जब बुद्ध मुस्कुराए

बाजपेयी सरकार के वक्त परमाणु क्षेत्र में जो उपलब्धि हासिल हुई, उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि उसकी नींव इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में डाली गई थी...

देशबन्धु
जब बुद्ध मुस्कुराए
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 3 वर्ष के कार्यकाल में कम से कम 3 सौ बार पिछले 60 वर्षों की सरकारों को नाकारा साबित करने की कोशिश की होगी। वे और उनके सहयोगी देश में फैली हर तरह की अव्यवस्था और कमजोरी के लिए पिछली सरकारों को कोसते हैं कि उन्होंने केवल राज किया, काम नहींकिया। और जितनी भी योजनाएं, नीतियां, कार्यक्रम वे बनाते या लागू करते हैं, उसमें यही बताने की कोशिश करते हैं कि देश में जो भी काम हो रहा है, वो मोदीजी के कारण हो रहा है। यह संयोग था कि जब मोदीजी ने प्रधानमंत्री पद संभाला, उसके कुछ समय बाद ही भारत ने मंगल अभियान में सफलता प्राप्त की। देश ने देखा कि मोदीजी वैज्ञानिकों को कार्यक्रम की सफलता के लिए बधाई दे रहे हैं, लेकिन यह भी देखना चाहिए था कि यह कार्यक्रम यूपीए सरकार के वक्त शुरु हुआ था। कुछ समय पहले जम्मू-कश्मीर में सबसे बड़ी सुरंग का उद्घाटन मोदीजी ने किया, उसका निर्माण कार्य भी डा.मनमोहन सिंह के वक्त शुरु हुआ था। आज जिस आधार कार्ड की अनिवार्यता केंद्र सरकार हर जगह लागू करवा रही है, उसका आधार भी यूपीए सरकार के वक्त खड़ा हुआ। कहने का अर्थ यह कि देश में सरकारें बदलती रहती हैं, सत्ता पर कभी एक दल काबिज होता है, कभी दूसरा, लेकिन 1947 से लेकर आज तक भारत विभिन्न क्षेत्रों में तरक्की कर रहा है, तो इसके पीछे एक बड़ा कार्यबल है, जो राजनैतिक गुणा-भाग के परे अपना दायित्व निभाता जा रहा है। देश इन्हींलोगों के कारण चलता है, कोई भी सरकार अकेले देश चलाने का श्रेय नहींले सकती। अभी 11 मई को जब देश ने राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस मनाया तो उस अवसर पर नरेन्द्र मोदी ने अटल बिहारी बाजपेयी के साहस की प्रशंसा की। दरअसल 1998 में 11 मई को ही भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था। एक साल बाद 1999 से भारत के वैज्ञानिक कौशल और तकनीकी प्रगति को चिह्नित करने के लिए 11 मई के दिन को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1998 में 11 से 13 मई के बीच पांच परमाणु परीक्षणों से भारत ने पूरे विश्व में अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। जिसके बाद भारत को कुछ प्रतिबंधों का सामना भी करना पड़ा था। नरेन्द्र मोदी ने परमाणु परीक्षण की 19वींवर्षगांठ पर कहा कि अटल जी के नेतृत्व में सफलतापूर्वक परीक्षण किए गए और पूरे विश्व ने भारत की ताकत को देखा। वैज्ञानिकों ने देश को गौरवान्वित किया। कितना अच्छा होता अगर मोदीजी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी याद करते जिनके नेतृत्व में 1998 से बहुत पहले 1974 में 18 मई को भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था। बाजपेयी सरकार के वक्त परमाणु क्षेत्र में जो उपलब्धि हासिल हुई, उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि उसकी नींव इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में डाली गई थी। तब भारत को आजाद हुए 27 साल हुए थे। देश कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनने की प्रक्रिया से गुजर रहा था। वह भारत निर्माण का दौर था, जिसमें हर कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ रहा था। ऐसे में इंदिरा गांधी ने सीमित संसाधनों के बीच परमाणु परीक्षण में आगे बढऩे की हिम्मत दिखाई थी। परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना के नेतृत्व में पूरा कार्यक्रम आगे बढ़ा। बम के डिजाइनर, राजगोपाल चिदंबरम, टीम के उपनेता पी के आयंगर, तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल बेवूर, डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष बीडी नाग चौधरी, लेफ्टिनेंट कर्नल पीपी सभरवाल और परमाणु वैज्ञानिक राजा रमन्ना आदि उस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बने जब 18 मई को सुबह 8 बजकर पांच मिनट पर भारत ने विश्व को अपने परमाणु शक्ति संपन्न होने का ऐलान पूरे धमाके के साथ किया। इस प्रथम परमाणु परीक्षण के सूत्रधार रमन्ना ने अपनी किताब इयर्स ऑफ पिलग्रिमेज में इस परीक्षण का रोचक वर्णन किया है कि किस तरह इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेशन टीम के प्रमुख प्रणव दस्तीदार को बम का ट्रिगर दबाने का अवसर दिया गया। उल्टी गिनती शुरु हुई, उन्होंने ट्रिगर दबाया, लेकिन इलेक्ट्रिसिटी मीटर में वोल्टेज 10 तक ही दिखा रहा था। घबराहट में उल्टी गिनती बंद हो गई। दूर एक मचान पर रमन्ना और उनके साथी वेंकटेशन बैठे थे, जो लगातार विष्णु सहस्रनाम का जाप कर रहे थे। उनका जाप भी बीच में रुक गया। लेकिन तभी धरती से रेत का एक पहाड़-सा उठा और लगभग एक मिनट तक हवा में रहने के बाद गिरने लगा। बाद में पी के आयंगर ने इस बारे में लिखा कि, वो गज़ब का दृश्य था, अचानक मुझे वो सभी पौराणिक कथाएं सच लगने लगी थीं जिसमें कहा गया था कि कृष्ण ने एक बार पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया था। इस कार्यक्रम का कोडवर्ड था बुद्ध इज़ स्माइलिंग। परीक्षण सफल होने पर पोखरण गांव में सेना के टेलीफोन एक्सचेंज से होमी सेठना ने खडख़ड़ाती टेलीफोन लाइन पर लगभग चीखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में खबर दी कि बुद्ध इज़ स्माइलिंग। इंदिरा गांधी के निजी सचिव पी.एन.धर जब उनको ये खबर देने गए तो वे आम लोगों से मुलाकात कर रही थीं। धर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि इंदिरा गांधी की बांछें खिल गई थीं। एक जीत की मुस्कान को उनके चेहरे पर साफ पढ़ा जा सकता है।

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बुद्ध के मुस्कुराने की खबर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री के चेहरे पर मुस्कान ला दी और आज 43 साल बाद भारत के पास उस गौरवशाली मुस्कान को बरकरार रखने के पर्याप्त कारण और मजबूत आधार हैं। परमाणुशक्ति संपन्न ताकतों के बीच आज भारत मजबूती से खड़ा है और हमें इसके लिए भारत सरकार, वैज्ञानिकों और उनके साथ जुटे रहे तमाम लोगों का शुक्रगुजार होना चाहिए।

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