ये मास्टरस्ट्रोक है या मनमर्जी

बीते कुछ समय से देश की अर्थव्यवस्था के लिए लगातार बुरी खबरें ही आ रही हैं। जीडीपी का घटना, महंगाई का बढ़ना, बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि इन सबके कारण हताशा का माहौल बना हुआ था...

देशबन्धु
ये मास्टरस्ट्रोक है या मनमर्जी
Modi
देशबन्धु

बीते कुछ समय से देश की अर्थव्यवस्था के लिए लगातार बुरी खबरें ही आ रही हैं। जीडीपी का घटना, महंगाई का बढ़ना, बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि इन सबके कारण हताशा का माहौल बना हुआ था। नोटबंदी और जीएसटी का असर अच्छा होगा, ऐसे सरकारी दावों का खोखलापन जाहिर हो रहा था। चूंकि मोदीजी  अच्छे दिन आने वाले हैं के नारे के साथ ही सत्ता पर काबिज हुए थे और अब जबकि उनकी सत्ता को डेढ़ साल ही बचे हैं, इस नारे को सच करके दिखाने की चुनौती उनके सामने है। लिहाजा वे ऐसे फैसले ही लेंगे, जिससे अर्थव्यवस्था में उछाल दिखाई दे, फिर भले ही उछाल पानी के बुलबुले की तरह क्षणभंगुर क्यों न हो।

एकल ब्रांड खुदरा कारोबार और भवन निर्माण के क्षेत्र में सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति ऐसा ही एक फैसला है। कुछ लोग इसे मोदीजी का मास्टरस्ट्रोक बता रहे हैं कि इससे दुनिया भर के निवेशकों का ध्यान भारत की ओर जाएगा। यूं भी प्रधानमंत्री बनने के बाद विदेशों की यात्राएं कर मोदीजी ने भारत में निवेश का खूब न्यौता बांटा है। हाल ही में प्रवासी सांसदों को संबोधित करते हुए उन्होंने भारत में व्यापार की प्रबल संभावनाएं दिखलाईं। अब वे विश्व आर्थिक मंच की बैठक में शिरकत करने स्विट्जरलैंड के दावोस पहुंचने वाले हैं। वहां भी वे दुनिया की कई मशहूर कंपनियों के प्रमुखों को संबोधित करेंगे और उन्हें भारत में व्यापार के लिए आमंत्रित करेंगे। ऐसा लगता है कि इतिहास का पहिया घूम कर एक बार फिर उसी जगह खड़ा हो गया है, जब भारत ने अपने उद्यमियों, कारीगरों, श्रमिकों को उपेक्षित करते हुए विदेशी व्यापारियों के लिए लाल कालीन बिछा दिया था।

डच, फ्रेंच, अंग्रेज सब व्यापार के रास्ते ही भारत पहुंचे और फिर यहां के मालिक बन बैठे। तब भारत एक देश के रूप में संगठित नहीं था, न ही यहां लोकतंत्र था, न राजाओं पर लोककल्याण की जिम्मेदारी थी। जिस राजा का मन करता, वह अपनी प्रजा के बारे में सोचता, अगर मन नहीं करता तो प्रजा का शोषण करता और ऐसा करने से रोकने वाला उसे कोई नहीं था। लेकिन आज भारत लोकतांत्रिक देश है और यहां की सरकार पर, प्रधानमंत्री पर यह नैतिक और राजनैतिक जिम्मेदारी है कि वे जनता के हित और देश के हित के बारे में सोचकर ही फैसला लें। उनका मन हुआ, उन्होंने नोटबंदी कर दी, उनका मन हुआ उन्होंने जीएसटी लागू कर दिया। फिर जीएसटी में जब मर्जी हुई, बदलाव भी कर दिया। अब एकल ब्रांड खुदरा कारोबार को विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिया है। यूपीए शासनकाल में कांग्रेस भी ऐसे ही फैसले लेना चाहती थी, तब नरेन्द्र मोदी और समूची भाजपा इसका विरोध करती थी।

अरुण जेटली ने आखिरी सांस तक एफडीआई के विरोध की बात कही थी, जबकि मोदीजी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया था कि वह देश को विदेशियों के हाथों में दे रही है। उनके ये आरोप अब कांग्रेस उन्हीं के सिर मढ़ रही है। विदेशी निवेश पर आरोप चाहे पहले भाजपा ने लगाए या अब कांग्रेस लगा रही है, सच तो ये है कि दोनों की आर्थिक नीतियों में कोई खास फर्क नहीं है। दोनों के ही शासनकाल में महंगाई भी बढ़ी, गरीबी भी बढ़ी और जो चंद लोग अमीर थे, उन्हें और अमीर होने का मौका मिला। दरअसल देश सरकार के फैसलों से ज्यादा कुछ उद्योगपतियों की मर्जी से चल रहा है। इस ताजा फैसले के पीछे भी बड़े कारोबारियों की कोई मर्जी रही होगी।


 देश में इस वक्त आईकिया, एप्पल, एचएंडएम, नाइकी जैसे कुछेक सिंगल ब्रांंंड्स के रिटेल स्टोर हैं, सौ प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति के बाद कुछेक और आ जाएंगे। लेकिन इससे देश का कारोबार कैसे बढ़ेगा, रोजगार कैसे पैदा होगा, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। यही स्थिति भवन निर्माण में विदेशी निवेश पर है, जिसका लाभ मुंबई, बंगलुरू, नोएडा जैसे औद्योगिक गतिविधियों में अग्रणी शहरों को तो शायद मिले, लेकिन स्मार्ट बनने की राह ताक रहे कई शहर उपेक्षित ही रह जाएंगे।

मंझोले और छोटे कारोबारियों और मजदूर संगठनों को फिक्र है कि इस फैसले का विपरीत असर उनके कारोबार और रोजगार पर पड़ सकता है। लेकिन हमेशा की तरह सरकार ने इस बार भी उनकी चिंता दूर करने की कोई जहमत नहीं उठाई है। इस फैसले के बाद अब सबसे बड़ा डर यह है कि एकल ब्रांड के बाद अगर मल्टीब्रांड खुदरा व्यापार के लिए भी विदेशी व्यापारियों को पूरी छूट मिल जाएगी तो भारत की आर्थिक, सामाजिक दशा क्या होगी?

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