भगवान के घर के नाम ही अंधेरगर्दी है

राम मंदिर बन कर रहेगा, कोई माई का लाल उसे नहीं रोक सकता...अपराध अभी प्रमाणित नहीं हुआ है और मैं राम, गंगा और अयोध्या के लिए इंद्र का पद भी छोड़ सकती हूं मंत्री का पद तो बहुत कम है...जो भी किया है ...

देशबन्धु
भगवान के घर के नाम ही अंधेरगर्दी है
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राम मंदिर बन कर रहेगा, कोई माई का लाल उसे नहीं रोक सकता...अपराध अभी प्रमाणित नहीं हुआ है और मैं राम, गंगा और अयोध्या के लिए इंद्र का पद भी छोड़ सकती हूं मंत्री का पद तो बहुत कम है...जो भी किया है खुल्लम खुल्ला किया है.. ये उद्गार मोदी सरकार में मंत्री सुश्री उमा भारती के हैं, जो उन्होंने अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद व्यक्त किए। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पीसी घोष और रोहिंटन नरीमन की पीठ ने सीबीआई की अपील पर फैसला सुनाया है कि बाबरी मस्जिद को तोडऩे की साजिश के आरोप में 13 भाजपा नेताओं पर मुकदमा चलेगा, जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह और केंद्रीय मंत्री उमा भारती शामिल हैं। अदालत ने कहा है कि इस मामले में रो•ा सुनवाई होगी और इस दौरान किसी न्यायाधीश का तबादला नहींहोगा। वैसे उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह वर्तमान में राजस्थान के राज्यपाल हैं। इसके साथ ही उन्हें हिमाचल प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। राज्यपाल के पद पर होने के कारण उन पर मुकदमा नहीं चल सकता। हालांकि उन पर नैतिक दबाव बनाया जा सकता है कि वह इस्तीफा दें और मुकदमे का सामना करें।
निराशा के क्षणों में ढांढस बंधाने के लिए अक्सर कहा जाता है कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। लेकिन जब अंधेरगर्दी भगवान के घर को लेकर ही मची हो, तो उम्मीद की किरण कहां तलाशी जाए? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब हर वो भारतीय नागरिक ढूंढ रहा है, जिसे इस देश के संविधान पर अटूट विश्वास है, जो धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का हिमायती है, जो यह मानता है कि सर्वधर्म सद्भाव ही इस देश की ताकत है। उन्मादी भीड़ को उकसाते हुए, विद्वेष से भरे नारे लगाते हुए, एक धक्का और कहते हुए जब एक ऐतिहासिक ढांचे को इसलिए गिरा दिया गया क्योंकि उसके होने पर हिंदुत्व के स्वघोषित रक्षकों को ऐतराज था और यह दावा था कि वह जमीन राम लला की है, इसलिए वहां मस्जिद नहींमंदिर होना चाहिए, तभी देश की सांप्रदायिक सौहाद्र्र की नींव भी हिल गई थी। रथयात्रा के जरिए भाजपा ने अपनी राजनीतिक जमीन तो पक्की कर ली, लेकिन भारत की बुनियाद कमजोर कर दी और उसका उन्हें कोई अफसोस भी नहींहै, यह उमा भारती के ताजा बयानों से समझा जा सकता है। बाबरी मस्जिद गिराने की घटना दो-तीन साल पुरानी होती और उस पर लगातार सुनवाई के बाद आरोपियों पर मुकदमा चलाने का फैसला होता, तो कहा जा सकता है कि न्याय हुआ है। लेकिन 25 साल बाद इस फैसले से न्याय की उम्मीद को क्षीण हुई है, अलबत्ता राजनीति चालों के लिए नई बिसात अवश्य बिछ गई है। मोदी सरकार यह कहकर अपना पक्ष मजबूत कर सकती है कि उसके कार्यकाल में भाजपा के ही वरिष्ठ नेताओं को अदालती प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है और यह उसकी निष्पक्षता, पारदर्शिता का सबूत है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि एक उमा भारती को छोडक़र अधिकतर आरोपी तो पहले ही भाजपा में दरकिनार कर दिए गए हैं। लालकृष्ण आडवानी और मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा में अपना राजनीतिक अपमान खूब देखा और भोगा है, अब अपनी महत्वाकांक्षाओं का हश्र भी देख लें। कुछ समय पहले श्री आडवानी को राष्ट्रपति पद पर आसीन करवाने का जो शिगूफा छोड़ा गया था, वह इस फैसले से ध्वस्त हो गया है।
राम मंदिर का मुद्दा अब भी चुनावों में जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर लिया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि यह भाजपा के लिए राजनीति में ऊपर चढऩे की सीढ़ी की तरह ही था, जिसकी अब मोदीमय भाजपा को खास जरूरत नहींरह गई है। साध्वी, योगी नुमा भाजपा नेताओं के लिए यह अवश्य राजनीति से जुड़ा धार्मिक मुद्दा है, लेकिन भाजपा की बागडोर अब जिनके हाथों में है, वे समय और अवसर के मुताबिक ही इसकी उपयोगिता आंकेेंगे, यह तय है। रहा सवाल इंसाफ का, तो यह अब भी न्याय की तुला पर कहींअटका हुआ, फंसा हुआ है। 25 साल बाद मुकदमा चलाने का फैसला हुआ है, तो मुकदमे का फैसला आने में कितना वक्त लगेगा, इस बारे में कोई अनुमान कैसे लगाया जा सकता है? अपने राजनीतिक लाभ के लिए देश को बांटने में जिन लोगों ने गुरेज नहींकिया, वे अदालती प्रक्रिया को प्रभावित करने में क्यों झिझकेेंगे? न्याय तो तब होता जब इस विध्वंसकारी घटना में लिब्रहन आयोग ने जांच कर जो रिपोर्ट पेश की थी, उसके मुताबिक अविलंब मुकदमे चलते और फैसले आते। अभी तो केवल राजनीति हो रही है।


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