बच्चों के गालों पर जेल की मुहर

रक्षाबंधन के पर्व पर कैदियों को जेल में राखी बांधने पहुंची बहनें। इस तरह के शीर्षक से राखी के त्योहार मनाने के समाचार हर वर्ष प्रकाशित होते हैं...

देशबन्धु
बच्चों के गालों पर जेल की मुहर
Raksha Bandhan
देशबन्धु

रक्षाबंधन के पर्व पर कैदियों को जेल में राखी बांधने पहुंची बहनें। इस तरह के शीर्षक से राखी के त्योहार मनाने के समाचार हर वर्ष प्रकाशित होते हैं। ऐसे समाचारों को सामने लाने का एक मकसद शायद यह दिखाना होता है कि प्रशासन कैदियों के लिए मानवता दिखा रहा है और यह कि उन्हें भी पर्व मनाने की छूट मिली हुई है। वैसे जेलों में किस तरह मानवाधिकारों का हनन होता है, यह वर्षों से शोध का विषय रहा है और कई क्रूर सच्चाइयों के सामने आने के बावजूद जेलों में बंद इंसानों की दशा जानवरों से भी बुरी बनी हुई है। जेलों में इंसानियत को ताक पर रखने का नया मामला मध्यप्रदेश के केन्द्रीय कारागार से आया है, जहां राखी के दिन किसी कैदी से मिलने पहुंचे दो बच्चों के चेहरों पर जेल प्रशासन ने मुहर लगा दी। जेल में कैदियों से मिलने वाले आए लोगों के हाथों पर मुहर लगाने की व्यवस्था है, ताकि कोई कैदी आगंतुक होने का बहाना न करके निकल जाए, ऐसा जेल अधिकारियों का कहना है। हालांकि यह व्यवस्था भी काफी अपमानजनक है और अंग्रेजी राज की याद दिलाती है, जब स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में डाल कर, तरह-तरह से प्रताडि़त करने के तरीके अंग्रेज सोचा करते थे। अफसोस की बात यह है कि जब हम आजादी की 70वींवर्षगांठ मनाने जा रहे हैं, तब भी गुलामी की कुछ जंजीरों को तोड़ नहीं पाए हैं

कैदियों से मिलने पहुंचे लोगों के हाथों पर मुहर लगाना, गुलाम होने की याद ही दिलाती है। अगर किसी कैदी के भागने का डर है तो जेल प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था और पुख्ता करनी चाहिए। इसी तरह आगंतुकों की आवाजाही दर्ज करने के भी आधुनिक. वैज्ञानिक तौर-तरीकों पर विचार किया जा सकता है। बैंक की लाकरों, अतिसुरक्षित सरकारी दफ्तरों में जिस तरह लोगों के प्रवेश और निकासी की व्यवस्थाएं हैं, उनमें से किसी को अपनाया जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए जो इच्छाशक्ति होनी चाहिए, फिलहाल उसका सर्वथा अभाव दिख रहा है। जेल या पुलिस सुधार की बातें करने या सोचने में सरकार, प्रशासन की दिलचस्पी ही नजर नहीं आ रही।

भोपाल के केन्द्रीय कारागार में बच्चों के चेहरों पर मुहर लगाना, न केवल मानवाधिकार, बल्कि बाल अधिकारों का भी उल्लंघन है। एक अबोध और एक किशोरवय के बच्चों के गालों पर जेल प्रशासन ने मुहर लगा दी और वरिष्ठ अधिकारी इसे भूल से लगना बता रहे हैं। क्या हाथ की जगह गाल पर मुहर लगाने की भूल दो बार हो सकती है। सवाल यह भी है कि बच्चों पर मुहर लगाने की जरूरत ही क्यों पड़ी? क्या इसके पीछे बच्चों को प्रताडि़त करने की क्रूर मानसिकता नहीं झलकती। हिंदुस्तान में बच्चे सुरक्षित हैं, उनके अधिकार। तिस पर भी अगर बच्चे गरीब, वंचित या शोषित वर्ग के हों तो उन्हें प्रताडि़त करना और आसान हो जाता है। कैदी से मिलने पहुंचे बच्चे निश्चित ही संपन्न या रसूखदार परिवार के नहींरहे होंगे, इसलिए परपीड़ा की मानसिकता से उनके हाथों की जगह गालों पर मुहर लगाई गई होगी, और ऐसा करने वाले मन ही मन क्रूरता भरा आनंद ले रहे होंगे। राखी के दिन ये दोनों बच्चे गालों पर जेल की मुहर लिए, कैसे बाहर निकले होंगे और कैसे अपने घर पहुंचे होंगे, उनकी मानसिक स्थिति कितनी कष्टपूर्ण रही होगी, यह सोचकर ही कलेजा कांप उठता है।


फिल्म में अमिताभ बच्चन के हाथ पर मेरा बाप चोर है, यह लिखा होना दर्शकों को द्रवित कर देता है। क्या ऐसी ही संवेदना असल जिंदगी में इन बच्चों के चेहरों पर मुहर लगी देखकर नहीं जागनी चाहिए? अगर एक समाज के रूप में अपने बच्चों के साथ ऐसी प्रताड़ना देखकर भी हम विचलित नहीं होते हैं, तो हमें अपने जिंदा होने पर संशय करना चाहिए। इस मामले की खबर सोशल साइट्स के जरिए फैली, तो मध्यप्रदेश सरकार थोड़ी हरकत में आई। मध्यप्रदेश मानवाधिकार आयोग ने स्वत:संज्ञान लेते हुए प्रताडि़त बच्चों के लिए दस हजार रुपयों का मुआवजा देने के निर्देश सरकार को दिए हैं, साथ ही मामले में एक हफ्ते के भीतर कार्रवाई करने कहा है। आयोग ने इस घटना को अमानवीय बताया है।

गनीमत है कि उन बच्चों के लिए यह पहल हो रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब जेल अधिकारी इसे पहले ही भूलवश हुई घटना बता रहे हैं तो जांच क्या सही दिशा में आगे बढ़ पाएगी? क्या इस मामले पर लीपापोती की कोशिशें नहींहोंगी? एक नहींदो बच्चों के चेहरों पर एक ही जगह मुहर लगाने का काम अनजाने में नहीं हुआ है, इस बात को कैसे साबित किया जाएगा? और आगे ऐसी घटना नहींहोगी, इसकी गारंटी कौन लेगा?

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