गांधी को झुठलाता गणतंत्र

चिन्मय मिश्र : मध्यप्रदेश के अखबारों में 22 जनवरी को प्रथम पृष्ठ पर एक छायाचित्र प्रकाशित हुआ। इसमें म.प्र. के आदिवासी बहुल जिले बड़वानी में राजस्तरीय जनजाति सम्मेलन के मंच पर स्थानीय भाजपा सांसद ...

चिन्मय मिश्र

चिन्मय मिश्र
चीजों के गिरने के नियम होते हैं!
मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते।
लेकिन चीजें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं
अपने गिरने के बारे में मनुष्य कर सकते हैं।
 
-नरेश सक्सेना
मध्यप्रदेश के अखबारों में 22 जनवरी को प्रथम पृष्ठ पर एक छायाचित्र प्रकाशित हुआ। इसमें म.प्र. के आदिवासी बहुल जिले बड़वानी में राजस्तरीय जनजाति सम्मेलन के मंच पर स्थानीय भाजपा सांसद सुभाष पटेल को नेता प्रतिपक्ष व कांग्रेसी विधायक बाला बच्चन की कालर पकड़ते दिखाया गया है। मंच पर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान असहाय से खड़े न•ार आ रहे हैं। पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार कार्यकर्ता बेला भाटिया को घर से निकालने की मुहीम इसलिए गुंडागर्दी की हदें पार कर गई हैं क्योंकि उनकी सक्रियता की वजह से 16 आदिवासी महिलाओं के साथ हुए बलात्कार में पुलिस की भूमिका को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वीकार कर संबंधित पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है। तीसरी घटना तमिलनाडु से जलीकट्टू से संबंधित है, जहां सर्वोच्च न्यायालय के पुराने आदेशों को शून्य करते हुए पहले अध्यादेश जारी किया गया और अगले ही दिन राज्य विधानसभा ने संबंधित विधेयक भी पारित कर दिया। उधर इसी मसले पर केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से अपना निर्णय टालने का आग्रह भी किया था।
उपरोक्त तीनों मामलों से समझ आता है कि भारतीय गणतंत्र में क्रमश: विधायिका (संसद व विधानसभा), कार्यपालिका और न्यायपालिका अपनी विश्वसनीयता के सबसे निम्न दौर में प्रवेश करते जा रहे हैं। गांधी जी कहते थे, ‘स्वराज्य एक पवित्र शब्द है, वह एक वैदिक शब्द है, जिसका अर्थ आत्मशासन व आत्मसंयम है।’ वे आगे कहते हैं, ‘यदि स्वराज्य हो जाने पर लोग अपने जीवन की हर छोटी बात के नियमन के लिए सरकार का मुंह ताकेंगे तो स्वराज्य सरकार किसी काम की नहीं होगी।’ इतना ही नहीं, उनका स्पष्ट कहना था, ‘लोकतंत्र व हिंसा का मेल बैठ ही नहीं सकता।’ वस्तुत: ऊपर वर्णित तीनों हालिया घटनाएं भारतीय नागरिकों में बढ़ती हिंसा की स्वीकार्यता को सामने लाती हैं और जलीकट्टू वाले मामले में तो हमने जानवरों को भी नहीं बख्शा। सांड को डराना, शराब पिलाना, उसे शारीरिक चोट पहुंचना और यहां तक कि उसकी आँखों में मिर्ची भर उसे उत्तेजित करना- क्या यही संस्कृति है? इस कथित खेल में सांड के साथ मनुष्य भी मारे जाते हैं। इस वर्ष अभी तक दो व्यक्ति मारे जा चुके हैं। हमें इससे संबंधित घटनाक्रम और भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को मिला कर देखना होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि भीड़ की उग्रता के आगे व्यवस्था ने घुटने टेक दिए। जबकि दूसरी ओर देश के विभिन्न भागों में चल रहे अहिंसक संघर्षों को सरकारें बलपूर्वक दबाती जा रही हैं। उदाहणार्थ नर्मदा घाटी में पिछले 32 वर्षों से नर्मदा बचाओ आंदोलन के अहिंसक आंदोलनकारियों से सरकार संपर्क तक नहीं करना चाहती।
26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ था। उसके करीब दो वर्ष पूर्व 30 जनवरी को गांधीजी की हत्या कर दी गई थी। अतएव दोनों तारीखों का एक साथ स्मरण अनायास ही हो आता है। भारतीय गणतंत्र जिन आकांक्षाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था, वर्तमान परिस्थितियां उससे कतई मेल नहीं खातीं।  भारतीय शासनतंत्र का आम जनता से संवेदनात्मक संबंध समाप्त होता जा रहा है। हमारा पूरा तंत्र देश को एक बाजार और कारखाने में बदल देने का निश्चय कर चुका है। भारतीय सामाजिक व सांस्कृतिक विविधता उसके लिए अब कोई मायने नहीं रखती। विकास कुछ-कुछ अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की तरह हो गया है, जिसे कोई निर्देशित नहीं करता। वह अपनी मर्जी से अपना रास्ता तय करता है और विभिन्न नामों से सुसज्जित शासनतंत्र की सेनाएं उसके पीछे चलती रहती हैं। विकास का अश्वमेघ घोड़ा जहां भी रुकता है वहां की खड़ी फसल, बस्ती, शहर, गांव, जंगल, पेड़, पौधे, सब कुछ नेस्तनाबूत कर विकास को प्रस्थापित कर दिया जाता है।
प्रख्यात लेखक मुक्तिबोध जिनका कि यह जन्मशताब्दी वर्ष भी है, ने बहुत स्पष्टता के साथ लिखा है, ‘अहंकार अपना एक इन्द्रजाल खड़ा करता है। तर्क, युक्ति, सही और आधी सही बातों का एक अस्त्रागार उसके पास है। लेखक अपनी लेखनी से भी अपने अहंकार की तुष्टि करता है। वह खुद ही अपनी आंखों के सामने कैसा-कैसा अभिनय करता है।’ हम यहां लेखक के स्थान पर इच्छित पदनाम डाल दें तो भी वास्तविकता बदलेगी नहीं। नीति निर्माताओं का अहंकार दिनों-दिन आकाश छूता जा रहा है। यदि कानून बनाने वाले सांसद व विधायक ही कानून हाथ में ले लेगें और पुलिस विभाग अपने खिलाफ शिकायत करने वालों के पुतले जलाएं और सोशल मीडिया पर कोई वरिष्ठ अधिकारी अपशब्दों का प्रयोग करें। (माओवादी और उनके तुम्हारे जैसे कुत्तों को पत्थर मारकर बाहर निकाल दिया जाएगा। दूसरी टिप्पणी है ( स्ह्लशश्च क्चद्बह्लष्द्धद्बठ्ठद्द )। न्यायालय व शासन के मध्य चलते विवाद के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति न हो और आम जनता न्याय के लिए तरसती रहे।  यह सब अहंकार नहीं तो और क्या है। इसी  गणतंत्र के लिए क्या अद्भुत संविधान निर्मित हुआ था?
गांधीजी ने 21 मार्च 1921 को कहा था, ‘पश्चिम का आज का प्रजातंत्र जरा हल्के रंग का नाजी और फासिस्टतंत्र है, ज्यादा से ज्यादा यह कहा जा सकता है कि यह प्रजातंत्र साम्राज्यवाद की नाजी और फासिस्ट चाल को ढंकने के लिए आडंबर है। हिन्दुस्तान सच्चा प्रजातंत्र गढऩे का प्रत्यन कर रहा है। अर्थात ऐसा प्रजातंत्र जिसमें हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होगा।’ परंतु एक शताब्दी बीतने को आई भारतीय गणतंत्र हिंसामुक्त नहीं हो पा रहा है।  बीच के कुछ वर्षों में स्थितियां गणतंत्र के कुछ अनुकूल अवश्य हुई थीं परंतु अब तो हाल-बेहाल है। नोटबंदी जैसे निर्णय एकतरफा लिए जा रहे हैं। राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रता को दरकिनार किया जा रहा है। न्यूनतम सरकार का नारा उछाल कर हम पर एक ऐसी व्यवस्था लादी जा रही है जिसमें हम अपनी मर्जी से उठ-बैठ भी नहीं सकते! पूरा तंत्र अपनी असफलता को छिपाने के लिए सहस्राब्दियों से निर्मित भारतीय सामाजिक व्यवस्था को समूल नष्ट कर देना चाहता है।  वास्तविक शहीद दिवस 30 जनवरी है न कि 26 जनवरी। 26 जनवरी को एक गंभीर बौद्धिक राष्ट्रीय समारोह की तरह मनाना चाहिए था। इस दिन भारतीय लोकतंत्र व संविधान जो कि कमोबेश पर्याय ही हैं, पर मंडरा रहे खतरों पर सारगर्भित बहस भी होनी चाहिए थी।
हमें यह स्वीकारना होगा कि बढ़ती आर्थिक असमानता वंचित वर्ग के खिलाफ सबसे बड़ी हिंसा है। देश के 8 व्यवसायी यदि 50 प्रतिशत गरीब आबादी के बराबर की संपत्ति के मालिक हैं तो हमें संविधान की उद्देशिका में लिखे ‘सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय एवं प्रतिष्ठा एवं अवसर की समता’ की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होना ही होगा। परंतु नई वैश्विक आर्थिक नीतियां हमें अत्यन्त स्वार्थी बना रहीं हैं और अधिकांश नागरिक अपने निजी स्वार्थ या अधिकतम परिवारिक स्वार्थपूर्ति से आगे नहीं निकल पा रहे हैं। हमारे आंतरिक डर ने हमसे सही-गलत चुनाव करने का विवेक तक छीन लिया है। हिंसा अब शासन करने का औजार बनती जा रही है। हमें इससे छुटकारा पाना ही होगा।
आज चारों ओर गांधी की बात जरूर हो रही है, जबकि वास्ताविकता यही है कि इस नई सरकार में उनके हिस्से सिर्फ  ‘सफाई व स्वच्छता’ आई और बदले में उनकी खादी भी श्रीहीन कर दी गई है। वे कहते थे, ‘यदि भारत ने हिंसा को अपना धर्म स्वीकार कर लिया और यदि मैं उस समय जीवित रहा, तो मैं, भारत में नहीं रहना चाहूंगा। तब वह मेरे मन में गर्व की भावना उत्पन्न नहीं करेगा। मेरा देशप्रेम मेरे धर्म द्वारा नियंत्रित है।’ गांधीजी का धर्म उनका नैतिक बल ही था। आज के शासनतंत्र का धर्म क्या हिंसा बनता जा रहा है? हम कैसे इस वैश्विक संकट से निपट सकेंगे? बढ़ती असहिष्णुता से आपसी खाई बढ़ती जा रही है, उसे तुरंत ही रोकना होगा।
विनोबा कहते हैं, ‘एक कहता है : आदमी सचमुच भूखों मर रहे हैं। दूसरा जवाब देता है, ‘भूखों नहीं मर रहे हैं। किसी न किसी बीमारी से मर रहे हैं।’ भूखों को भी मरने से पहले कोई न कोई बीमारी पकड़ ही लेती है। स्वामी रामदास ने कहा है, ‘कुछ खाने को नहीं मिलता, नहीं मिलता, नहीं मिलता। जाने के लिए कोई ठौर नहीं है, नहीं है, नहीं है। गाने की तमन्ना कहां से हो, कहां से हो, कहां से हो? मांगने के लिए कहां जाएं, कहां जाएं, कहा जाएं।’
आज आवश्यकता इस बात की है कि गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं स्वीकारते हुए हम बापू और तमाम शहीदों के सपनों को भी याद करें और अपने संकुचित दायरों से बाहर निकल कर खुद से सवाल करें।


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