने बढ़ता चला गया। वहीं दूसरी ओर सस्ते ऋण के नाम पर किसानों को भ्रमजाल में फंसाया गया। पहले तो केवल साहूकार और सूदखोर ही उसके पीछे पड़ते थे। अब बैंक व पंचायत जैसे सरकारी महकमे भी उसे शिकारी की मानिंद सब ओर से घेर रहे हैं। सार्वजनिक तौर पर जिस तरह से उसे डराया, धमकाया और जलील किया जाने लगा और उसे यह जतला दिया गया कि भारतीय लोकतंत्र में वह सबसे निचली पायदान है तो वह पूरी तरह से नाउम्मीद हो गया। अंतत: भारतीय सभ्यता के करीब 10 हजार साल के ज्ञात इतिहास में पहली बार वह कृषि संबंधित बाधाओं की वजह से आत्महत्या को मजबूर हो गया। इसके बावजूद भारतीय समाज अपने पेट पर हाथ फेरता डकार लेकर निर्विकार भाव से इस जघन्यता का साक्षी बना हुआ है। आज भारतीय किसान परिवार की मासिक आय (औसत) करीब 6426 रु. प्रतिमाह बैठती है। यानी प्रति सदस्य करीब 1200 रु. महीना और प्रतिदिन 40 रु.। इतनी आमदनी में वह अपना पेट भी ठीक से नहीं भर सकता तो ऋण की वापसी कहां से करेगा। वहीं दूसरी ओर हम इस बात का बड़े घमंड और अहंकार से उल्लेख करते हैं कि भारत में एशिया के सबसे ज्यादा अरबपति निवास करते हैं!
सन् 2004 में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने लोकसभा में कहा था कि उदारीकरण के बाद 1 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। उनके गृह राज्य महाराष्ट्र में सिंचाई के लिए सबसे ज्यादा बांध बने हैं और उसी राज्य में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं भी हुई हैं। पिछले दिनों विदर्भ में हुई आत्महत्याओं को लेकर सनसनी खेज रहस्योद्घाटन सामने आया है। कई वर्षों के बाद वहां अच्छी फसल हुई लेकिन नोटबंदी की वजह से नकदी की कमी के चलते किसानों को ठीक भाव नहीं मिले और अच्छी फसल के बावजूद उनकी उम्मीद टूट गई। वहीं मध्यप्रदेश में पिछले तेरह वर्षों से भाजपा सरकार है। विगत दो वर्षों से उसे राष्ट्रीय कृषि कर्मण पुरस्कार भी मिल रहा है। कृषि वृद्धि दर असाधारण 18 से 24 प्रतिशत बताई जा रही है। जबकि इस राज्य में सन् 2016 में पिछले 15 वर्षों में सर्वाधिक 1695 किसान व कृषि श्रमिक आत्महत्या कर चुके हैं। यह आंकड़े नवंबर तक के हैं, जिन्हें विधानसभा में दिया गया है। प्रदेश में अब भी औसतन 3 किसान प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं।
कई बार दोहराई जा चुकी पाश की इन पंक्तियों को पुन: दोहराइये, ‘‘सबसे खतरनाक होता है/मुर्दा शांति से भर जाना/न होना तड़प का सब सहन कर जाना/घर से निकलना काम पर/और काम से लौटकर जाना/सबसे खतरनाक होता है/हमारे सपनों का मर जाना। ’’ याद रखिए, यदि किसान के सपने मर गए तो भारत भी नहीं बचेगा।


 

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